bhagwan vishnu on sheshnaag with laxmi ji pressing his legs

भक्ति नौ प्रकार की मानी गयी है—

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।

नवधा भक्ति के नौ आचार्य है—

  1. श्रवण भक्ति के राजा परीक्षित ।
  2. कीर्तन भक्ति के व्यासपुत्र शुकदेवजी ।
  3. भगवत्स्मरण के प्रह्लादजी ।
  4. भगवान के चरणकमलों की सेवा (पाद-सेवन) की लक्ष्मीजी ।
  5. अर्चन-पूजन भक्ति के राजा पृथु ।
  6. वन्दन भक्ति के अक्रूरजी ।
  7. दास्य भक्ति में कपिराज हनुमानजी ।
  8. सख्य भक्ति के अर्जुन ।
  9. सर्वस्व निवेदन के राजा बलि, गोप व गोपियां ।

नवधा भक्ति के चौथे रूप चरण-सेवा (पाद-सेवन) की आचार्या लक्ष्मीजी हैं । वे आठों याम भगवान के चरणकमलों की सेवा में लीन रहती हैं । लक्ष्मीजी भगवान विष्णु की नित्य शक्ति हैं । भगवान जब-जब अवतार लेते हैं, तब-तब लक्ष्मीजी भी अवतरित होकर भगवान की लीला में सहयोग देती हैं । भगवान के देवरूप होने पर वे दिव्य शरीर धारण करती हैं और मनुष्य रूप होने पर वे मानवी रूप से प्रकट होती हैं । जैसे—श्रीराम के साथ सीता रूप में और श्रीकृष्ण के साथ रुक्मिणी रूप में । विष्णु भगवान के शरीर के अनुरूप ही वे अपना शरीर भी प्रकट कर देती हैं । जैसे भगवान विष्णु जगत के पालनहार पिता हैं, वैसे ही लक्ष्मीजी जगन्माता है, उन्हें अपने बच्चों की सदैव चिन्ता रहती है—जब कभी लक्ष्मीपति विष्णु किसी महाअपराधी जीव पर पिता के समान उसके हित की कामना से क्रोधित हो जाते हैं, उस समय लक्ष्मीजी ही जीव पर दया दिखाते हुए माता के समान उन्हें उपदेश देकर उनके क्रोध को शांत करती हैं—‘यह क्या ! इस संसार में निर्दोष है ही कौन ?’ इसीलिए लक्ष्मीजी जगन्माता कहलाती हैं ।

चरणों के देवता हैं भगवान विष्णु 

भगवान की चरण/पाद-सेवा बड़ी दुर्लभ है । चरण ही सबका आधार हैं । सबका भार उठाने वाले भी वही हैं । आगे बढ़ाने वाले भी चरण ही हैं । संसार में जो गति-शक्ति है, वह भगवान विष्णु की है । वे ही सबको गति देते हैं अर्थात् आगे बढ़ाते हैं । जब हम गुरु, ब्राह्मण, गो या आदरणीय व्यक्ति के चरण छूते या पाद-प्रक्षालन करते हैं, तो वह भगवान विष्णु की ही पूजा होती है; इसलिए सबसे अधिक पूजा संसार में भगवान विष्णु की ही होती है । 

लक्ष्मीजी का स्थान भगवान के चरणों में क्यों ?

पुराणों में लक्ष्मीजी का स्थान भगवान विष्णु के हृदय और चरणकमलों में बताया गया है । इसका भाव यह है कि लक्ष्मीजी विष्णु भगवान की पत्नी (भोग्या) हैं । चरण-सेवा के द्वारा वे संसार को यह संदेश देती हैं कि भगवान के चरणों का आश्रय लेने वालों पर ही वे अपनी कृपा बरसाती हैं और उसी घर में निवास करती हैं जहां भगवान नारायण, विष्णु, श्रीकृष्ण आदि की सेवा होती है, शंख-ध्वनि होती है । ऐसे लोगों के यहां लक्ष्मी अपने पति भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर सवार होकर आती हैं ।

लेकिन जब मनुष्य लक्ष्मीजी का पति बनना चाहता है अर्थात् जब लक्ष्मी का भोग करना चाहता है, उसे भगवत् कार्य में और सद्कार्य में नहीं उपयोग करता है तो लक्ष्मीजी उसे ठुकरा कर चली जाती हैं । जो लोग भगवान की सेवा-पूजा न करके केवल लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उनसे लक्ष्मी दूर ही रहती हैं । 

संसार चाहे लक्ष्मी को और लक्ष्मीजी चाहें नारायण को

लक्ष्मीजी की कृपाकटाक्ष से ही ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, कुबेर, यमराज आदि देवता प्रचुर ऐश्वर्य व सम्पत्ति प्राप्त करते हैं । स्त्रियों में जो सौन्दर्य, शील, सदाचार और सौभाग्य स्थित है, वह सब लक्ष्मी का ही रूप है । जिन मनुष्यों को लक्ष्मीजी छोड़ देती हैं, उन्हें मानसिक बल, सत्य, शौच, और शील आदि गुण भी शीघ्र त्याग देते हैं और जिन पर इनकी कृपादृष्टि होती है, वे गुणहीन मनुष्य भी शीघ्र ही सम्पूर्ण गुणों—कुलीनता व ऐश्वर्य से सम्पन्न हो जाते हैं । जिस पर लक्ष्मीजी की कृपा है वही प्रशंसनीय है, वही गुणी है, वही धन्य है, वही कुलीन है और वही बुद्धिमान, शूरवीर और पराक्रमी है ।

लक्ष्मीजी जिन पर कृपा करती हैं, उनके अंदर लक्ष्मी का मद आ जाता है, वे अहंकारी हो जाते हैं । लेकिन स्वयं लक्ष्मीजी को अपने गुणों (ऐश्वर्य, श्री) का मद नहीं होता है; क्योंकि भगवान नारायण सदैव लक्ष्मी से विरत रहते हैं । इस बात की बहुत सुन्दर व्याख्या स्वामी श्रीअखण्डानन्द सरस्वतीजी ने की है—

जब लक्ष्मीजी भगवान नारायण के पांव दबाती हैं, तो भगवान नारायण शेषशय्या पर लेटे हुए किधर देखते हैं ? हम सोचते हैं कि लक्ष्मीजी जब नारायण के पांव दबाती हैं तो भगवान लक्ष्मीजी की ओर ही देखते होंगें और सोचते होंगे कि ये तो बड़ी कोमल हैं, बड़ी मधुर हैं, बड़ी सुन्दर हैं और उन्हें देखकर प्रसन्न होते रहते होंगे । परन्तु ऐसा नहीं है । लक्ष्मीजी कहती हैं कि भगवान नारायण के पास कुछ ऐसा है जो मुझसे ज्यादा मूल्यवान है ।

शेषशय्या पर लेटे हुए भगवान नारायण अधखुले नेत्रों से, न नींद में न जागृत अवस्था में बल्कि अपनी स्वरूप समाधि में मग्न रहते हैं । भगवान नारायण अपने नेत्रों में आत्मदर्शन करते हैं । योगनिद्रा में उन्मग्न-निमग्न होते रहते हैं और लक्ष्मीजी उनकी चरण सेवा करती रहती हैं । इसीलिए भगवान विरक्त हैं ।

यही बात श्रीमद्भावत में इस प्रकार कही गई है कि—लक्ष्मीजी शिकायत करती हैं कि भगवान विष्णु में अगर कोई दुर्गुण है तो वह यही है कि उनमें सब सद्गुण हैं । वे ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, सनकादि, नारद आदि सबसे अच्छे हैं । मैं उन्हें बहुत चाहती हूँ लेकिन वे मुझसे विरक्त हैं ।

लक्ष्मीजी किसको चाहती हैं ?

यही कारण है कि लक्ष्मीजी उसको चाहती हैं, जो केवल भगवान को चाहता है अथवा जो कुछ नहीं चाहता है । जो अपने लिए कुछ नहीं चाहता, उसका प्रबन्ध लक्ष्मीजी करती हैं । जो वस्तुओं के दास हैं, वे भगवान के भक्त नहीं हो सकते । जो कोई भी इच्छा नहीं रखते, उनके पास आने के लिए लक्ष्मी लालायित रहती हैं । 

गिरह गाँठ नहिं बाँधते, जब देवे तब खाहिं ।
नारायन पाछे फिरें, मत भूखे रह जाहिं ।।

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