harivansh ji shri radha ji

श्रीराधा हैं जिनकी इष्ट और गुरु

भगवान श्रीकृष्ण की वंशी का अवतार श्रीहित हरिवंशजी गोस्वामी श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख हैं । इनके सम्प्रदाय की आचार्या व इष्ट श्रीराधा होने से यह ‘श्रीराधावल्लभीय सम्प्रदाय’ के नाम से जाना जाता है । इनकी उपासना पद्धति में श्रीराधाजी की प्रधानता है और ये श्रीराधाकृष्ण की निकुंज लीला में अपने को एक सखी मान कर उनकी सेवा करते थे । श्रीराधा ने गुरु बनकर इन्हें इस सम्प्रदाय का मंत्र प्रदान किया । ‘राधा’ नाम के रसिक भक्त होने के कारण श्रीराधा की छवि पर मोहित होकर वे कहते हैं—

राधा की छवि देख मचल गयौ सामरिया,
हंस मुसुकाय प्रेम रस चाखै,
ताय नैनन विच ऐसौ राखूं,
ज्यौं काजर की रेख परैगी मामरिया ।

श्रीहित हरिवंशजी ने श्रीराधावल्लभ (श्रीकृष्ण) के स्वरूप के साथ श्रीराधा की प्रतिमा न रखकर उनकी गादी स्थापित कर गादी सेवा की शुरुआत की ।

श्रीहित हरिवंशजी की बाल-लीलाएं हैं बड़ी ही अद्भुत और विलक्षण

बालक श्रीहित हरिवंश के बचपन में ही अनेक ऐसी घटनाएं देखने को मिलती है जिससे सिद्ध होता है कि वे भगवान श्रीकृष्ण का ही अंश हैं—

▪️इनका जन्म संवत् 1559 वैशाख शुक्ल एकादशी को मथुरा के पास बाद गांव में हुआ था । ये बड़े ही सुन्दर थे और शिशु काल में ही ‘राधा’ नाम सुनकर किलकारी मारकर हंसने लगते थे । जब यह छह महीने के थे तब पालने में लेटे हुए ही ताऊजी द्वारा लिखी गयी ‘श्रीराधासुधानिधि’ स्तुति का गान करने लगे । यह देखकर माता-पिता और इनके ताऊ स्वामी नृसिंहाश्रमजी आश्चर्यचकित रह गए । इस घटना से उनको पता लगा कि यह शिशु श्रीकृष्ण की वंशी का अवतार है और श्रीराधाकृष्ण के भक्तों को प्रेम का मधुर दान देने के लिए इस भारतभूमि पर जन्मा है ।

▪️एक बार श्रीहित हरिवंशजी प्रात:काल अपने बालसखाओं के साथ बगीचे में खेल रहे थे । वहां उन्होंने दो बालकों का राधा और मोहन के रूप में श्रृंगार किया । फिर कुछ देर बाद श्रृंगार बदल कर राधा को मोहन और मोहन को राधा का श्रृंगार धारण करा दिया । अंदर घर में इनके पिता व्यासजी अपने आराध्य श्रीराधाकान्त का श्रृंगार कर उनकी छवि निहार रहे थे । तभी अचानक वे चौंक पड़े । उन्होंने श्रीराधा को श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण को श्रीराधा के रूप में देखा । उनको लगा वृद्धावस्था के कारण उन्हें भ्रम हुआ होगा परन्तु तुरन्त ही वह श्रृंगार अपने-आप बदलने लगा । वह घबराकर बाहर आए तो देखते है कि बगीचे में श्रीहित हरिवंश अपने सखाओं के साथ राधा और कृष्ण का श्रृंगार बदलने का खेल खेल रहा है । उनको आभास हो गया कि निश्चय ही कोई असाधारण महापुरुष उनके घर प्रकट हुआ है ।

▪️एक दिन इनके पिता व्यासजी ने ठाकुरजी के सामने लड्डुओं का भोग रखा और आंखें बंद कर भोग मन्त्र बोलने लगे । जब उन्होंने आंखे खोलीं तो देखते हैं कि भोग के थाल में फलों के दोने रखे हैं । उन्हें पुरानी घटना याद आ गयी । उन्होंने बाहर आकर देखा कि बालक श्रीहित हरिवंश ने बगीचे में दो वृक्षों को नीली-पीली पुष्पमाला पहनाकर राधाकृष्ण का स्वरूप बनाया है और उनके सामने फलों का भोग रखा है ।

▪️एक दिन पांच वर्ष की आयु में श्रीहित हरिवंशजी बगीचे के सूखे कुएं में कूद गए । यह देखकर माता-पिता और कुटुम्बीजन अत्यन्त व्याकुल हो उठे । तभी लोगों ने देखा कि कुएं में एक दिव्य प्रकाश फैल गया है और बालक श्रीहित हरिवंश श्यामसुन्दर की एक सुन्दर मूर्ति को अपने कर-कमलों में सम्हाले हुए अपने-आप कुएं से ऊपर उठते चले आ रहा है । उनके ऊपर पहुंचते ही कुंआ मीठे जल से भर गया । ठाकुरजी को लाकर राजमहल

में पधराया गया और श्रीहित हरिवंशजी ने उनका नाम रखा—‘श्रीनवरंगीलाल’ और उनकी पूजा-सेवा बड़े प्रेम से करने लगे ।

▪️श्रीहित हरिवंशजी की अतुलनीय सेवा से प्रसन्न होकर श्रीराधा ने इन्हें दर्शन देकर अपनी सेवा-पद्धति और मन्त्र का उपदेश दिया और अपना शिष्य बना लिया ।

▪️इनका मानना है कि श्रीराधा ही वृन्दावन की अधिष्ठात्री देवी हैं और उनकी कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति वृन्दावन में वास नहीं कर सकता है । सोलह वर्ष की अवस्था में सब कुछ त्यागकर ये वृन्दावन आ गए । चटथावल में आत्मदेव नामक ब्राह्मण के यहां ठाकुर श्रीराधाबल्लभजी विराजमान थे । आत्मदेव को भगवान ने स्वप्न में आज्ञा दी कि अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह श्रीहित हरिवंशजी से कर दो और दहेज में मुझे दे देना । आत्मदेव ने भगवान की आज्ञा बताकर श्रीहित हरिवंशजी को ठाकुर श्रीराधाबल्लभजी दे दिए और अपनी पुत्रियों का विवाह उनसे कर दिया ।

▪️वृन्दावन में मदन-टेर नामक स्थान पर ठाकुर श्रीराधाबल्लभजी ने प्रथम निवास किया । उसके बाद सेवाकुंज के पास एक कुटिया में रहने लगे । बाद में इसी स्थान पर श्रीराधाबल्लभजी का प्रतिष्ठा-उत्सव हुआ ।

▪️48 वर्ष तक पृथ्वी पर श्रीराधाबल्लभलाल की भक्ति रूपी खुशबू बिखेरकर सं. 1607 में शारदीय पूर्णिमा के दिन गोस्वामीजी ने भगवान की निकुंजलीला में प्रवेश किया ।

▪️इन्होंने संसार को यही उपदेश दिया कि भगवान की सेवा सदैव अपने हाथों से करनी चाहिए न कि नौकरों से भगवान का कार्य करवाना चाहिए । भगवान की सेवा कितनी तन्मयता, कितनी निष्ठा, कितनी भक्ति और कितनी प्रीति से करनी चाहिए—इनका जीवन इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है ।

श्रीहित हरिवंशजी गोस्वामी के शब्दों मे—

प्रेम धर्म को नियम निरालौ न कोई पूजा न कोई जप है ।
गौरमंजरी कहियौ स्याम सौं मेरी तड़प ही मेरो तप है ।।

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