गीता में सगुण और निर्गुण भक्ति

गोपियां निर्गुण ब्रह्म से सगुण श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ बताती हुई उद्धवजी से कहती हैं—‘हे उद्धव ! आपका अनोखा रूप रहित ब्रह्म हमारे किस काम का है, अर्थात् वह हमारे किसी काम का नहीं है । हमें तो ऐसे सगुण-साकार ब्रह्म की चाह है, जिसे हम देख सकें और जो हमारे बीच रहकर हमारे सभी दैनिक कार्यों में सहायक हो ।’

श्रीकृष्ण कृपा और भक्ति देने वाला ‘श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र’

श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र (कृष्णाष्टक) भगवान श्रीशंकराचार्य द्वारा रचित बहुत सुन्दर स्तुति है । बिना जप, बिना सेवा एवं बिना पूजा के भी केवल इस स्तोत्र मात्र के नित्य पाठ से ही श्रीकृष्ण कृपा और भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की भक्ति प्राप्त होती है।

काश, मैं भगवान का प्यारा भक्त होता !

वह स्वभाव क्या है, जिससे आकर्षित होकर भगवान भक्त को खोजते फिरें, उसका पता पूछें, उससे मिलने के लिए रोते फिरें, अपने भक्त की चाकरी करें, वे गुण जिसके कारण भक्त भगवान को अत्यन्त प्यारा लगने लगता है—यह जानने की जिज्ञासा हर प्रेमीभक्त को होती है ।

व्रज में रथ चढ़ चले री गोपाल

रथयात्रा का संदेश है कि मानव-शरीर रूपी रथ पर श्रीकृष्ण को आरूढ़ कर दिया जाए तो कंसरूपी पापी वृत्तियों का अंत हो जाएगा जिससे शरीर व आत्मा स्वयं श्रीकृष्णमय (दिव्य) हो जाएंगे और जीवन सदैव के लिए एक महोत्सव बन जाएगा ।

गीता का स्थितप्रज्ञ भक्त कवि धनंजय

गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते है—हे मधुसूदन ! ये स्थितप्रज्ञ क्या होता है ? इसे समझाओ ! भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘पार्थ ! दुःख भोगते हुए भी जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और जो न ही सुख की लालसा रखता है तथा जिसके ह्रदय में क्रोध, मोह, भय आदि विकारों के लिए कोई स्थान नहीं होता है वह मनुष्य स्थितप्रज्ञ है, वह मुनि, संन्यासी स्थिरबुद्धि कहा जाता है ।’

जिन नैनन श्रीकृष्ण बसे, वहां कोई कैसे समाय

श्रीराधा की पायल सूरदासजी के हाथ में आ गई । श्रीराधा के पायल मांगने पर सूरदासजी ने कहा पहले मैं तुम्हें देख लूं, फिर पायल दूंगा । दृष्टि मिलने पर सूरदासजी ने श्रीराधाकृष्ण के दर्शन किए । जब उन्होंने कुछ मांगने को कहा को सूरदासजी ने कहा—‘जिन आंखों से मैंने आपको देखा, उनसे मैं संसार को नहीं देखना चाहता । मेरी आंखें पुन: फूट जायँ ।’

गीता के अनुसार कौन है सर्वश्रेष्ठ भक्त

मैं अपने भक्तों के कष्ट को सहन नहीं कर सकता । अपने सिवा मैं और किसी को भक्त की सेवा के योग्य नहीं समझता । इसलिए मैंने तुम्हारी सेवा की है । तुम जानते हो कि प्रारब्धकर्म भोगे बिना नष्ट नहीं होते हैं— यह मेरा नियम है और मैं यह क्यों तोडूं ।

श्रीकृष्णकृपा से मल मास बन गया पुरुषोत्तम मास

जिसे सबने अपमानित व तिरस्कृत किया हो, उसे अपना बनाकर, अपना नाम व समस्त गुण दे देना; यही है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की शरणागत वत्सलता और यही है मल मास के अत्यन्त पवित्र ‘पुरुषोत्तम मास’ बनने का का रहस्य ।

भगवान विष्णु का पाषाणरूप है शालग्राम

तुलसी को छलने के कारण भगवान श्रीहरि को शाप देते हुए तुलसी ने कहा कि आपका हृदय पाषाण के समान है; अत: अब मेरे शाप से आप पाषाणरूप होकर पृथ्वी पर रहें । भगवान का वह पाषाणरूप ही शालग्राम हैं । शालग्राम शिला में भगवान की उपस्थिति का सबसे सुन्दर उदाहरण श्रीवृन्दावनधाम में श्रीराधारमणजी हैं जो शालग्राम शिला से ही प्रकट हुए हैं ।

क्या संतों को भगवान के दर्शन होते हैं ?

मैं उसके पीछे-पीछे गिरिराज तक दौड़ता हूँ । गिरिराज पर्वत पर आकर मुझे लगता है कि वह मेरे पीछे खड़ा है तो मैं उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ता हूँ और वह मुझे कुसुम सरोवर तक ले आता है । इस तरह कई दिनों से मैं उसे पकड़ने के लिए कुसुम सरोवर से गिरिराज पर्वत और गिरिराज से कुसुम सरोवर तक की दौड़ लगा रहा हूँ ।’