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कभी-कभी भक्त सोचता है कि मैं ही भगवान का ध्यान रखता हूँ, परन्तु सच तो यह है कि भगवान अपने भक्त को कितना प्यार करते है, कितना उसका ध्यान रखते हैं, यह सोचा भी नहीं जा सकता । यह कथा भक्त और भगवान के बीच प्रेम को दर्शाती है । भक्त ही भगवान के लिए कष्ट सहन नहीं करता बल्कि भगवान भी भक्त के लिए कितना कष्ट उठाते हैं, उसका योगक्षेम कैसे वहन करते हैं, यही इस कथा का सार है ।

बलदाऊजी की अनन्य भक्त गोपीबाई

गोपीबाई गांव के प्रतिष्ठित परिवार की विधवा बहू थी । उसकी बेटियों की शादी हो चुकी थी और बेटा ससुराल की सम्पत्ति मिलने के कारण ससुराल में ही रहता था । वह घर में अकेली ही रहती थी ।

गांव में बलदाऊजी का विशाल मन्दिर था । बलदाऊजी की अनन्य भक्त होने के कारण गोपीबाई प्रतिदिन उनके दर्शन कर के ही भोजन किया करती थी और व्रत-उपवास ज्यादा करती थी । गोपीबाई ने पुरुषोत्तम मास में एक माह का निराहार व्रत किया था । आज व्रत के विसर्जन का दिन था ।

गोपीबाई के यहां बरौनी नाम की स्त्री रोजाना प्रात:काल गांव के कुएं से पानी भर जाया करती थी किन्तु आज वह नहीं आई । गोपीबाई को आज पानी की सख्त जरुरत थी क्योंकि व्रत के विसर्जन का दिन होने से भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाना था । गोपीबाई ने बरौनी की पानी लाकर देने की बहुत मिन्नतें कीं पर उसने साफ कह दिया कि ‘मैं न आपका उपवास जानती हू न व्रत, अब यह काम मुझसे न होगा, मैं अब कुएं से पानी नहीं भर पाऊंगी ।’

एक माह से अन्न न खाने से गोपीबाई बहुत दुर्बल हो गयी थी । जेठ की चिलचिलाती धूप में बाहर निकलना भी कठिन था ।  गांव के गहरे कुएं से पानी खींच कर निकालने की उसमें ताकत न थी । जब बरौनी ने पानी लाकर देने से मना कर दिया तो वह दु:खी होकर भगवान के सामने रोने लगी । उसने मन में सोच लिया कि अगर आज भगवान पानी का प्रबन्ध नहीं करते हैं तो मैं भोजन नहीं बनाऊंगी । वह दरवाजा बन्द कर लेट गयी और आज बलदाऊजी के दर्शन करने भी नहीं गयी ।

अपने भक्तों का दु:ख सहन नहीं कर पाते हैं भगवान

‘बड़ी मां ! बड़ी मां !’ बाहर से किसी ने आवाज दी । गोपीबाई की नींद खुल गई । उन्होंने लेटे-लेटे ही पूछा—‘कौन है ?’ बाहर से आवाज आई ‘मैं श्याम हूँ ।’ गोपीबाई ने कहा—‘किवाड़ खुले पड़े हैं, अन्दर आ जाओ ।’

बलदाऊजी के मन्दिर के पुजारी का बेटा श्याम अन्दर आ गया । आते ही उसने कहा—‘आपको भूख लग रही होगी । आप भोजन तैयार कीजिए, मैं पानी लाया हूँ ।’

गोपीबाई ने अनमने स्वर में कहा—‘मैं खाना नहीं बनाऊंगी । इस गांव में मेरी कोई इज्जत ही नहीं है । यहां मुझे खाना बनाने के लिए भी पानी नहीं मिल रहा है । मैं तो यहां बलदाऊजी के दर्शनों के लोभ से रह रही हूँ । कल ही अपने पुत्र के पास दूसरे गांव चली जाऊंगी ।’

श्याम ने कहा—‘आज आप इस जल से भोजन तैयार कीजिए, कल सब प्रबन्ध हो जाएगा ।’ गोपीबाई की दृष्टि श्याम के हाथ में पकड़े पानी से भरे तांबे के लोटे पर गई । वह उस लोटे को बहुत अच्छी तरह पहचानती थी क्योंकि वह बलदाऊजी के मन्दिर के पूजन का लोटा था । श्याम ने कहा—‘पानी कहां रख दूँ, बड़ी मां ?’ गोपीबाई ने अपने बर्तन की ओर इशारा कर दिया । श्याम ने बर्तन में पानी डालते हुए कहा—‘तुम्हें मेरी सौगन्ध है बड़ी मां, भोजन अवश्य बना लेना, अब मैं जा रहा हूँ ।’

श्याम के जाते ही गोपीबाई को लगा कि उससे कुछ भूल हो गयी है । ब्राह्मण का बेटा दोपहर को प्रचण्ड गर्मी में पानी लेकर आया, मुझे भोजन बनाने की सौगन्ध दे गया पर मैंने उसे कुछ भी नहीं दिया ।’ गोपीबाई ने तुरन्त भोजन बनाया, भगवान को भोग लगाया और आज एक महीने बाद अन्न ग्रहण किया । शरीर की कमजोरी दूर हुई ।

गोपीबाई मन-ही-मन कहने लगीं—‘ब्राह्मण के बालक द्वारा लाया हुआ जल मैंने खर्च किया है, इसलिए मेरा यह कर्तव्य है कि मैं मन्दिर जाकर श्याम को कुछ पैसे दे आऊं ।’ ऐसा सोचकर वह मन्दिर चली गयी । मन्दिर में भगवान बलभद्र की प्रसन्न चित्त छवि को निहार कर गोपीबाई अपनी सुध-बुध खो बैठी । उन्होंने पुजारी से श्याम को बुला देने को कहा ।

पुजारीजी ने उत्सुकता से पूछा—‘श्याम से क्या काम है ?’ गोपीबाई ने पुजारी को दोपहर का सारा किस्सा सुना दिया और कहा—‘मैं ब्राह्मण के हाथ का पानी बिना कुछ दिए कैसे पी सकती हूँ ? अत: आप ये पैसे श्याम को दे देना ।’

गोपीबाई की बात सुनकर पुजारी हक्का-बक्का रह गया और बोला—‘श्याम तो एक महीने से अपने मामा के यहां गया हुआ है । आप यह क्या कह रही हैं ?’

यह सुनकर गोपीबाई स्तब्ध रह गयी और गुमसुम-सी घर लौट आई । आते ही उसने देखा कि जिस बर्तन में श्याम ने पानी भरा था, वह अब भी पूरा भरा हुआ है । घड़े का जल उसने अपने मस्तक पर लगाया और भगवान के पास जाकर रोकर कहने लगी—‘आपने मेरे लिए इतना कष्ट उठाया ।’

यह बात सब जगह फैल गई कि आज स्वयं बलदाऊजी श्याम बनकर गोपीबाई का पानी भर गए ।

श्रीमद्भागवत में भगवान का कहना है—मैं अपने भक्तों के पीछे-पीछे यह सोचकर घूमा करता हूँ कि उनके चरणों की धूल उड़कर मेरे शरीर पर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊं ।’

यही है भक्ति की शक्ति ।

दु:ख में, सुख में सदा श्याम को याद करो ।
वो हैं पालनहार जगत के सदा उन्हीं से फरियाद करो ।
चिंता में पड़कर ना कभी समय को बर्बाद करो ।
हों हालात कैसे भी, बस उन्हीं पर विश्वास करो ।।

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