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भगवान विष्णु का हंस अवतार

भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में बीसवां ‘हंस अवतार’ है । श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को अपने ‘हंसावतार’ की कथा सुनाई है । भगवान के हंसावतार की सम्पूर्ण जानकारी ।

विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ की महिमा

एक बार युधिष्ठिर ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण ध्यान में बैठे हैं । ध्यान पूर्ण होने पर युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा—‘प्रभु ! सब लोग आपका ध्यान करते हैं, आप किसका ध्यान कर रहे थे ?’ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—‘मेरा भक्त गंगा तट पर शरशय्या पर पड़ा मेरा ध्यान कर रहा है और मैं अपने उस प्रिय भक्त का ध्यान कर रहा हूँ ।’

पाद-सेवन भक्ति की आचार्या लक्ष्मीजी

लक्ष्मीजी जिस पर कृपा करती हैं, तो उनका मद दूसरों को हो जाता है, लेकिन स्वयं लक्ष्मीजी को अपने गुणों, ऐश्वर्य, श्री का मद नहीं होता है क्योंकि भगवान नारायण सदैव लक्ष्मी से विरत रहते हैं । जानें, इसकी सुन्दर व्याख्या ।

भगवान के हरिहर स्वरूप का क्या है रहस्य ?

इतने में देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुण गाते वहां पधारे । तब पार्वतीजी ने नारदजी से इस समस्या का हल निकालने के लिए कहा । नारदजी ने हाथ जोड़कर कहा–‘मैं इसका क्या हल निकाल सकता हूँ । मुझे तो हरि और हर एक ही लगते हैं; जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है ।’

कलियुग के प्रत्यक्ष भगवान : वेंकटेश्वर बालाजी

भगवान ने उन्हें अपने आलिंगन में लेकर अपने दांये और बायें वक्ष:स्थल में रख लिया । भगवान श्रीहरि जगत के कल्याण के लिए भूलोक आए थे केवल दो स्त्रियों की रक्षा के लिए नहीं; इसलिए चुपचाप वे सात कदम पीछे चले । तभी एक भयंकर ध्वनि हुई और वे शिलाविग्रह में परिवर्तित हो गए । तभी आकाशवाणी हुई—‘अब से मैं कलियुग के अंत तक वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से इसी रूप में रहूंगा । अपने भक्तजनों की मनोकामना पूरी करना ही मेरा व्रत है ।’

भगवान वेंकटेश्वर को नैवेद्य मिट्टी के पात्रों में क्यों निवेदित किया...

तभी एक विमान जिसमें साक्षात् भगवान विष्णु विराजमान थे, आकाश से उतरा । कुम्हार की पत्नी ने भगवान को मिट्टी से बने पीढ़े पर बैठाया, मिट्टी के पात्र में ही जल और रूखा-सूखा भोजन परोस दिया । भगवान के समक्ष हाथ जोड़ कर दोनों पति-पत्नी ने कहा—‘भगवन् ! हम अत्यन्त दरिद्र हैं, जो कुछ हमारे पास है, वही आपकी सेवा में निवेदित कर रहे हैं, इसे स्वीकार कीजिए ।

देवता और पितर दोनों को क्यों प्रिय हैं तिल ?

माघी पूर्णिमा के दिन कांस्य पात्र में तिल भरकर इस भावना से दान करें कि ‘मां इन तिलों की संख्या से अधिक दु:ख तुमने मेरे लिए सहन किए हैं । अत: इस तिलपात्र के दान से मैं तुम्हारे मातृ-ऋण से उऋण हो जाऊं ।’ इस प्रकार इस दिन माता के निमित्त जो भी कुछ दान दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है ।

भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना वाहन क्यों बनाया ?

गरुड़जी भगवान विष्णु के परिकर ही नहीं दास, सखा, वाहन, आसन, ध्वजा, वितान (छतरी, canopy) एवं व्यजन (पंखा) के रूप में जाने जाते हैं । जानें, गरुड़जी को सुपर्ण क्यों कहा जाता है ?

भगवान विष्णु का द्वादशाक्षर मन्त्र

द्वादशाक्षर मन्त्र बहुत ही प्रभावशाली मन्त्र है । मनुष्य सत्कर्म करते हुए सोते-जागते, चलते, उठते भगवान के इस द्वादशाक्षर मन्त्र का निरन्तर जप करता है तो वह सभी पापों से छूट कर सद्गति को प्राप्त होता है । लक्ष्मी की बड़ी बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रा) भगवान के नाम को सुनकर उस घर से तुरन्त भाग खड़ी होती है ।

भगवान विष्णु का सद्गुरु रूप में ‘दत्तात्रेय’ अवतार

भगवान विष्णु ने दत्तात्रेयजी के रूप में अवतरित होकर जगत का बड़ा ही उपकार किया है । उन्होंने श्रीगणेश, कार्तिकस्वामी, प्रह्लाद, परशुराम आदि को अपना उपदेश देकर उन्हें उपकृत किया । कलियुग में भी भगवान शंकराचार्य, गोरक्षनाथजी, महाप्रभु आदि पर दत्रात्रेयजी ने अपना अनुग्रह बरसाया । संत ज्ञानेश्वर, जनार्दनस्वामी, एकनाथजी, दासोपंत, तुकारामजी—इन भक्तों को दत्तात्रेयजी ने अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया ।