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देवमन्दिर की साफ-सफाई करने का महत्व

भगवान की सेवा करते समय बहुत सावधान रहने की आवश्यकता होती है । सेवा करते समय जरा भी मन में यह विचार आया कि ‘मैं ये कार्य करता हूँ’ आदि तो इससे अभिमान आता है और वह सभी किए कराए पर पानी फेर देता है । अभिमान मनुष्य को पतन के रास्ते पर ले जाता है ।

रानी तेरो चिर जियो गोपाल

नंदबाबा ब्रज के राजा हैं तो माता यशोदा ब्रज की रानी हैं । गोपियां लाला को आशीर्वाद देते हुए कहती है— ‘रानी ! तेरा गोपाल चिरंजीवी हो । ये जल्दी से बड़ा होकर सुंदर नवयुवक हो । माता ! ये तुम्हारे पुण्यों से तुम्हारी कोख से जन्मा है । ये समस्त ब्रज का जीवनप्राण है, आंख का तारा है; लेकिन शत्रुओं के हृदय का कांटा है । तमाल वृक्ष की तरह इस श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण को देख कर मन को कितना सुख मिलता है । इसकी चरण-रज के लगाने से ही ब्रजवासियों के सारे रोग-शोक और जंजाल मिट जाएंगे ।

भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण की संत पीपाजी पर कृपा

परमात्मा प्रेम चाहते हैं । प्रेम में पागल बने बिना वे मिल नहीं सकते । भक्त भगवान को पाने के लिए जितना व्याकुल होता है, भगवान भी उन्हें अपनी शरण में लेने के लिए उससे कम व्याकुल नहीं होते हैं । जिन भक्तों का जीवन प्रभुमय हो, रोम-रोम में भगवान का प्रेम बहता हो, वे भक्त प्रेममय प्रभु की करुणामयी और कृपामयी गोद में बैठने और उनका साक्षात्कार करने के अधिकारी बनते हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण का उत्तंक मुनि को अपने विश्वरूप के दर्शन कराना

भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और उन्होंने उत्तंक मुनि को अपना विराट स्वरूप दिखाया । श्रीकृष्ण के इस रूप में सारा विश्व उनके अंदर दिखाई पड़ रहा था और संपूर्ण आकाश को घेर कर खड़ा हुआ था । हजारों सूर्यों और अग्नि के समान उनका प्रकाश था, बड़ी-बड़ी भुजाएं थीं, सब दिशाओं में उनके अनंत मुख थे ।

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की शिक्षाओं का सार है ‘शिक्षाष्टक’

प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी श्रीचैतन्य महाप्रभु ने किसी ग्रंथ की रचना नहीं की । इनके मुख से आठ श्लोक ही निकले बताये जाते हैं, जो ‘शिक्षाष्टक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं । वैष्णवों के लिए तो यह ‘शिक्षाष्टक’ कंठहार-स्वरूप है ।

भगवान श्रीकृष्ण का सोलह हजार राजकन्याओं के साथ विवाह

ये सोलह हजार राजकन्याएं निराधार होकर भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आईं । भगवान ने सोचा—ये बेचारी अपना जीवन कैसे व्यतीत करेंगी, ये तो बहुत दु:खी हैं । इसलिए भगवान ने निश्चय किया—मैं इन राजकन्याओं के साथ विवाह करुंगा । परमात्मा ने कृष्णावतार में निश्चय किया कि रामावतार में मैं मर्यादा में बंधा था किंतु अब लोग चाहें कुछ भी कहें; मुझे जो उचित लगेगा, वही करना है ।

भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर वध लीला

पुराणों के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) को भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर संसार को भय मुक्त किया था; इसलिए इस दिन हर प्रकार के भय से मुक्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण की इस मंत्र से पूजा-अर्चना करनी चाहिए, इससे मनुष्य नरक का भागी नहीं होता है ।

भगवान श्रीकृष्ण की विश्वरूप-दर्शन लीला

भगवान श्रीकृष्ण ने अपना विश्वरूप-दर्शन कराकर अर्जुन को यह शिक्षा दी कि मैं ही सब कुछ हूँ, संसार में सब मेरा ही स्वरूप है । मेरे अतिरिक्त जो भी दिखाई देता है, वास्तव में वह भ्रम ही है । अनन्य भक्ति द्वारा ही मैं प्राप्य हूँ; इसलिए जो मेरे लिए कर्म करने वाला, मेरे परायण, मेरा भक्त, अनासक्त तथा सब प्राणियों में वैर रहित होता है; वह ही मुझे प्राप्त होता है ।

विभिन्न वस्तुओं द्वारा श्रीकृष्ण पूजन का फल

इस घोर कलिकाल में श्रीकृष्ण की पूजा-सेवा मनुष्य का बेड़ा पार लगाने वाली है; लेकिन शर्त यह है कि इस पूजा में भाव होना चाहिए । क्योंकि पत्थर की ही सीढ़ी और पत्थर की ही देव-प्रतिमा होती है; परन्तु एक पर हम पैर रखते हैं और दूसरे की पूजा करते हैं । अत: भाव ही भगवान हैं अन्यथा सब बेकार है ।

दुर्वासा ऋषि द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की माया का दर्शन

भगवान की लीला बड़ी विचित्र है । वे कब कौन-सा काम किस हेतु करेंगे, इसे कोई नहीं जानता । भगवान की प्रत्येक लीला ऐसे ही रहस्यों से भरी होती है । उनकी लीला और महिमा का कोई पार नहीं पा सकता । उनका मूल उद्देश्य अपने भक्तों को आनन्द देना और भवबन्धन से मुक्त करना है ।