vishnu bhagwan lying on shehsnaag

सृष्टि के साथ ही भगवान ने मनुष्य के मन-बुद्धि व हृदय के भीतर भगवन्भावना को बनाए रखने के लिए  उसकी जिह्वा (जीभ) पर अपने-आप ही भगवन्नाम को प्रकट किया । इसीलिए जब प्राणी पर विपत्ति आती है, दु:ख पड़ता है या अमंगल आता हुआ दिखाई देता है तो स्वत: ही उसके मुख से ‘हे राम!’ या ‘हाय राम’’ या ‘हे भगवान’ या  ‘हे गोविन्द’ आदि भगवान के नाम निकलने लगते हैं ।

इस संसार में सब पदार्थों का मूल परमात्मा है । परमात्मा ही विश्व रूप में सब जगह व्याप्त है, इसीलिए विष्णुसहस्त्रनाम में भगवान का पहला नाम ‘विश्व’ आया है । इसी प्रकार परमात्मा चेतन होने के कारण ‘प्राण’, संसार (प्रपंच) का विस्तार होने के कारण ‘ब्रह्म’, सर्व्यापक होने के कारण ‘विष्णु’, योगियों के चित्त को अपने में रमाने के कारण ‘राम’ और सभी लोगों के चित्त को आकर्षित करने के कारण ‘कृष्ण’ व छहों ऐश्वर्यों से युक्त होने के कारण ‘भगवान’ के नाम से जाना गया है । ब्रह्मा, शिव, नारायण, हरि, गॉड व वैदिक मन्त्रों में इन्द्र, चन्द्र, वायु, वरुण, सूर्य, अग्नि, प्रजापति–ये सब भी उन्हीं के नाम हैं ।

उसी परमात्मा की आनन्दमयी शक्ति भी अनेक नाम से जानी जाती है—विष्णु रूप में ‘श्री’, राम रूप में ‘सीता’ और कृष्ण रूप में ‘राधा’  शिव रूप में ‘दुर्गा’, ‘काली’, ‘तारा’ व ‘अन्नपूर्णा’ आदि ।

कौन से शब्द भगवन्नाम कहलाते हैं ?

यदि सम्पूर्ण दिखाई देने वाला जगत भगवान का ही रूप है तो कोई भी सार्थक या निरर्थक शब्द भी भगवान के नाम के रूप में रटा जा सकता है, फिर हम राम, कृष्ण, गोविन्द, हरि, नारायण, शिव, दुर्गा या गणपति–जैसे विशेष शब्दों को ही भगवन्नाम क्यों मानते हैं और पुराणों में इनका ही जप करने को क्यों कहा गया है ?

शास्त्रों में इसका स्पष्ट कारण बताया गया है—

प्रकृति त्रिगुणात्मका है (तीन गुण—सत्, रज और तम से बनी है) । इसमें कुछ पदार्थ सत्त्वगुण-प्रधान, कुछ रजोगुण-प्रधान तो कुछ तमोगुणी होते हैं । ठीक ऐसे ही, जो शब्द हम उच्चारण करते हैं, वे भी त्रिगुणात्मक होते हैं–कोई शब्द सात्विक होते हैं, कोई राजस तो कोई तामस प्रभाव उत्पन्न करने वाले होते हैं । कुछ शब्द दिव्य प्रभाव उत्पन्न करने वाले होते हैं । ऋषि-मुनियों ने उनका जप-अनुष्ठान किया इससे उनमें अपार शक्ति आ गयी है । इसीलिए उन शब्दों को हम ‘भगवन्नाम’ मानते हैं ।

मनुष्यों की सुविधा के लिए महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी ने भगवान के अनन्त नामों में से सहस्त्रनामों (1008 नामों) का स्त्रोत ही रच दिया, जिनका भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को उपदेश किया था । इन नामों का जप ही मनुष्य के लिए सर्वोत्तम धर्म बताया गया है ।

भगवान के अनेक नाम क्यों होते हैं ?

प्रश्न यह है कि परमात्मा के इतने (1008)  नाम क्यों रचे गये ? सब को जपने के लिए ईश्वर का कोई एक ही नाम क्यों न निश्चित कर दिया गया ?

संतों ने भगवान के अनेक नाम होने के कई कारण बताये हैं—

▪️भगवान के विभिन्न नाम उनके विभिन्न चरित्रों के आधार पर रखे गए हैं । भगवान के चरित्र अनन्त हैं, तब उनके चरित्रानुसार नाम भी अनन्त हैं । भगवान विविध नामों में और विचित्र रूपों में अवतीर्ण होकर विचित्र रस के खेल खेलकर माया से मोहित सांसारिक जीवों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और उनको सब प्रकार की भ्रांति और दुखों से मुक्त करने तथा अपना परमानन्द देने का प्रयास करते हैं ।

▪️संसार में असंख्य लोग हैं । विभिन्न रुचि, प्रकृति और संस्कारों के मनुष्यों के लिए भगवान ने स्वयं को अनेक नामों से व्यक्त किया है । प्रत्येक नाम का अर्थ वह परमात्मा ही है । सभी नाम उसी एक परमात्मा की महिमा को बताने वाले हैं । प्रत्येक नाम के भीतर उन्होंने अपनी असीमित कल्याणकारी शक्ति व प्रकाश निहित कर रखा है ।

▪️सब मनुष्य एक रुचि या एक स्वभाव के नहीं हैं । कोई नमक कम खाता है कोई अधिक; किसी को मीठा पसन्द है, किसी को खट्टा या चरपरा । भोजन रुचि के अनुकूल हो तभी उसका ठीक पाचन होता है और वह स्वास्थ्यप्रद बनता है । भोजन जैसी चीज के लिए भी जब रुचि का इतना ध्यान रखा जाता है, तब साधना का सम्बन्ध तो अनन्त जीवन से होता है । ऐसे में मनुष्य की रुचि का ध्यान न रखा जाए तो क्या परिणाम होगा ? कोई मनुष्य स्वभाव से क्रोधी, कोई शान्त, कोई हंसमुख तो कोई गम्भीर प्रकृति का होता है । अपनी रुचि, अपने स्वभाव के अनुसार साधन होगा, तब भगवान में मनुष्य का आकर्षण होगा; उसका मन लगेगा । शान्त स्वभाव के व्यक्ति का भैरव की उपासना में मन नहीं लगेगा; इसी प्रकार उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति का कन्हैया की लीलाओं के प्रति आकर्षण नहीं होगा । इसीलिए अलग-अलग रुचि के अनुसार भगवान के रूप व नाम भी अलग हैं । मोक्ष की इच्छा वाला व्यक्ति विष्णु, मधुर और प्रेम भाव के लिए श्रीकृष्ण, मर्यादाप्रेमी को श्रीराम, दास्य भाव की भक्ति पसन्द करने वाले को हनुमान और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य शिव नाम का जप करना पसन्द करेगा ।

▪️जैसे सभी विद्यार्थी एक ही योग्यता के नहीं होते, उन्हें एक ही कक्षा में नहीं बैठाया जा सकता, इसी तरह सभी व्यक्ति एक ही योग्यता के नहीं होते, सभी को एक ही तरह की साधना नहीं कराई जा सकती । इसलिए जो व्यक्ति जैसी योग्यता का है, अपने पिछले जीवन में जिस साधन के क्रम में चला आ रहा है, उसके लिए वैसा ही साधन, वैसा ही भगवन्नाम उपयुक्त है ।

भगवान के सभी नाम समान महत्त्व रखते हैं, किसी भी नाम में ऊंच-नीच का भाव न रखकर अपने लिए जो भी नाम विशेष रुचिकर जान पड़े, उसी का जप करना चाहिए । श्रुतियां कहतीं हैं कि परमात्मा अग्राह्य है अर्थात् पकड़ में नहीं आ सकता लेकिन ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे परमात्मा हमारी पकड़ में आ सके ? ऋषियों ने अपने तपोबल से, भक्तों ने अपनी अगाध भक्ति से और योगियों ने समाधि द्वारा ऐसा अमोघ उपाय खोज निकाला जिसके द्वारा परमात्मा पकड़ में आ सकता है और वह उपाय है–’भगवान के विभिन्न नापों का जप ।’

श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर माता यशोदा खिन्न हो गईं तब श्रीराधाजी ने माता यशोदा को समझाते हुए कहा–‘आप अपने ऐश्वर्यशाली पुत्र (जो साक्षात् परमात्मा और ईश्वर है), के राम, नारायण, अनन्त, मुकुन्द, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसारि, हरि, वैकुण्ठ और वामन–इन ग्यारह नामों का उत्तम भक्ति के साथ भजन करो । इनके उच्चारण करने मात्र से मनुष्य कोटि जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है ।’

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