bhagavad gita bhagvat gita

गीता अलौकिक ग्रन्थ व ज्ञान का अथाह समुद्र है । इसका अध्ययन करने पर नये-नये भाव मिलते हैं और थोड़ा अधिक गहराई से अध्ययन करने पर और भी गूढ़ भाव मिलते चले जाते हैं । गीता को समझने में अभिमान बहुत बड़ी बाधा है । यदि कोई व्यक्ति अपनी विद्वत्ता—बुद्धि व योग्यता के बल पर गीता का अर्थ समझना चाहे तो वह उसे नहीं समझ सकता है । जब मनुष्य में यह अहंकार रहता है कि—‘मैं कर सकता हूँ ’, तब तक गीता का ज्ञान उससे दूर ही रहता है

जिन्होंने निरभिमान होकर भगवान श्रीकृष्ण व गीता की शरण ले ली है, उनके अनुभव में गीता के अध्ययन से ऐसी-ऐसी बातें आ जाती हैं जो शास्त्रों में कहीं नहीं मिलतीं ।

इसका एक सत्य उदाहरण है जो गीता मनीषी स्वामी रामसुखदासजी ने अपने प्रवचन में सुनाया था—

कलकत्ते में एक मुनीम थे । उनको शुद्ध हिन्दी भी नहीं आती थी । एक दिन उन्होंने स्वामी रामसुखदासजी के पास जाकर कहा—‘स्वामीजी में गीता कण्ठस्थ करना चाहता हूँ परन्तु मेरी इतनी सामर्थ्य नहीं कि मैं किसी पंडितजी से सीख सकूं ।’

स्वामीजी ने उस व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करके व उनके शरणागत होकर गीता पढ़ने की आज्ञा दी ।

उस व्यक्ति ने घर जाकर भगवान श्रीकृष्ण का चित्र रखकर धूप बत्ती की, पुष्प चढ़ाये और ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्’ (हे कृष्ण ! आप ही सारे संसार के गुरु हैं, मुझ अज्ञानी को आप ही गीता का मर्म समझाइए) कहकर गीता का स्वाध्याय करना शुरु कर दिया । कुछ ही समय में उसको पूरी गीता कण्ठस्थ हो गयी ।

कब है गीता का अध्ययन सार्थक

इसे एक सुन्दर कथा से समझा जा सकता है—

एक बार एक विद्वान ब्राह्मण ने राजा के दरबार में जाकर कहा—‘महाराज ! मैंने धर्मग्रन्थों का अच्छा अध्ययन किया है, मैं आपको श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ाना चाहता हूँ ।’

राजा उस विद्वान से भी चतुर था । उसने मन में मन में सोचा—जिस मनुष्य ने श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन किया होगा वह और भी अधिक आत्मचिन्तन करेगा, राजाओं के दरबार की प्रतिष्ठा और धन के पीछे थोड़े ही पड़ा रहेगा ।

ऐसा विचार करके राजा ने ब्राह्मण से कहा—‘महाराज ! आपने गीता का पूर्ण अध्ययन नहीं किया है । मैं आपको अपना शिक्षक बनाने का वचन देता हूँ, परन्तु आप अभी जाकर और अच्छी तरह से गीता का अध्ययन कीजिए ।’

ब्राह्मण राज-दरबार से चला तो गया, परन्तु वह बार-बार मन में यही सोचता रहा कि ‘देखो, राजा कितना बड़ा मूर्ख है ! वह कहता है कि मैंने गीता का पूर्ण अध्ययन नहीं किया है जबकि मैं कई वर्षों से उसका बराबर अध्ययन कर रहा हूँ ।’

ब्राह्मण ने एक बार गीता को फिर पढ़ा और दोबारा राजा के पास पहुंचा । राजा ने ब्राह्मण से फिर पहली बात दोहरा कर उसे विदा कर दिया । ब्राह्मण को इससे दु:ख तो बहुत हुआ, परन्तु उसने मन में विचार किया कि ‘राजा के इस प्रकार कहने का कुछ-न-कुछ मतलब अवश्य है ।’

वह घर जाकर चुपचाप अपनी कोठरी मे बन्द हो गया और पूरी एकाग्रता से गीता का अध्ययन करने लगा । अब ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान‘ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी । धीरे-धीरे गीता के गूढ़ अर्थ का प्रकाश उसकी बुद्धि में जाग्रत होने लगा । तब उसे महसूस हुआ कि ‘सम्पत्ति, मान, द्रव्य और कीर्ति के लिए राजदरबार में या किसी अन्य जगह दौड़ना व्यर्थ है ।’  उस दिन से वह दिन-रात एक चित्त से ईश्वर की आराधना करने लगा और फिर किसी राजा के पास नहीं गया ।

कुछ वर्षों के बाद राजा को ब्राह्मण की याद आई और वह उसकी खोज करता हुआ उसके घर पर आ पहुंचा । ब्राह्मण के दिव्य तेज और प्रेम को देखकर राजा उसके चरणों में गिर कर बोला—‘महाराज ! अब आपने गीता के असली तत्त्व को समझा है; यदि मुझे अब आप चेला बनाना चाहें तो मेरे लिए यह बड़ी प्रसन्नता की बात होगी ।’

लेकिन अब ब्राह्मण बिल्कुल बदल चुका था । उसे तो गीता के वक्ता श्रीकृष्ण ने अपने मोहपाश में बांध लिया था । उसे तो संसार का सबसे बड़ा धन मिल चुका था ।

गीता को समझने के लिए श्रीकृष्ण की शरणागति है जरुरी

गीता भगवान श्रीकृष्ण का संसार को दिया गया प्रसाद है । गीता को समझने के लिए सिर्फ और सिर्फ आवश्यक है श्रीकृष्ण की शरणागति । इसीलिए गीता में शरणागति की बात मुख्य रूप से आई है । गीता शरणागति से ही शुरु होती है और शरणागति में ही समाप्त हो जाती है । गीता के आरम्भ में अर्जुन भगवान की शरण लेकर अपने कल्याण का उपाय पूछते हैं और अंत में भगवान उन्हें अपनी शरण में आने की आज्ञा देते हैं—

यह गीता का शरणागति श्लोक रत्न है—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।। (१८।६६)

अर्थ—समस्त धर्मों को अर्थात् सभी कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ही शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर ।

इसीलिए अपनी शरण में आने वाले पर गीता स्वयं कृपा करती है और उसके सामने अपने वास्तविक तत्त्व को प्रकट कर देती है ।

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