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अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शांर्गधन्वन:।
गायन्माद्यन्निदं तन्त्रया रमयत्यातुरं जगत्।। (श्रीमद्भागवत)

अर्थात्–‘अहो ! ये देवर्षि नारदजी धन्य हैं जो वीणा बजाते, हरिगुण गाते और मस्त होते हुए इस दुखी संसार को आनन्दित करते रहते हैं।’

नारदजी भगवान के मन के अवतार हैं।  इन्हें भगवान का ‘मन’ कहा गया है। भगवान जो भी लीला करना चाहते हैं, वीणापाणि नारदजी द्वारा वैसी ही चेष्टा होती है। नारदजी भगवान के विशेष कृपापात्र और लीलासहचर हैं। जब-जब भगवान का अवतार होता है, ये उनकी लीला के लिए भूमि तैयार करते हैं, लीला के लिए उपयोगी साधनों का संग्रह करते हैं और अन्य प्रकार की सहायता करते हैं।

देवर्षि नारद स्वयं अपनी स्थिति के विषय में कहते हैं–’जब मैं उन परमपावन प्रभु के गुणों का संकीर्तन करने लगता हूँ, तब वे प्रभु अविलम्ब मेरे चित्त में बुलाये हुए की भांति प्रकट हो जाते हैं।’

भक्त-कीर्तनाचार्य-मुकुटमणि, करते सदा नाम-गुण-गान।
अखिल विश्व में विचरण कर, वे वितरण करते नाम महान।।
लगे नाचने भाव-मग्न हो, छेड़ी मधुर मनोहर तान।
आवाहित-से तुरत आ गये, वीणा सुनते ही भगवान।। (पद-रत्नाकर)

नारदजी कीर्तन के परमाचार्य व भागवत-धर्म के प्रधान बारह आचार्यों (ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, महर्षि कपिल, स्वायम्भुव मनु, भक्त प्रहलाद, राजा जनक, भीष्मपितामह, राजा बलि, शुकदेवजी, श्रीयमराज) में से एक हैं। उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी पर घर-घर में भक्ति की स्थापना करने की प्रतिज्ञा की है। जीवों पर कृपा करने के लिए वे निरन्तर त्रिलोकी में घूमा करते हैं। वे कभी भी कहीं भी आ-जा सकते हैं। सभी युगों में, सभी लोकों में, सभी शास्त्रों में, सभी समाजों में और सभी कार्यों में नारदजी का प्रवेश है।

देवर्षि नारद का स्वरूप

देवर्षि नारद  ब्रह्मतेज से सम्पन्न व अत्यन्त सुन्दर हैं। वे शांत, मृदु और सरल स्वभाव के हैं। उनका शुक्ल वर्ण है। उनके सिर पर शिखा शोभित है। उनके शरीर से दिव्य कांति निकलती रहती है। वे देवराज इन्द्र द्वारा प्राप्त दो उज्जवल, श्वेत, महीन और बहुमूल्य दिव्य वस्त्र धारण किए रहते हैं। भगवान द्वारा प्रदत्त वीणा सदैव उनके पास रहती है। इनकी वीणा ‘भगवज्जपमहती’ के नाम से विख्यात है, उससे अनाहत नाद के रूप में ‘नारायण’ की ध्वनि निकलती रहती है। अपनी वीणा पर तान छेड़कर भगवान की लीलाओं का गान करते हुए ये सारे संसार में विचरते रहते हैं। कब किसका क्या कर्तव्य है, इसका उन्हें पूर्ण ज्ञान है। ये ब्राह्ममुहुर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं और सभी जीवों के कर्मों के साक्षी हैं। वे आज भी अजर-अमर हैं।

महाभारत में वर्णित देवर्षि नारदजी के गुण

देवर्षि नारद ज्ञान के स्वरूप, भक्ति के आचार्य, प्रेम के भण्डार, दया के निधान, आनन्द के सागर, सदाचार के आधार व समस्त सद्गुणों की खान हैं।

महाभारत में कहा गया है कि देवर्षि नारद समस्त वेदों के ज्ञाता, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, अतीत की बातों को जानने वाले, योगबल से समस्त लोकों की बातों का पता रखने वाले, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के तत्त्व को जानने वाले, धर्मतत्त्व के ज्ञाता, समस्त प्रमाणों द्वारा वस्तु का विचार करने में समर्थ हैं। वे असाधारण पंडित, संगीत विशारद, प्रभावशाली वक्ता, वेदान्त, योग, ज्योतिष व आयुर्वेद के ज्ञाता, नीतिज्ञ, कवि, ज्ञानी, तेजस्वी, विद्या के भण्डार, अपार तेजस्वी, सब मनुष्यों से प्रेम करने वाले और विश्व के सहज हितकारी हैं। उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं है, प्रभु की प्रेरणा से ही वे कार्य किया करते हैं। यद्यपि इन्हें कलह-प्रिय भी कहा गया है किन्तु इनका उद्देश्य सदैव परोपकार ही रहा है। ये सभी शास्त्रों के ज्ञाता हैं। इन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की पत्नियों–जाम्बवतीजी, सत्यभामाजी तथा रुक्मिणीजी की दीर्घकाल तक सेवा कर संगीत-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया था। मुक्ति की इच्छा रखने वाले साधु पुरुषों के हित के लिए नारदजी सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।

देवर्षि नारद के पूर्वजन्म की कथा

नारदजी के पूर्वजन्मों की अनेक कथाएं पुराणों में बतायी गई हैं। इनके एक जन्म का नाम उपबर्हण है। कहीं इन्हें ब्रह्माजी का पुत्र तथा कहीं भगवान विष्णु का मानस अवतार और कहीं परमात्मा का मन बताया गया है तो कहीं भगवत्पार्षदों में इनकी गणना है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार नारदजी ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं। वे उनके कण्ठ से उत्पन्न हुए हैं। पिता द्वारा सृष्टि कार्य के निमित्त आज्ञा देने पर इन्होंने उसका पालन नहीं किया। योगी नारदजी ने विषय-भोग को ईश्वर-भजन में सबसे बड़ी बाधा माना और कहा–अमृत से भी अधिक प्रिय श्रीकृष्ण-सेवा छोड़कर कौन मूर्ख विषय नामक विष का भक्षण करेगा। इससे पिता ने शाप दिया–’नारद ! तुमने मेरी अवहेलना की है, अत: मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जायेगा और तुम गन्धर्वयोनि को प्राप्तकर कामविलास रत स्रियों के वशीभूत हो जाओगे।’ नारदजी ने दुखी होकर कहा–’कुमार्गी पुत्र को शाप देना उचित है किन्तु पिता का तेजस्वी पुत्र को शाप देना कैसे उचित है? फिर भी इतनी कृपा कीजिए जिन-जिन योनियों में मेरा जन्म हो, वहां भगवान की भक्ति मुझे कभी न छोड़े। हे पिताजी ! आपने मुझे बिना अपराध के शाप दिया है अत: मैं भी आपको यह शाप देता हूँ कि तीन कल्पों तक लोक में आपकी पूजा नहीं होगी और आपके मन्त्र, स्त्रोत, कवच आदि का लोप हो जायेगा।’

पिता के इसी शाप के कारण ये गन्धर्व योनि में उत्पन्न हुए। इनका नाम उपबर्हण था। ये कामदेव के समान बहुत सुन्दर थे और इन्हें अपने रूप का बहुत गर्व था। एक बार ब्रह्माजी की सभा में सभी देवता और गंधर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आए। उपबर्हण (नारदजी) भी अपनी पत्नियों के साथ उस सभा में गए। भगवान के संकीर्तन में कामियों की भांति विनोद करते हुए देखकर ब्रह्माजी ने इन्हें शूद्र होने का शाप दे दिया। उस शाप के प्रभाव से नारदजी का जन्म एक शूद्रकुल में हुआ। जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गयी। इनकी माता एक भगवद्भक्त ब्राह्मण की दासी थीं। दासी का कार्य करके वे इनका भरण-पोषण करती थीं और अपने पुत्र से बहुत स्नेह करती थीं। पर दासी होने के कारण उनका समय उस ब्राह्मण की सेवा में ही अधिक लगता था। नारदजी बड़े ही सदाचारी, संयमी, गम्भीर बालक थे। वे बहुत कम बोलते थे। जब नारदजी की अवस्था पांच वर्ष की थी, एक दिन इनके गांव में चातुर्मास्य बिताने के लिए कुछ महात्मा आये। नारदजी महात्माओं की बड़ी मन से सेवा करते और तन्मय होकर भगवत्कथा सुनते थे। स्वयं नारदजी ने भगवान वेदव्यास से कहा है–

’व्यासजी ! उस समय यद्यपि मैं बहुत छोटा था, फिर भी मुझमें चंचलता नहीं थी। मैं जितेन्द्रिय था। दूसरे सब खेलों को छोड़कर साधुओं की आज्ञानुसार उनकी सेवा में लगा रहता था। वे संत भी मुझे भोला-भाला बालक जानकर मुझ पर बड़ी कृपा करते थे। मैं शूद्रा का बालक था और उन संतों की अनुमति से उनके बर्तनों में लगा हुआ अन्न दिन में एक बार खा लिया करता था। इससे मेरे हृदय का सब कल्मष दूर हो गया और मेरा चित्त शुद्ध हो गया। संत जो परस्पर भगवान की चर्चा करते थे, उसे सुनने में मेरी रुचि हो गयी। मुझे नित्य उन महात्माओं से भगवान की लीला-कथाओं का श्रवण-लाभ मिलने लगा। चातुर्मास्य समाप्त कर जब वे साधुगण जाने लगे, तब मुझ दासीपुत्र की दीनता, नम्रता आदि देखकर मुझपर उन्होंने कृपा की। उन्होंने मुझे भगवन्नाम का जप और भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया।’

साधुओं के चले जाने के कुछ समय बाद उनकी मां रात के अंधेरे में अपने स्वामी की गाय दुह रही थी कि सांप के काटने से उनकी मृत्यु हो गयी। सत्संग के प्रभाव से माता की मृत्यु को भी इन्होंने भगवान का अनुग्रह माना। स्नेहवश माता इन्हें कहीं जाने नहीं देती थी। माता का वात्सल्य भी एक बंधन ही था जिसे भक्तवत्सल प्रभु ने दूर कर दिया। पांच वर्ष की अवस्था थी। न देश का पता था और न काल का। नारदजी भगवान के भरोसे उत्तर की ओर वन में चलते ही चले गये। चलते-चलते उनका शरीर और इन्द्रियां शिथिल हो गयीं। और एक सरोवर के पास पीपलवृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गये और साधुओं के बताने के अनुसार भगवान का ध्यान करने लगे।

एक दिन नारदजी भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गए और थोड़ी देर तक अपने दिव्यस्वरूप की झलक दिखलाकर अन्तर्धान हो गए। भगवान का दोबारा दर्शन पाने के लिए नारदजी बार-बार भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे पर उन्हें भगवान के दर्शन दोबारा नहीं हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई–

’हे दासीपुत्र ! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। जिनका चित्त पूर्णतया निर्मल नहीं है, वे मेरे दर्शन के अधिकारी नहीं हैं। यह एक झांकी मैंने तुम्हें कृपा करके इसलिए दिखलायी है कि इसके दर्शन से तुम्हारा चित्त मुझमें लग जाय। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद बन कर मुझे पुन: प्राप्त करोगे। मुझे प्राप्त करने का तुम्हारा यह दृढ़ निश्चय कभी किसी प्रकार नहीं टूटेगा। सृष्टि का प्रलय हो जाने पर भी मेरी कृपा से तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी।’

नारदजी ने भगवान को प्रणाम किया और भगवान का गुण गाते हुए पृथ्वी पर घूमने लगे। समय आने पर नारदजी का पांचभौतिक शरीर छूट गया। कल्प के अंत में जिस समय भगवान नारायण प्रलयकालीन समुद्र के जल में शयन करते हैं, उस समय उनके हृदय में शयन करने की इच्छा से इस सारी सृष्टि को समेटकर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे, तब उनके श्वास के साथ वे ब्रह्माजी के हृदय में प्रवेश कर गये। एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर जब ब्रह्माजी जागे और उन्होंने सृष्टि करने की इच्छा की, तब उनकी इन्द्रियों से अन्य ऋषियों के साथ नारदजी भी दिव्य विग्रह धारणकर ब्रह्माजी के मानसपुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए और तब से ये अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत को धारणकर भगवान की दी हुई वीणा को बजाते हुए भगवान के गुणों को गाते रहते हैं।

गाते भगवन्नाम निरन्तर प्रेम-रस-सुधा-सागर-मग्न।
तन-मन-की स्मृति नहीं तनिक-सी, वृत्ति नित्य प्रभु-पद-संलग्न।।
सहज बजाते वीणा सुस्वर मधुर, लिये कर में करताल।
हो उन्मत्त नृत्य करते, मुनि नारद रहते नित्यनिहाल।। (पद-रत्नाकर)

एक समय देवर्षि नारदजी ने भगवान से पूछा–देवेश्वर ! आप कहां निवास करते हैं? इस पर भगवान ने कहा–’नारद ! न तो मैं वैकुण्ठ में वास करता हूँ और न योगियों के हृदय में, मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं, वहीं मैं भी रहता हूँ।’

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न वै।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।। (पद्मपुराण)

बस, फिर क्या था, नारदजी ने भगवान का गुणगान आरम्भ कर दिया। नारदजी ने अनुभव किया कि भगवान भक्त के प्रेम के वशीभूत हैं, इसलिए अनन्य प्रेम से उन्हें रिझाना चाहिए। इसी बात को बताने के लिए उन्होंने चौरासी सूत्रों की रचना की। ये सूत्र ही ‘नारद भक्तिसूत्र’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा रचित भक्तिसूत्रों में भक्तितत्त्व की बड़ी सुन्दर व्याख्या की गयी है। इन्होंने प्रत्येक युग में घूम-घूम कर भक्ति का प्रचार किया है और अब भी अप्रत्यक्ष रूप में वे भक्तों की सहायता करते रहते हैं।

नारदजी की एक रचना नारदपांचरात्र है। ‘नारदपांचरात्र’ के विषय में श्रीमद्भागवत में कहा गया है–

‘ऋषियों की सृष्टि में भगवान नारायण ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत-तन्त्र का (जिसे नारद-पांचरात्र भी कहते हैं) उपदेश किया, उसमें कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्मबन्धन से मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है।’

नारदजी के नाम से एक उपनिषद् भी प्राप्त है, जिसे ‘नारदपरिव्राजकोपनिषद्’ कहते है। यह अथर्ववेद से सम्बद्ध है।

महाभारत के शान्तिपर्व में नारदजी द्वारा शुकदेवजी को जो अध्यात्मज्ञान का उपदेश दिया गया है, वह ‘नारदगीता’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इसके अतिरिक्त नारदजी ने ‘नारद-स्मृति’ और ‘नारदीय शिक्षा’ नामक ग्रंथों की भी रचना की है।

नारदपुराण–अठारह महापुराणों में ‘नारदपुराण’ का विशिष्ट स्थान है। इस पुराण की विशेषता है कि इसे एक विश्वकोश के रूप में जाना जाता है। और इस पुराण का नाम वक्ता के नाम पर न होकर श्रोता के नाम पर है। सनत्कुमारों ने इस पुराण का कथन देवर्षि नारद को किया है।

इनके सभी उपदेशों का निचोड़ है–

सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैर्भगवानेव भजनीय:। (नारदभक्तिसूत्र)

अर्थात् सर्वदा सर्वभाव से निश्चिन्त होकर केवल भगवान का ही भजन करना चाहिए।

नारदजी की प्रहलाद, ध्रुव, वेदव्यासजी व शुकदेवजी पर कृपा

नारदजी वेदव्यास, वाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेवजी के गुरु रहे हैं। नारदजी ने आदिकवि वाल्मीकि के प्रश्नों का उत्तर दिया, उसी से आदिकाव्य रामायण की रचना हुई। वाल्मीकीय-रामायण और श्रीमद्भागवत जैसे दो अनूठे ग्रन्थ भी संसार को इन्हीं की कृपा से प्राप्त हुए। श्रीमद्भागवत के प्रादुर्भाव में देवर्षि नारद की ही प्रेरणा रही है। एक बार की बात है, वेदव्यासजी सरस्वती नदी के तट पर शिष्यों के साथ बैठे हुए थे। उनका मन बड़ा ही अशान्त था। उसी समय देवर्षि नारद वहां आ पहुंचे। व्यासजी को उदास देखकर देवर्षि नारद ने इसका कारण पूछा। इस पर व्यासजी ने कहा–देवर्षि ! क्या कारण है कि मैंने चारों वेदों का मर्म महाभारत में वर्णित किया है, पुराणों का संकलन भी कर लिया है, तब भी मुझे संतोष नहीं। तब नारदजी ने उनको बताया–’व्यासजी आपने भगवान के निर्मल यश का गान नहीं किया है। वह ज्ञान व वाणी अपूर्ण है जिसमें श्रीहरि की परमपावन कीर्ति का वर्णन न हो।’ इसी से आपका चित्त प्रसन्न नहीं है। अत: आप भगवान श्रीकृष्ण की मनोरम लीलाओं का वर्णन करें। तब व्यासजी ने भगवान की लीलामयी भागवतसंहिता का निर्माण किया और उसे अपने पुत्र शुकदेवजी को पढ़ाया।

शुकदेव जैसे महान ज्ञानी को भी इन्होंने उपदेश दिया। बालक प्रहलाद की दृढ़भक्ति से नृसिंह भगवान अवतरित हुए। प्रहलाद के इस भगवद्विश्वास के पीछे नारदजी का ही उपदेश था। प्रहलादजी जब माता के गर्भ में थे, तब नारदजी ने प्रहलाद की माता दैत्य-साम्राज्ञी कयाधू को भगवान के नाम-कीर्तन का उपदेश किया था। उसी ज्ञान के कारण प्रहलादजी को भगवान के नाम व संकीर्तन में दृढ़ विश्वास था। इसी प्रकार बालक ध्रुव जब सौतेली माता के वचनों से आहत होकर वन में जा रहे थे, तब मार्ग में उन्हें नारदजी मिले। नारदजी ने ही बालक ध्रुव को वासुदेव मन्त्र देकर उपासना की पद्धति बतलाई। ध्रुव ने भी नाम-जप से अचल पद प्राप्त किया। राजा अम्बरीष को भी नारदजी ने भक्तिमार्ग में प्रवृत्त किया। आपने कितनों का उपकार किया, उसकी कोई गणना नहीं है। जब दक्ष प्रजापति ने ‘हर्यश्व’ नामक दस सहस्त्र पुत्र उत्पन्न कर उन्हें सृष्टि-विस्तार की अाज्ञा दी तो नारदजी ने उन्हें अध्यात्म का पाठ पढ़ाकर विरक्त बना दिया। दक्ष प्रजापति बड़े दु:खी हुए। फिर उन्होंने ‘शबलाक्ष’ नामक एक सहस्त्र पुत्र उत्पन्न किए। नारदजी ने उन पर भी कृपा करके उनको भी भगवान के चरणों की ओर उन्मुख कर दिया और  दक्षपुत्रों ने सृष्टिकर्म में रुचि नहीं ली। इससे दक्ष प्रजापति बड़े दु:खी हुए और  उन्होंने नारदजी को शाप दे दिया–’तुम निरन्तर लोक-लोकान्तरों में विचरण करते रहोगे और एक स्थान पर अधिक देर तक नहीं टिक सकोगे।’ देवर्षि नारद ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्ष का शाप स्वीकार कर लिया। यही साधु पुरुषों के लक्षण हैं कि बदला लेने की शक्ति रहने पर भी दूसरों का अपकार सह लेते हैं।

जब दुर्योधन के छल से सब कुछ हार जाने पर पांडवों ने वन के लिए प्रस्थान किया, उस समय भरतवंशियों के विनाश के लिए अनेक प्रकार के अपशकुन होने लगे। चिन्तित धृतराष्ट्र और विदुर आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय महर्षियों से घिरे नारदजी कौरवों के सामने आकर खड़े हो गए और उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा–

‘आज से चौदहवें वर्ष में दुर्योधन के अपराध से भीम और अर्जुन के पराक्रम से कौरवकुल का नाश हो जायेगा।’ इतना कहकर नारदजी आकाश में अन्तर्धान हो गए।

नारदजी का अभिमान-भंग

एक बार नारदजी हिमालय पर तपस्या कर रहे थे। सहस्त्रों वर्ष बीत गए पर उनकी समाधि भंग न हुई। यह देखकर इन्द्र को बड़ा भय हुआ अत: इन्द्र ने कामदेव और बसंत को बुलाकर नारदजी की तपस्या भंग करने भेजा। कामदेव ने सभी कलाओं का प्रयोग कर लिया पर नारदजी पर उसकी एक न चली क्योंकि यह वही स्थान था जहां भगवान शंकर ने कामदेव को जलाया था। अत: इस स्थान पर कामदेव के वाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। विवश होकर कामदेव इन्द्र के पास लौट आया और कहा–’नारदजी में न काम ही है न क्रोध ही। क्योंकि उन्होंने मेरा मधुर वचनों से आतिथ्य किया।’ यह सुनकर सब दंग रह गए।

तपस्या पूरी होने पर ‘कामदेव पर मेरी विजय हुई है’ ऐसा मानकर नारदजी के मन में व्यर्थ ही गर्व हो गया। वे यह नहीं समझ सके कि कामदेव के पराजित होने में भगवान शंकर का प्रभाव ही कारण है।

नारदजी अपना काम-विजय सम्बन्धी वृतान्त बताने के लिए भगवान शंकर के पास कैलास पर्वत पर गए और अपनी कथा सुनाई। शंकरजी ने कहा आप अपनी यह बात कभी किसी से न कहना। यह सिद्धि सम्बन्धी बात गुप्त रखने योग्य है। यह बात भगवान विष्णु को बिल्कुल न बताइयेगा। नारदजी को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे वीणा लेकर वैकुण्ठ को चल दिए और वहां जाकर भगवान विष्णु को अपना काम-विजय प्रसंग सुनाने लगे। भगवान ने सोचा–’इनके हृदय में समस्त शोक का कारण अहंकार का अंकुर उत्पन्न हो रहा है, सो इसे झट से उखाड़ डालना चाहिए।’

विष्णुलोक से जब नारदजी पृथ्वी पर आए तो उन्हें वैकुण्ठ से भी सुन्दर एक बड़ा मनोहर नगर दिखाई दिया। भगवान की माया की बात वे समझ न सके। लोगों से पूछने पर पता चला कि इस नगर का राजा शीलनिधि अपनी पुत्री ‘श्रीमती’ का स्वयंवर कर रहा है जिसमें देश-विदेश से राजा आये हैं। नारदजी भी राजा के यहां पहुँच गए। राजा और उसकी पुत्री ने नारदजी को प्रणाम किया। इसके बाद राजा ने अपनी पुत्री के भाग्य के बारे में नारदजी से पूछा। नारदजी उसके लक्षण देखकर चकित रह गए। नारदजी ने राजा को बताया–’आपकी यह पुत्री अपने महान भाग्य के कारण धन्य है और साक्षात् लक्ष्मी की भांति समस्त गुणों से सम्पन्न है। इसका भावी पति निश्चय ही भगवान शंकर के समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसी से पराजित न होने वाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण देवताओं में श्रेष्ठ होगा।’

अब नारदजी स्वयं काम के वशीभूत होकर उस राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे। उन्होंने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। प्रभु प्रकट हो गए। नारदजी बोले–’नाथ ! मेरा हित करो। मैं आपका प्रिय सेवक हूँ। राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर रचाया है। आप अपना स्वरूप मुझे दे दीजिए। आपकी कृपा के बिना राजकुमारी को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।’ भगवान ने कहा–

‘वैद्य जिस प्रकार रोगी की औषधि करके उसका कल्याण करता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा हित अवश्य करूंगा।’

यद्यपि भगवान का कथन स्पष्ट था किन्तु काम से व्याकुल नारदजी को कुछ समझ नहीं आया। और वे यह समझकर कि ‘भगवान ने मुझे अपना रूप दे दिया’ स्वयंवर-सभा में जा विराजे। भगवान ने उनका मुख हरि (हरि भगवान का एक नाम है और बंदर को भी हरि कहते हैं) जैसा बना दिया और शेष अंग अपने जैसे बना दिए थे।

अब राजकुमारी जयमाल लेकर सभा में आई तो नारदजी का बंदर का मुख देखकर कुपित हो गई और उसने वहां सभा में बैठे विष्णु भगवान को जयमाला पहना दी। भगवान राजकुमारी को लेकर चले गए। नारदजी बड़े दुखी हुए। वहां उपस्थित शिवजी के गणों ने नारदजी को अपना मुंह दर्पण में देखने के लिए कहा। दर्पण तो था नहीं, जब नारदजी ने पानी में अपना मुंह देखा तो वानरमुख देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया। और वे विष्णुलोक के लिए चल दिए। रास्ते में ही उन्हें भगवान विष्णु राजकुमारी के साथ मिल गए। नारदजी क्रोध में बोले–

‘मैं तो जानता था कि तुम भले व्यक्ति हो परन्तु तुम सर्वथा विपरीत निकले। समुद्र-मंथन के समय  तुमने असुरों को मद्य पिला दिया और स्वयं कौस्तुभादि चार रत्न और लक्ष्मी को ले गए। शंकरजी को बहलाकर विष दे दिया। यदि उन कृपालु ने उस समय हलाहल को न पी लिया होता तो तुम्हारी सारी माया नष्ट हो जाती और आज हमारे साथ यह कौतुक न होता। तुमने मेरी अभीष्ट कन्या छीनी, अतएव तुम भी स्त्री के विरह में मेरे जैसे ही विकल होओगे। तुमने जिन वानरों के समान मेरा मुंह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक होंगे।’

भगवान ने अपनी माया खींच ली। अब नारदजी देखते हैं तो न वहां राजकुमारी है और न ही लक्ष्मीजी। वे बड़ा पश्चात्ताप करने लगे और ‘त्राहि त्राहि’ कहकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े। भगवान ने भी उन्हें सान्त्वना दी और आशीर्वाद दिया कि अब माया तुम्हारे पास न फटकेगी।

श्रीनारदजी ही एकमात्र ऐसे संत हैं, जिनका सभी देवता और दैत्यगण समान रूप से सम्मान एवं विश्वास करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने नारदजी के सम्बन्ध में कहा है–

‘मैं दिव्यदृष्टि सम्पन्न श्रीनारदजी की स्तुति करता हूँ। जिनके मन में अहंकार नहीं है, जिनका शास्त्रज्ञान और चरित्र किसी से छिपा नहीं है, उन देवर्षि नारद को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कामना अथवा लोभवश झूठी बात मुँह से नहीं निकालते और सभी प्राणी जिनकी उपासना करते हैं, उन नारदजी को मैं नमस्कार करता हूँ।’

6 COMMENTS

  1. Bahut achhi jankari … Padhkar maja aaya. Mera 6 sal ka beta siddhesh roj ek dharmik katha sune bina sota nahi. Mere lite yah jankari bahumuly hai….

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