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शिखा या चोटी रखना हिन्दुओं का केवल धर्म ही नहीं है, यह हमारे ऋषि-मुनियों की विलक्षण खोज का चमत्कार है । हिन्दू धर्म में मनुष्य के सोलह संस्कार बताए गए हैं जिनमें शिखा (चूड़ा या चोटी) धारण करना भी एक संस्कार है । इस संस्कार में एक से तीन वर्ष के बालक के सिर के मध्य भाग में गाय के खुर के आकार में बाल छोड़कर शेष सभी बाल उतार दिए जाते हैं ।

सिर पर शिखा या चोटी रखने के पीछे व वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारण हैं—

शिखा या चोटी रखने का वैज्ञानिक कारण

▪️अत्यन्त संवेदनशील ब्रह्मरन्ध्र की रक्षा के लिए सुरक्षा कवच है शिखा (चोटी)—मनुष्य की समस्त शारीरिक क्रियाएं मस्तिष्क से ही संचालित होती हैं । यदि मस्तिष्क स्वस्थ है तो मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है । शिखा धारण करना एक सुरक्षा कवच के रूप में का कार्य करता है । सिर के जिस भाग पर चोटी रखी जाती है, वह शरीर का सबसे ऊंचा भाग है । इस हिस्से को ‘ब्रह्मरन्ध्र’ कहते हैं । यह स्थान शरीर के अन्य सभी स्थानों से अत्यधिक कोमल मर्मस्थान होता है । यहां पर चोट लगने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो जाती है । इस स्थान पर यदि केशों का गुच्छा रखा जाए तो बाहरी धूल, धूप, चोट आदि से उन सूक्ष्म छिद्रों को कोई हानि नहीं पहुंचती है और वे बन्द नहीं होते हैं । इस तरह शिखा धारण करने से अत्यन्त महत्वपूर्ण और संवेदनशील ब्रह्मरन्ध्र की रक्षा होती है । विदेशों में इस स्थान की रक्षा के लिए टोप (hat) लगाते हैं ।

▪️शरीर विज्ञान के अनुसार जिस स्थान पर शिखा रखी जाती है वहां ‘पिट्यूटरी ग्रन्थि’ होती है । इससे जो रस निकलता है, वह शरीर की वृद्धि और बल के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है । शिखा रखने से इस ग्रन्थि को अपना काम करने में बहुत सहायता मिलती है ।

शिखा या चोटी रखने का आध्यात्मिक कारण

▪️शास्त्र के अनुसार मनुष्य की बुद्धि सूर्य का अंश है । इसीलिए गायत्री मन्त्र द्वारा सूर्य की उपासना करके हम उनसे सद्बुद्धि की याचना करते हैं  । सुषुम्णा नाड़ी का मूलस्थान ठीक शिखा के नीचे होता है जो बुद्धि का केन्द्र है । मनुष्य को जीवनी शक्ति और प्राण शक्ति सूर्य से प्राप्त होती है ।

विज्ञान भी इस बात को मानता है कि काली वस्तु सूर्य की किरणों से अधिक ताप, शक्ति और ऊर्जा ग्रहण करती है । इसलिए मस्तिष्क के ब्रह्मरन्ध्र पर काले बालों का गुच्छा रखने से सूर्य की बुद्धि और प्राण शक्ति मनुष्य के शरीर में ज्यादा आकर्षित होती है ।

▪️शिखा से मनुष्य शरीर में परमात्मा की ओज शक्ति का आवागमन होता रहता है । जैसे तडित चालक (lightening conductor) बिजली को अपनी ओर खींच लेता है उसी प्रकार शिखा या चोटी आकाश में बहने वाली परमात्मा की ओज शक्ति को अपनी ओर खींच लेती है । इसीलिए साधना या अनुष्ठान में रत ऋषि-मुनियों, साधुओं, ब्राह्मणों को शिखा परमात्मा से सम्पर्क स्थापित करने में सहायता करती है ।

▪️शिखा धारण करने के स्थान पर छोटे-छोटे सैंकड़ों ऐसे छिद्र होते हैं जिनके द्वारा साधक योग के द्वारा अपनी प्राण-वायु को बाहर निकालता है । मृत्यु के समय योगियों, ऋषि-मुनियों के प्राण इसी ब्रह्मरन्ध्र के मार्ग से बाहर निकलते हैं । मनुष्य शरीर में यह भाग परब्रह्म का गुप्त खजाना है । ध्यान या समाधि का अन्तिम स्थान भी यहीं है । इसी स्थान पर योगियों को परमात्मा के दर्शन प्राप्त होते हैं । यह ज्ञान प्राप्ति का केन्द्र है । इसीलिए शिखा धारण करने से मनुष्य की ज्ञान शक्ति व बौद्धिक शक्ति बनी रहती है । इसीलिए भारत ही नहीं विदेशों में भी वैज्ञानिक, कवि, लेखक सिर पर लम्बे बाल रखते हैं ।

शिखा काटने से बड़े-से-बड़े तेजस्वी पुरुष भी कान्तिहीन हो जाते हैं । महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने अश्वत्थामा को मृत्युदण्ड देने के बजाय उसका सिर मूंड़ कर तेज हीन कर दिया । वेद में कहा गया है—‘मैं दीर्घ आयु, बल और तेज के लिए शिखा को स्पर्श करता हूँ ।

साधु-सन्यासी चोटी न रखकर सिर क्यों मुंडवाते हैं ?

सन्यासियों के लिए चोटी रखने का निषेध है । उनको सिर मुंडवाने का विधान है । इसका कारण यह है कि सन्यासी योग की क्रियाओं द्वारा प्रतिदिन अपनी प्राण वायु को इसी ब्रह्मरन्ध्र के मार्ग से बाहर निकालते और वापिस खींचते रहते हैं । अत: उस स्थान के सूक्ष्म छिद्रों की सफाई प्रतिदिन अपने-आप होती रहती है । यदि वे लोग चोटी रखें तो बालों के गुच्छे के कारण योग के द्वारा प्राणु वायु को छोड़ते और वापिस खींचते हुए कठिनाई हो सकती है । इसलिए उनके लिए चोटी रखना मना है । गृहस्थ लोग ऐसी यौगिक क्रियाएं नहीं करते हैं इसलिए उनके लिए चोटी रखना आवश्यक है ।

साधु लोग जटा क्यों धारण करते हैं ?

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हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी साधना से इतनी आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त कर ली कि उनके मस्तिष्क से निरन्तर अमृत-रस बहता रहता है और वह अमृत-रस भगवान सूर्य में लीन होने के लिए सिर से बाहर निकलने का प्रयत्न करता है । एक शिखा से उसे सम्भालना मुश्किल हो जाता है इसलिए साधु-सन्यासी, ऋषि-मुनियों ने जटा जैसे लम्बे बाल रख लिए । ये बाल आपस में इतने गुंथे रहते हैं कि अमृत-रस का बालों से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है और वह वापिस मस्तिष्क में ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित सहस्त्रदल-कर्णिका जो कि ब्रह्म का निवास-स्थान है, में लौट जाता है ।

शिखा या चोटी में गांठ लगाने क्यों लगाई जाती है ?

शास्त्रों में स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, दान आदि के समय शिखा में गांठ लगाने का विधान है । इसका कारण यह है कि  शिखा स्थान के नीचे बुद्धि चक्र और ब्रह्मरन्ध्र होते हैं । जहां से अमृत-तत्त्व सहस्त्रदल-कर्णिका के मार्ग से बाहर निकलने के लिए शिखा मार्ग को चुनता है । इसलिए शिखा में गांठ लगाकर इस मार्ग को रोक दिया जाता है और मनुष्य को आयु, बल और तेज देने वाला अमृत-तत्त्व सहस्त्रदल कर्णिका में ही रह जाता है ।

एक अन्य धारणा के अनुसार चोटी में गांठ लगाने का आशय है कि साधक ने अपनी आत्मा का परमात्मा के साथ गांठ बांधकर सम्बन्ध स्थापित कर लिया है ।

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