bhagavad gita, krishna arjun, krishna giving gita wisdom

अन्तकाल के चिंतन का महत्व

गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अन्तकाल के चिंतन का महत्व बतलाते हुए अर्जुन को निरन्तर अपना चिंतन करने की आज्ञा देते हैं ।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय ।। (गीता ८।५)

अर्थात्—जो पुरुष अन्तकाल में मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है—इसमें कुछ संशय नहीं है ।

मनुष्य को जीवन में जिससे आसक्ति या मोह होता है, या उसके मन का सबसे अधिक आकर्षण जहां है, अंत समय में उसे वही स्मरण होगा । मृत्यु के समय मनुष्य सबसे अंत में जो विचार करता है अथवा जिसका चिन्तन करता है, उसका अगला जन्म उसी प्रकार का होता है ।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।। (गीता ८।६)

अर्थात्—हे कुन्तीपुत्र ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।

जीव संसार में लौट कर क्यों आता है ?

संसार की चीजों जैसे—घर, परिवार, जमीन, पत्नी, पुत्र, पशु-पक्षी आदि में अपनापन, ममता या आसक्ति  कर लेने से मनुष्य का मन संसार में बंध जाता है तो फिर भगवान उसको वैसा ही मौका दे देते हैं अर्थात् शरीर छूटने पर ममता के कारण संसार में जन्म दे देते हैं और जीव को विवश होकर संसार में लौटकर आना पड़ता है । किन्तु जिसको सांसारिक चीजों में आसक्ति न होकर भगवान से प्रेम है, वह भगवान को प्राप्त हो जाता है ।

राजा भरत की कथा

भगवान ऋषभदेव के पुत्र सम्राट भरत महान त्यागी, भगवद्भक्त व पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट थे । उनके नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा । पहले इस देश का नाम अजनाभवर्ष था । अंत समय में मृगशावक (हिरन के बच्चे) का स्मरण करने से उन्हें अगले जन्म में मृग होना पड़ा ।

समस्त भूमण्डल के सम्राट भरत ने भगवान के भजन के लिए राज्य का त्याग कर दिया और पुलहाश्रम (हरिहरक्षेत्र)  में जाकर भजन में लग गए । एक दिन राजा से ऋषि बने भरत गण्डकी नदी में स्नान करके संध्या कर रहे थे । उसी समय एक गर्भवती हरिणी नदी में जल पीने के लिए आयी । हिरणी पानी पी ही रही थी कि कहीं पास में सिंह ने जोर से गर्जना की । भयवश हिरणी पानी पीना छोड़कर जोर से छलांग लगाकर भागी । प्रसव का समय पास ही होने से भय के कारण और जोर से उछलने से उसका गर्भ मृगशावक बाहर निकल गया और नदी में बहने लगा । हिरणी ने इस आघात से थोड़ी दूर जाकर प्राण त्याग दिए । हाल ही में जन्मा मृगशावक भी मरणासन्न था । राजर्षि भरत को उस पर दया आ गयी और वे उसे उठाकर अपने आश्रम में ले आए ।

मोह है सभी दु:खों का मूल

मोह सब व्याधिन कर मूला
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।।

मोह या आसक्ति ही मनुष्य के समस्त दु:खों का कारण है । राजर्षि भरत ने मरणासन्न मृगछौने पर दया करके उसकी रक्षा की, यह तो बड़े पुण्य का कार्य था परन्तु धीरे-धीरे इसमें एक दोष उत्पन्न हो गया, यह उनको पता ही न चला । उस मृगशावक से उन्हें मोह हो गया । कहां वे भूमण्डल का राज्य, पत्नी, पांच पुत्रों के मोह को एक पल में त्याग कर वन में आ गए थे, लेकिन अब अनजान हिरणी के बच्चे में इतने आसक्त हो गए कि सारा समय उसकी देखभाल में ही बिताने लगे ।

मनुष्य दया करे, प्रेम करे, दूसरों का हित करे पर कहीं पर भी बंधन नहीं बांधना चाहिए, मोह नहीं करना चाहिए । मृगशावक बड़ा हो गया, हृष्ट-पुष्ट हो गया, राजर्षि का कर्तव्य पूरा हो गया । लेकिन मृगशावक के मोह ने उन्हें उसे स्वतन्त्र करने से रोक दिया । वह भी बच्चे की तरह राजर्षि को प्यार करने लगा ।

अंत मति सो गति

सबको अपना ग्रास बनाने वाली मृत्यु ने राजर्षि भरत का भी द्वार खटखटा दिया, उनका अंतिम समय आ गया । मृगशावक उनके पास ही उदास बैठा उन्हीं को निहार रहा था और राजा भरत का शरीर भी मृगशावक को देखते हुए उसकी चिन्ता में छूटा । इसका फल यह हुआ कि अन्तकाल की भावना के अनुसार साधारण मनुष्यों की तरह दूसरे जन्म में उन्हें मृगशरीर ही मिला।

तुलसी ममता राम सों समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ।।

इसलिए मनुष्य को आरम्भ से ही भगवान में मन लगाना चाहिए । यदि मन के आकर्षण के केन्द्र भगवान बन जाएं, तो मरते समय भी वही याद आएंगे ।

गीता (८।७) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ।’

इसी भाव को प्रकट करता हुआ एक सुन्दर भजन है—

इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकलें,
गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकलें ।
श्रीगंगाजी का तट हो, यमुना का वंशीवट हो,
मेरा सांवरा निकट हो, जब प्राण तन से निकले ।।
पीताम्बरी कसी हो, छवि मन में यह बसी हो,
होठों पे कुछ हंसी हो, जब प्राण तन से निकले ।
श्रीवृन्दावन का स्थल हो, मेरे मुख में तुलसी दल हो,
विष्णु चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकलें ।।
जब कंठ प्राण आवे, कोई रोग ना सतावे,
यम दर्श ना दिखावे, जब प्राण तन से निकले ।
उस वक़्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना,
राधा को साथ लाना,  जब प्राण तन से निकले ।।
सुधि होवे नाही तन की, तैयारी हो गमन की,
लकड़ी हो ब्रज के वन की, जब प्राण तन से निकले ।।
एक भक्त की है अर्जी, खुदगर्ज की है गरजी,
आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले ।
ये नेक सी अरज है, मानो तो क्या हरज है,
कुछ आप का फरज है, जब प्राण तन से निकले ।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here