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कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।

अर्थात्–कलश के मुख में विष्णुजी, कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और कलश के मध्य में सभी मातृशक्तियां निवास करती हैं।

नवरात्र मुख्य रूप से दो होते हैं–बासन्तिक या चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र। दोनों नवरात्रों में कलश या घट की स्थापना की जाती है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्र मनाए जाते हैं। इसे ‘देवी पक्ष’ भी कहते हैं। नवरात्र व्रत-अनुष्ठान में जितना अधिक संयम, नियम, नियमितता, आन्तरिक व बाह्य शुद्धि का ध्यान रखा जाता है, अनुष्ठानकर्ता को उतनी ही सफलता मिलती है।

सबसे पहले भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने शारदीय नवरात्र-पूजा समुद्रतट पर की थी। यह एक राजस पूजा है, इसमें जितना संभव हो, पूजा-सामग्रियों के साथ पूजा करने का विधान है।

कलश-स्थापन या घट-स्थापना

कलश-स्थापना का अर्थ है–ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्तितत्त्व का घट (कलश) में आवाहन करके नौ दिनों की आराधना से उसे क्रियाशील करना जिससे वह दैवीय ऊर्जा आराधक को समस्त सुख, शांति, समृद्धि, व मंगलकामना प्रदान करे; इसलिए इसे ‘मंगल-कलश’ भी कहते हैं।

नवरात्र के पहले दिन यानि प्रतिपदा को पूजा की शुरुआत दुर्गापूजा निमित्त संकल्प लेकर ईशानकोण में कलश-स्थापना करके की जाती है। पूजा करते समय साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर रहना चाहिए।

कौन-से योग व नक्षत्र में कलश-स्थापन नहीं करना चाहिए?

कलश-स्थापना करते समय यदि चित्रा या वैधृतियोग हो तो उनकी समाप्ति होने के बाद कलश-स्थापना करनी चाहिए। यदि चित्रा या वैधृतियोग अधिक समय तक हों तो उसी दिन अभिजित् मुहुर्त (दोपहर 11.45 से 12.15 तक का समय) में कलश-स्थापना करनी चाहिए।

कलश-स्थापना के लिए सामग्री

कलश, कलश ढकने के लिए पात्र, कलश के ऊपर रखने के लिए अखण्ड चावल, शुद्ध मिट्टी या बालु, जौ, जौ बोने के लिए पात्र, जल, गंगाजल, आम व अशोक के पत्ते, दूर्वा, रोली, चावल, सुपारी, हल्दी की गांठ, सिक्का, पंचरत्न, सर्वोषधि, कुश, नारियल (सूखा या पानी वाला), लाल कपड़ा या लाल चुनरी, मौली (कलावा), चंदन, पुष्पों की माला या पुष्प

कलश के लिए भूमि या पात्र तैयार करना और धान्य बोना

सबसे पहले जिस भूमि पर या पाटे पर या पात्र में जौ बोने हैं, वहां रोली से अष्टदलकमल बनाएं। फिर मिट्टी या बालु को शुद्ध जमीन या मिट्टी के बर्तन या परात में डालकर वेदी बनाएं। नवरात्र में स्थापित कलश को कई दिनों तक सुरक्षित रखना पड़ता है, इसलिए शुद्ध मिट्टी बिछा दी जाती है और उस पर जौ बो दिए जाते हैं। इसे ‘जयन्ती’ कहते हैं। नवरात्र में उगे हुए जौ को विजयादशमी के दिन पूजन के बाद काटा जाता है और देवताओं को समर्पित किया जाता है। इसके बाद आशीर्वादस्वरूप इन जौ को अपने मस्तक पर लगाकर शुभ स्थानों पर रख दिया जाता है।

कलश-स्थापन के लिए कलश तैयार करना

पंचपल्लव संयुक्तं वेदमन्त्रै: सुसंस्कृतम्।
सुतीर्थजल सम्पूर्णं हेमरत्नै: समन्वितम्।। (श्रीदेवीभागवत)

मिट्टी, तांबा, सोना, चांदी या पीतल का नया कलश लेकर उस पर रोली से स्वस्तिक व दोनों तरफ त्रिशूल बनाकर कलश के गले पर मौली (कलावा) बांध दें।

कलश में जल–अगर कलश मिट्टी का है तो उसे पहले शुद्ध जल से भरकर देख लें कि कहीं उसमें से जल रिस तो नहीं रहा है। कलश में शुद्ध जल के साथ थोड़ा गंगाजल भी मिला दें। फिर कलश को जौ मिली रेत पर स्थापित कर दें।

कलश में विभिन्न पदार्थ विभिन्न वेदमन्त्रों से डाले जाते हैं। ये पदार्थ हैं–

कलश में चन्दन डालें।

कलश में सर्वौषधि (मुरा, जटामांसी, वच, कुष्ठ, शिलाजीत, हल्दी, दारुहल्दी, सठी, चम्पक और मुस्ता) डालें। सर्वोषधि बनी-बनायी आसानी से किराना स्टोर पर मिल जाती है।

कलश में दो दूर्वादल डालें।

कलश में सुपारी डालें।

कलश में पंचरत्न–सोना, हीरा, पद्मराग, मोती, नीलम डालें।

कलश में द्रव्य (एक रुपए का सिक्का) डाल दें।

कलश पर पंचपल्लव–आम, पीपल, वट, पाकड़, और गूलर के पत्ते रखें। यदि ये पत्ते नहीं मिलते हैं तो केवल अशोक व आम के पत्ते भी कलश पर लगा सकते हैं।

कलश में पवित्री (कुश) छोड़ दें।

कलश में सप्तमृत्तिका (घुड़साल, हाथीसाल, बांबी, नदियों के संगम, राजद्वार और गौशाला की मिट्टी) डाली जाती है परन्तु आम इंसान के लिए इतना सब करना नामुमकिन ही है। अत: भाव से ही इसको कलश पर छोड़ दें।

शास्त्रीय विधि से कलश में डाले जाने वाले सभी पदार्थ न मिलने पर चंदन, रोली, हल्दी की गांठ, सुपारी, एक रुपए का सिक्का, गंगाजल व दूर्वादल ही कलश में डाल सकते हैं।

ये सब पदार्थ कलश के अंदर डालने के बाद कलश पर एक प्लेट में चावल भरकर स्थापित करें। फिर लाल कपड़ा लपेटे हुए नारियल को मौली से बांधकर चावलों के ऊपर रख देना चाहिए।

कलश पर नारियल स्थापित करते समय रखें इन बातों का ध्यान

नारियल का मुख वाला भाग (जिस तरफ नारियल पर काले निशान होते हैं) सदैव आराधक की ओर होना चाहिए। कलश-स्थापना में नारियल का मुख नीचे की ओर रखने से शत्रुओं की वृद्धि होती है। नारियल का मुख ऊपर की ओर रखने से रोग सताते हैं। नारियल का मुख पीछे की ओर होने से धन का नाश होता है।

कलश में देवी-देवताओं का आवाहन

कलश-स्थापना के बाद हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर उसमें सभी देवी-देवताओं व चारों वेदों का आवाहन करें कि वे दुर्गापूजा अनुष्ठान में इस कलश में विराजें और प्रसन्न होकर हमारे सारे दुरितों-दु:खों को दूर करें

कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।
अंगैश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारका:।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।।

कलश-पूजन की विधि

कलश-स्थापन के बाद नवरात्र में नौ दिनों तक कलश का पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य)  या षोडशोपचार जैसी श्रद्धा या सामर्थ्य हो पूजन करना चाहिए।

कलश को नमस्कार करने का मन्त्र

नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय।
सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते।।

वेदमन्त्रों से स्थापित कलश का जल हो जाता है अमृततुल्य

विधिपूर्वक स्थापित किए गए कलश या घट में जो चीजें डाली जाती हैं, उन पदार्थों से कलश का जल अमृततुल्य हो जाता है। यह जल रोगनाशक होता है। ऐसा माना जाता है कि ताम्रपात्र में रखा हुआ यह अमृतजल तीन महीने के बाद सभी रोगों को मिटाने वाली महौषधि बन जाता है। दुर्गापूजन की समाप्ति पर विसर्जन के बाद कलश के जल को उन्हीं पत्तों की सहायता से पूरे घर में प्रत्येक स्थान पर छिड़का जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे घर में किसी भी अशुभ शक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता और घर के सभी वास्तुदोष समाप्त हो जाते हैं।

शारदीय नवरात्र में कलश पर स्थापित नारियल एवं उसके जल से शरत्पूर्णिमा को सायंकाल में देवी महालक्ष्मी की पूजा की जाती है।

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