Tag: shri krishna
भगवान जगन्नाथ के अद्भुत स्वरूप का रहस्य
श्रीकृष्णतेज से उत्पन्न इन्द्रनीलमणि श्रीजगन्नाथ विग्रह है। अत: वह साक्षात् वासुदेव कृष्ण हैं। नवकलेवर उत्सव में भगवान जगन्नाथ की दारु मूर्ति के अंदर कृष्णसत्ता पूजन के रूप में इन्द्रनीलमणि मूर्ति प्रतिष्ठित की जाती है।
श्रीराधा की परमप्रिय अष्टसखियां
श्रीराधामाधव की निकुंजलीला में नियुक्त रहकर अष्टसखियां उनको सेवा-सुख प्रदान करती रहती हैं।
श्रीराधा की अंतरंग सेवा में रहने वाली अष्टसखियों को निकुंजलीला के अत्यन्त गोपनीय स्थानों में भी प्रवेश प्राप्त है।
प्रात:काल की कौन-सी क्रियाएं बनाती हैं जीवन सुखी और सफल
जीवन जीना समय को ढोना नहीं बल्कि एक कला है। जीते तो सभी हैं पर जिसने अपना जीवन सार्थक बना लिया, उसी का जीना सही मायने में जीना है। प्रात:काल सोकर उठते समय यदि कुछ छोटे-छोटे उपाय कर लिए जाएं तो मनुष्य सुख, शान्ति व स्वस्थ जीवन प्राप्त कर सकता हैं। इन्हीं उपायों को ‘प्रात:काल के स्वर्णिम सूत्र (golden tips)’ कहते हैं। विभिन्न समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए प्रात:काल स्मरण करें इन देवताओं के नाम।
नृत्यकला के आदिगुरु भगवान श्रीकृष्ण (I)
क्रोध में उन्मत्त, भीषण विषधर कालियनाग के भयानक फनों पर नृत्य करना भगवान श्रीकृष्ण की नृत्यकला की पराकाष्ठा है। तलवार की धार पर, सूत पर तथा अग्नि में भी कुशल कलाकार नृत्य कर लेते हैं; पर यहां सौ फन वाले सर्प के फनों पर नृत्य हो रहा था। भगवान शंकर तो ताण्डव करते हैं, किन्तु व्रजराज श्रीकृष्ण आज विचित्रताण्डव कर रहे हैं। श्रीकृष्ण के नागनृत्य में उनकी शरीरसाधना, चरणविन्यास, विचित्र मनोयोग और अनुपम सौन्दर्य का अद्भुत मेल है। इसके अलावा नंदमहल में श्रीकृष्ण की बालसुलभ क्रीड़ाओं में भी उनकी अद्वितीय नृत्यकला देखने को मिलती है।
अनन्त शास्त्रों का सार ‘श्रीमद्भगवद्गीता’
श्रीमद्भगवद्गीता भगवान के विभूतिरूप मार्घशीर्षमास में, भगवान की प्रिय तिथि शुक्लपक्ष की एकादशी (मोक्षदा एकादशी) को धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से निकली हुई वाणी है जो उन्होंने अर्जुन को निमित्त बनाकर कही है। एक ही शास्त्र है--'श्रीमद्भगवद्गीता'; एक ही आराध्य हैं--देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण, एक ही मन्त्र है--उनका नाम (कृष्ण, गोविन्द, माधव, हरि, गोपाल आदि) और हमारा एक ही कर्त्तव्य है--भगवान श्रीकृष्ण की सेवा-पूजा और श्रद्धा से उन्हें हृदय में धारण करना।
श्रीकृष्ण का चतुर्भुजरूप और श्रीराधा
श्रीराधा और गोपांगनाएं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की मधुर कान्ताभाव से सेवा-आराधना करती हैं। न वे श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य को जानती हैं, न मानती हैं, न उसे देखने की कभी उनमें इच्छा ही जागती है। वरन् श्रीकृष्ण के चतुर्भुजरूप को देखकर वे डरकर संकोच में पड़ जाती हैं। उन्हें जहां जरा भी श्रीकृष्ण का ऐश्वर्यरूप दिखायी दिया, वहीं वे अपने ही प्रियतम श्यामसुन्दर को श्यामसुन्दर न मानकर कुछ अन्य मानने लगती हैं। व्रज में श्रीकृष्ण की भगवत्ता या उनके परमेश्वररूप की कोई पूछ नहीं है।
श्रीकृष्ण के रोग की अनोखी दवा
’उपाय यह है कि कोई सती स्त्री श्रीकृष्ण के केशों से बनी इस डोर पर चलती हुई यमुनाजी के उस पार तीन बार जाए और लौट कर आए; फिर इस छिद्रयुक्त कलसी में यमुनाजल लाकर श्रीकृष्ण पर छिड़के तो उनकी चेतना वापिस आ जाएगी।’ यशोदाजी ने अपना माथा पकड़ लिया--’क्या व्रज में ऐसी कोई सती है जो ऐसा साहस कर सके!’
अक्षय तृतीया पर प्रमुख मन्दिरों में चंदन-यात्रा की झांकी
वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में अक्षय तृतीया के दिन भगवान् के विग्रहों को (दोनों नेत्र छोड़कर) चन्दन के लेप से पूरा ढक दिया जाता है और श्रीअंगों को चंदनचित्रों से सजाया जाता है। एक साधारण मानव की तरह भगवान भी वैशाख और ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी से परेशान होकर जलक्रीड़ा और नौका विहार करना चाहते हैं। चंदन-यात्रा जगन्नाथजी की इसी मानवीय लीला का एक जीवन्त रूप है।
भक्ति की मधुरता : चंदन-यात्रा उत्सव
भक्त अपने भगवान की सेवा के अवसर ढूंढता है और रसमय श्रीकृष्ण अपने भक्तों को आनन्द प्रदान करने के लिए लीला करने के अवसर ढूंढते हैं। दोनों में यह अलौकिक स्पर्धा चलती रहती है। भगवान अपने रूप व लीलाओं से भक्त का मन चुराते हैं, और भक्त अपने भाव से ही भगवान को आनन्द देता है। यही भक्ति की मधुरता है।
वैशाखमास में श्रीमाधव पूजन-विधि
वैशाखमास माधव को विशेष प्रिय है। इसलिए वैशाखमास को माधवमास भी कहते हैं। इस मास में मधु दैत्य को मारने वाले भगवान मधुसूदन की यदि भक्तिपूर्वक पूजा कर ली जाए तो मनुष्य लौकिक व पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त करता है। व्रज में वैशाखमास का बहुत माहात्म्य है।