श्रावणमास में हिंडोले झूलत श्यामा-श्याम

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हिंडोरे माई झूलत लाल बिहारी।
संग झूलति बृषभानु नंदिनी प्राननि हू तें प्यारी।।
नीलाम्बर-पीताम्बर की छबि घनदामिनी अनुहारी।
बलि-बलि जाऊं जुगलचंद पर ‘कृष्णदास’ बलिहारी।।

अर्थात्–प्राणों से भी प्यारी वृषभानुनन्दिनी के साथ श्रीकृष्ण झूला झूल रहे हैं। वायु के वेग से फर-फर फहराता हुआ श्रीराधा का नीलाम्बर और श्रीकृष्ण का पीताम्बर ऐसा लग रहा है मानो नीले आकाश में बिजली कड़क रही हो।

श्रावण में प्रकृति की सुन्दरता में झूलता मन

‘व्रज’ प्रेम की भूमि है और उसकी भाषा मन को मिश्री की डली के समान मिठास प्रदान करने वाली है। ऐसी व्रजभूमि में जब सावन पदार्पण करता है तो आकाश में श्याम घटाएं घिरने लगती हैं, बादल झुक-झुक कर पृथ्वी को चूम लेने के लिए आतुर हो उठते हैं, बिजली चमकने लगती है, रिमझिम फुहारों व सीरी-सीरी बयार की शीतलता शरीर को आनन्दित करती है, यमुना अपने कूल-कछारों (तटों) को तोड़ी-फोड़ती तीव्र गति से बहती चली जाती है, लता-पताएं हरी-भरी और पुष्ट होकर वृक्षों से लिपटकर झूलने लगती हैं, मोर कूकने लगते हैं, पपीहा पीउ-पीउ कर अपनी प्रियतमा को बुलाते हैं, कोयल कुहू कुहू की मीठी तान छेड़ देती है, सरोवरों में हंस अठखेलियाँ करते हैं, दादुर, मोर, पपीहे की आवाजों से सारा ब्रज क्षेत्र आनन्दित हो जाता है, बादल भी जोर-जोर से गर्जना करते हैं। चम्पा, चमेली, मोगरा, मालती आदि पुष्पों की सुगन्ध व स्त्रियों के मधुरकंठों से मल्हार व कजरी का संगीत हवा में फैल जाता है। भूमि पर हरियाली ऐसे बिछ जाती है मानो किसी ने घास का गद्दा बिछा दिया हो। ऐसे मनभावन सावन में उमंगों की तरंगों में झूलता मन गांव-गली-बगीचों में पेड़ों पर पड़े झूलों पर चढ़ने को विवश हो जाता है।

श्रीराधाकृष्ण के झूला झूलने से हुई श्रावणमास में हिंडोलों की शुरुआत

ऐसे ही मन को आनन्दित करने वाले श्रावणमास में भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के साथ हिंडोला (हिंडोरा, झूला) लीला की थी। अष्टछाप  के कवियों (सूरदास, कृष्णदास आदि) ने अपने पदों में श्रावणमास में भगवान श्रीकृष्ण व राधा के हिंडोले झूलने की लीला का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। भगवान श्रीकृष्ण की हिंडोला लीला जीव को परमात्मा की ओर आकृष्ट करने की लीला है।

श्रीकृष्ण ने श्रीराधा से की झूला झूलने की मनुहार

श्रावणमास के मनोहारी वातावरण में श्रीकृष्ण किशोरीजी से मनुहार कर रहे हैं–हे वृषभानुनन्दिनी! सावन की तीज है, आकाश में काली घटाएं छाई हुई हैं, रिमझिम फुहार पड़ रही हैं, कदम्ब की डाली पर सुन्दर झूला पड़ा है। सब दु:ख दूर करने वाली प्रिये! अब और देर न करो, हमारी विनती मानकर तुम सुरंगी साड़ी पहन लो और हिंडोला झूलने चलो।

झूलन चलौ हिंडोरना बृषभानुनन्दिनी।।
सावन की तीज आईं, नभ घोर घटा छाई।
मेघन झरी लगाई, परैं बूंद मन्दिनी।।
सुन्दर कदम की डारी, झूला परयौ है प्यारी।
देखौ कुमर किशोरी सब दु:ख निकन्दिनी।।
पहरौ सुरंग सारी, मानौ विनय हमारी।
मुख चन्द की उज्यारी, मृदुहास फन्दिनी।।
मम वानी सीख लीजै, सुन्दरी न देर कीजै।
हमकों विलोकि लीजै, तू है गति गयन्दिनी।।

परन्तु किशोरीजी हैं कि मान ही नहीं रहीं। वे कहती हैं–मैं हिंडोरा झूलने कैसे चलूं! मुझे तो लोकलाज का डर है, आप मेरी बात ही नहीं मानते, पैरों में बैठकर गिड़गिड़ाते हैं, कभी अंक में भर लेते हैं। मैं तो प्रेम के फंदे में फंस गयी हूँ।

कैसे झूलौं री हिंडोर बतियां माने न हरि।
बरज्यौ न मानत यह काहू कौ लोक की लाज टरी।।
हा हा खात ये तौ पैया परत हैं, प्रेम के फन्द परी।
रसिक गोविन्द अभिराम स्याम ने मेरी अंक भरी।।

किन्तु श्यामसुन्दर अड़े हुए हैं अपनी जिद पर। श्रीकृष्ण कहते हैं–किशोरीजी!  ये ऋतु रूठने की नहीं है, देखो, नदियां कैसी रसमाती हुई समुद्र से मिलने को दौड़ रही हैं। सोलह श्रृंगार धारण कर नैनों में कजरा लगाओ। सुरंगी साड़ी पहनकर श्यामरंग की चादर ओढ़ लो और झूला झूलने के लिए चलो–

प्यारी झूलन पधारौ झुकि आये बदरा।।
ओढ़ो सुरख चूनरी, तापै श्याम चदरा।
साजौ सकल सिंगार नैन धारौ कजरा।।
ऐसौ मान नहीं कीजै हठ तजिये अली।
तू तौ परम सयानी हो बृषभानु की लली।। (भारतेंदु हरिश्चन्द्र)

श्रीराधा के न मानने पर श्रीकृष्ण अकेले ही वन में जाकर कदम्ब के नीचे खड़े होकर वंशीवादन करने लगे श्रीराधा की अष्टसखियों (ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा, सुदेवी, चम्पकलता, रंगदेवी और तुंगविद्या)  का काम प्रिया-प्रियतम के सुख को बढ़ाना हैं। वन में जाकर जब सखियों ने देखा कि श्रीकृष्ण अकेले ही कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशीवादन कर रहे हैं तो वे तुरन्त ही बृषभानुभवन जा पहुंचीं और श्रीराधाजी को वन में चलने के लिये कहने लगीं। सखियों ने श्रीराधाजी को कुसुंभी रंग की साड़ी पहनायी और नख से सिर तक उनका फूलों से श्रृंगार किया और उन्हें श्यामसुंदर से मिलाने ले चलीं।

श्रीराधा की सखियों ने किया दिव्य झूले का निर्माण

रिमझिम बरसती फुहारों के बीच इन सखियों ने यमुनातट के पास के कुंज में एक दिव्य झूले का निर्माण किया। झूला हंस के आकार का है और उसे कमलपुष्पों से ऐसे सजा दिया है मानो एक कमलहंस दो कमलपुष्पों से सजी डोरियों को पकड़ कर झूल रहा हो।

श्रीराधामाधव की मनोहारी हिंडोरा लीला

सखियों के आमन्त्रण पर श्रीराधाकृष्ण उस झूले पर विराजमान हो गये। ढोल, मृदंग आदि की थाप पर मल्हार गाती हुई सखियां श्रीराधाकृष्ण को झूला झुलाने लगीं।

हंसि-हंसि झूलत फूल-हिंडोरे।
प्यारी-प्रीतम फूलनि फूले उर कर जोरें। (पद-रत्नाकर)

वायु के वेग से श्रीकृष्ण का पीताम्बर और श्रीराधा का नीला आंचल फर-फर कर उड़ रहा है। झूले की गति के साथ अब किशोरीजी की काली नागिन के समान वेणी भी झूल रही है। ऐसा लगता है मानो श्यामसुन्दर के मोर-मुकुट में लगे मोरपिच्छ को देखकर वह डर के मारे किशोरीजी की पीठ पर रेंग रही हो। झूले की गति से भगवान का मोरमुकुट भी हिल रहा है जिसे देखकर सखियां कहतीं हैं–‘देखौ री मुकुट झोटा ले रह्यौ जमुना के तीर’।

श्यामसुन्दर के गले में तुलसी की माला है तथा किशोरीजी के गले में चमेली के फूलों की माला है। झूले में वायु के झोंकों से तुलसी और चमेली के पुष्पों की मालाएं आपस में उलझ गयीं मानो चमेली मालारूपी गंगा और तुलसी मालारूपी यमुना आपस में आकर मिल गयीं हों।

श्रीराधा ने किया सखियों को सुख का दान

सखियां श्रीराधाकृष्ण को झूला झुला रही हैं, तभी श्रीराधा के मन में आता है कि यह सुख मेरी सखियों को भी मिले। श्रीराधा प्रेमरूपी कल्पवृक्ष हैं और सखियां उस वृक्ष के पत्ते व पुष्प हैं; इसलिए श्रीराधा अपनी सखियों को सुखी किए बिना सुखी नहीं हो सकतीं। श्रीराधा श्रीकृष्ण को संकेत करती हैं कि जैसे मैं तुम्हारे बायीं ओर विराजमान हूँ, वैसे ही एक-एक करके सभी सखियों को अपनी दांयी ओर बिठाकर सुख प्रदान करो। अपनी जीवन-सर्वस्व श्रीराधा के सुख के लिए सेवापरायणा सखियों ने श्रीकृष्ण के साथ झूला झूलना स्वीकार किया।

अनन्त सुख के सागर परब्रह्म श्रीकृष्ण के बगल में बैठकर झूला झूलना कितने सुख-सौभाग्य और गौरव की बात है! श्रीराधा चाहतीं तो यह सुख अकेले ही ग्रहण कर सकतीं थीं क्योंकि श्रीकृष्ण उनके प्रेम के अधीन हैं; परन्तु वे देवताओं और मुनियों के लिए भी दुर्लभ उस सुख को सबमें बांटना चाहती हैं। वे स्वयं झूले से उतरकर सखियों को झूले पर चढ़ाती हैं और स्वयं अपने हाथों से उन्हें झुलाती हैं और इसमें भी वे सुख का अनुभव करती हैं। ऐसी उदार-स्वभाव व त्यागमयी हैं श्रीराधा।

क्या है भगवान को हिंडोला में झुलाने का भाव?

श्रीराधा ने झूला झुलाने पर जिस प्रकार सखियों को श्रीकृष्णप्रेम का सुख प्रदान किया, वैसे ही हम भी भगवान को झूला झुलाकर उनका असीम प्रेम प्राप्त करें; यही है हिंडोला लीला का गूढ़ अर्थ।

श्रावणमास में मन्दिरों व घरों में सजते हैं भगवान के हिंडोले

व्रज में श्रावणमास में हरियाली तीज से रक्षाबंधन तक मन्दिरों में व घरों में श्रीराधाकृष्ण व बालगोपाल को हिंडोले में झुलाया जाता है। पुष्टिमार्ग में ठाकुरजी पूरे सावन के महीने में झूला झूलते हैं। बरसाने में श्रीराधारानी को सिंधारा (मालपुआ, मिठाई, फल) अर्पित कर झूलनोत्सव मनाया जाता है। श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की तीज को हरियाली के कारण हरियाली तीज व आकाश में घुमड़ती काली घटाओं के कारण कजली तीज कहते हैं। इस दिन स्त्रियां मल्हारकजरी गाती हुई झूला झूलती हैं।

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