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श्रीकृष्णावतार के समय देवी-देवताओं का पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में जन्म
इस प्रकार लीला-मंच तैयार हो गया, मंच-लीला की व्यवस्था करने वाले रचनाकार, निर्देशक एवं समेटने वाले भी तैयार हो गए। इस मंच पर पधारकर, विभिन्न रूपों में उपस्थित होकर अपनी-अपनी भूमिका निभाने वाले पात्र भी तैयार हो गए। काल, कर्म, गुण एवं स्वभाव आदि की रस्सी में पिरोकर भगवान श्रीकृष्ण ने इन सबकी नकेल अपने हाथ में रखी। यह नटवर नागर श्रीकृष्ण एक विचित्र खिलाड़ी हैं। कभी तो मात्र दर्शक बनकर देखते हैं, कभी स्वयं भी वह लीला में कूद पड़ते हैं और खेलने लगते हैं।
श्रीराधा का गोलोकधाम से व्रज में अवतरण : कुछ अनछुए पहलू
भगवान श्रीकृष्ण ने गोपों और गोपियों को बुलाकर कहा--’गोपों और गोपियो ! तुम सब-के-सब नन्दरायजी का जो उत्कृष्ट व्रज है, वहां गोपों के घर-घर में जन्म लो। राधिके ! तुम भी वृषभानु के घर अवतार लो। वृषभानु की पत्नी का नाम कलावती है। वे सुबल की पुत्री हैं और लक्ष्मी के अंश से प्रकट हुई हैं। वास्तव में वे पितरों की मानसी कन्या हैं। पूर्वकाल में दुर्वासा के शाप से उनका व्रजमण्डल में गोप के घर में जन्म हुआ है। तुम उन्हीं कलावती की पुत्री होकर जन्म ग्रहण करो।
aaradhika.com के 50वें ब्लॉग के सम्बन्ध मे दो शब्द
मैं अपना 50वां ब्लॉग ‘श्रीकृष्णप्राणेश्वरी श्रीराधा’ रासेश्वर एवं रासेश्वरी श्रीराधाकृष्ण के युगल चरणकमलों में निवेदित करती हूँ। श्रीराधाकृष्ण के चरणों मैं मेरा शुरु से लगाव रहा है। इसीलिए मैंने अपनी वेबसाइट का नाम ‘श्रीकृष्ण की आराधिका--श्रीराधा’ से प्रेरित होकर ‘आराधिका’ (Aaradhika.com) रखा।
श्रीकृष्णप्राणेश्वरी श्रीराधा
श्रीराधा कौन हैं? श्रीराधा हैं--श्रीकृष्ण का सुख। श्रीराधा हैं--श्रीकृष्ण का आनन्द। भगवान का आनन्दस्वरूप ही श्रीराधा के रूप में अभिव्यक्त है। श्रीराधा न हों तो श्रीकृष्ण के आनन्दरूप की सिद्धि ही न हो। श्रीराधा चिदानन्द परमात्मा की मौज हैं, अन्तर का आह्लाद हैं, उसी आह्लाद की प्रकटरूपा श्रीराधा हैं।
श्रीधामवृन्दावन
श्रीधाम वृन्दावन भगवान श्रीराधाकृष्ण की रसमयी लीलाभूमि है। पुराणों में इसे व्रजमण्डलरूपी कमल की अत्यन्त सुन्दर कर्णिका कहा गया है। अत: कमल-कर्णिका के समान ही यह सुन्दरता, सुकुमारता एवं मधुरता का कोष है।
तुलसीसेवा, श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए श्रीराधाजी द्वारा तुलसीसेवा-व्रत
पुष्पों में अथवा देवियों में किसी से भी इनकी तुलना नहीं हो सकी इसलिए उन सबमें पवित्ररूपा इनको तुलसी कहा गया। तुलसी लक्ष्मीजी (श्रीदेवी) के समान भगवान नारायण की प्रिया और नित्य सहचरी हैं; इसलिए परम पवित्र और सम्पूर्ण जगत के लिए पूजनीया हैं। अत: वे विष्णुप्रिया, विष्णुवल्लभा, विष्णुकान्ता तथा केशवप्रिया आदि नामों से जानी जाती हैं। भगवान श्रीहरि की भक्ति और मुक्ति प्रदान करना इनका स्वभाव है।
दामोदर श्रीकृष्ण द्वारा यमलार्जुन (कुबेरपुत्रों) का उद्धार
भगवान बंधन में बंधकर उन कुबेरपुत्रों के उद्धार के लिए आ पहुंचे। उनकी गाड़ीलीला अब पूरी हो गयी और मोक्षलीला का प्रारम्भ हो गया। वे वृक्षों की ओर ऊखल खींचते चले जा रहे हैं और उन अर्जुन वृक्षों के पास जा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण को निकट आया देखकर उन यमलार्जुन की क्या दशा हुई, इसे कौन बताये?
दामोदर श्रीकृष्ण की ऊखल-बंधन लीला
मैया की रस्सी पूरी हो गयी थी और विश्व को मुक्ति देने वाला स्वयं बंधा खड़ा था ऊखल से। भगवान न बंधने की लीला करते रहे और अंत में बंध गये किन्तु उनका बन्धन भी दूसरों की मुक्ति के लिए था। इस प्रकार बंधकर उन्होंने संसार को यह बात दिखला दी कि मैं अपने प्रेमी भक्तों के अधीन हूँ।
रसिया श्रीकृष्ण और फाग उत्सव (होली)
बरसाना की लठामार होली, दाऊजी का रंग-रंगीला हुरंगा, होली की प्राचीनता का रूप संजोये जाव-बठैन का हुरंगा, और इन सबसे अधिक चमत्कारी फालैन का होलिका-दहन।
भगवान श्रीकृष्ण के माता-पिता वसुदेव व देवकी के कष्टों के कारण
धर्मपरायण वसुदेव जिनके पुत्र के रूप में साक्षात् भगवान विष्णु अवतरित हुए, वे कंस के कारागार में क्यों बन्द हुए? उन्होंने अपनी पत्नी देवकी के साथ ऐसा क्या अपराध किया था, जिससे कंस के द्वारा देवकी के छ: पुत्रों का वध कर दिया गया? वे छ: पुत्र कौन थे? वह कन्या कौन थी, जिसे कंस ने पत्थर पर पटक दिया था और वह हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी और पुन: अष्टभुजा के रूप में प्रकट हुई?