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प्राणब्रह्म, प्राणशक्ति और प्राणवायु

परमात्मा की सृष्टि में जो क्रियात्मिका (करने की शक्ति) व गत्यात्मिका (चलने या हिलने की) शक्ति है, उसे ही प्राणशक्ति कहते हैं अर्थात् शरीर की चेतना ही ‘प्राण’ हैं। ‘प्राण’ केवल श्वास (सांस) नहीं है वरन् वह शक्ति या तत्त्व है जिससे श्वास लेने व छोड़ने की समस्त क्रियाएं एक जीवित शरीर में होती हैं। देवता, मनुष्य, पशु आदि प्राण के सहारे ही सांस लेते हैं। जब तक शरीर में नाक के छिद्रों से प्राणवायु का संचार होता रहता है तब तक गूंगा, बहरा, अंधा मनुष्य भी ‘जीवित’ कहा जाता है और जब प्राणवायु का नाक के छिद्रों द्वारा आवागमन समाप्त हो जाता है तब मनुष्य ‘मृत’ मान लिया जाता है।

प्राणशक्ति के कारण ही मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता एवं पर्वत विकसित होते हैं। जब इनमें प्राणशक्ति नहीं रह जाती तब ये सूखने व सड़ने लगते हैं। मनुष्य व पशुओं में प्राणशक्ति चले जाने के लक्षण तुरन्त प्रकट हो जाते हैं, वृक्षों में कुछ देर में और पत्थरों आदि में बहुत देर से प्रकट होते हैं।

जब तक शरीर में प्राण हैं तभी तक जीवन है; अत: प्राण ही सभी की आयु है, इसीलिए प्राण को ‘सर्वायुष्’ भी कहते हैं। ऋग्वेद में कहा गया है—‘प्राणवायु! आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं।’

प्राणों को ब्रह्म क्यों कहा जाता है?

छान्दोग्योपनिषद् के पांचवे अध्याय में एक सुन्दर कथा है—एक बार प्राण के साथ शरीर की सभी इन्द्रियों का विवाद हुआ कि हममें से कौन बड़ा और श्रेष्ठ है? आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी, वाणी, मन, चक्षु, श्रोत (कान)—इन सभी ने अपने-अपने माहात्म्य का वर्णन किया और कहा कि हम ही शरीर को धारण किए हुए हैं। प्राण ने कहा—‘अरे मूर्खो! अज्ञान को प्राप्त मत हो, मैं ही इस आत्मा के लिए पांच रूप से विभाजित होकर शरीर को धारण कर रहा हूं।’ इन्द्रियों ने इस पर विश्वास नहीं किया। प्राणों सहित समस्त इन्द्रियों ने पिता प्रजापति के पास जाकर कहा—‘भगवान! यह बतायें कि हम सबमें बड़ा कौन है?’ प्रजापति ने कहा—‘जिसके निकल जाने पर यह शरीर अत्यन्त हेय समझा जाए वही सबसे बड़ा है।’

प्रजापति की इस बात पर विश्वास न करके सबसे पहले वागिन्द्रिय (बोलने की इन्द्रिय) ने शरीर का साथ छोड़ दिया परन्तु इससे शरीर की बोलने की शक्ति को छोड़कर और कोई हानि नहीं हुई, प्राणी गूंगा बनकर जीवित रहा। इसी तरह एक-एक करके सभी इन्द्रियों ने शरीर का साथ छोड़कर परीक्षा की कि क्या हमारे शरीर में न रहने से यह जीवित रहेगा या नहीं? पर इन्द्रियों के निकल जाने पर प्राणवायु के रहते शरीर को ‘जीवित’ ही कहा गया ‘मृत’ नहीं।

अन्त में शरीर का त्यागकर प्राणों के निकलने का समय आया। प्राणों के शरीर छोड़ने से पहले ही सब-के-सब नष्ट होने लगे, सभी इन्द्रियां बेचैन व शिथिल होने लगीं, उनका तेज चला गया। तब सभी इन्द्रियां प्राणों से शरीर का त्याग न करने की प्रार्थना करने लगीं।

प्राण के पुन: स्थिर होने पर सब ऐसे स्थिर हो गए जैसे मधुमक्खियों की रानी के उड़ने पर सब मक्खियां उड़ जाती हैं एवं बैठने पर बैठ जाती हैं। हार मानकर सभी इन्द्रियां पुन: वापिस आकर शरीर में स्थित हो गयीं।

शरीर में इन्द्रिय, मन आदि में प्राण ही सबसे श्रेष्ठ

अंत में सब इन्द्रियों ने प्राण की स्तुति करते हुए स्वीकार किया कि प्राण का स्थान शरीर में सबसे ऊंचा है। प्राण सभी इन्द्रियों का उज्जीवक (जीवनी शक्ति), शक्ति और बल है। इन्द्रियों में कार्य करने की शक्ति प्राण से ही प्राप्त होती है। प्राणशक्ति के बिना सभी इन्द्रियां निष्क्रिय हो जाती हैं। इसी से आचार्यों ने प्राणों को ‘ब्रह्म’ की संज्ञा दी गयी है।

प्राणों की उत्पत्ति

प्राण की उत्पत्ति के सम्बन्ध में शास्त्रों में अनेक मत हैं। एक मत के अनुसार परमात्मा की जब एक से अनेक होने की इच्छा होती है—‘एकोऽहं बहु स्याम्’—तब पंचमहाभूत प्रकट होते हैं। इन्हीं रजोगुणी पंचमहाभूतों से प्राण की उत्पत्ति होती है।

प्राणवायु और पंचप्राण

शरीररूपी नगर का राजा प्राणवायु है। गतिशीलता के कारण प्राण को वायु समझा जाता है किन्तु प्राण वायु नहीं हैं; प्राण वायुदेवता का अध्यात्मरूप हैं जो अपने पंचव्यूह (पांच व्यापक रूप में)—प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान आदि रूप में शरीर में रहते हैं। जैसे परमात्मा के चार व्यूह—वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं वैसे ही प्राणवायु पांच व्यापक रूप में शरीर में स्थित है।

प्राणशक्ति एक है किन्तु शरीर में उनकी स्थिति और कार्यों के आधार पर प्राणों की संख्या में विभिन्नता है। प्राण को एक, पांच, सात, नौ, दस, ग्यारह तथा तेरह तक माना गया है।

पंचप्राण

शरीर में एक ही प्राणवायु अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न नामों से जानी जाती है। जैसे—

—हृदय में स्थित वायु प्राण है।

—गुदा में स्थित वायु अपान है।

—सारे शरीर में घूमने वाला वायु व्यान कहलाता है।

—कण्ठ में स्थित वायु उदान है।

—नाभिस्थान में स्थित वायु समान कहलाती है।

कार्यों के आधार पर दस प्रकार की प्राणवायु

प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, और धनंजय—ये दस प्रकार के प्राणवायु हैं।

प्राणवायु—सांस को अंदर ले जाना और बाहर निकालना, खाये हुए अन्न-जल को पचाना, अन्न को मल, पानी को पसीना और मूत्र तथा रस को वीर्य बनाना प्राणवायु का कार्य है। हृदय से लेकर नाक तक यह प्राणवायु स्थित है और वहां की इन्द्रियों का काम इसी से चलता है।

अपानवायु—इस प्राणवायु का कार्य मल-मूत्र व वीर्य को निकालना, गर्भ को नीचे ले जाना व कमर, घुटने व जांघ का कार्य करना है।

समानवायु—यह प्राणवायु शरीर में नाभि से हृदय तक स्थित रहती है। अन्न से पचे रस को सभी अंगों व नाड़ियों में बराबर बांटना इसका कार्य है।

उदानवायु—यह कण्ठ में रहकर सिर तक घूमता है। शरीर को उठाए रखना इसका काम है। मृत्यु के समय उदानवायु सूक्ष्मशरीर (आत्मा) को स्थूल शरीर (देह) से बाहर निकाल देती है और कर्म, गुण, संस्कार व वासनाओं के अनुसार दूसरे गर्भ में प्रवेश कराती है। योगीजन इसी के द्वारा स्थूल शरीर से निकलकर सभी जगह आते-जाते हैं।

व्यानवायु—व्यान का स्थान पेड़ू से ऊपर है। यह सूक्ष्म नाड़ियों में घूमता हुआ शरीर के सभी अंगों में रक्त का संचार करता है।

नागवायु—छींकना, जंभाई आदि इसी प्राणवायु का काम है।

कूर्मवायु—शरीर में संकुचन (सिकुड़ने) की क्रिया इसी के आश्रित है।

कृकरवायु—भूख-प्यास का लगना आदि कार्य इसी प्राणवायु से होता है।

देवदत्तवायु—निद्रा, ऊंघना, थकान आदि देवदत्तवायु का कार्य है।

धनंजयवायु—शरीर के पोषण का कार्य यह प्राणवायु करती है।

इस प्रकार शरीर, इन्द्रियां और मन प्राणशक्ति से ही चलते हैं। प्राणवायु को अपने वश में करने का नाम ‘प्राणायाम’ है। प्राणवायु का नियन्त्रण कर संचय होने से ‘समाधि’ लगती है जिसमें योगीजन काल को वश में करके मनचाहे समय तक जीवित रह सकता है और सरलता से इच्छानुसार प्राण-त्याग कर सकता है।

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