shri krishna sudarshan chakra

पौराणिक कथाओं को पढ़ते समय अक्सर यह देखा जाता हैं कि भगवान देवताओं के पक्ष में रह कर राक्षसों को मारते हैं । वृत्रासुर जो भगवान का भक्त था; फिर भी भगवान ने उसको मारा । इस तरह भगवान के व्यवहार में समता न दिखाई देकर विषमता ही दिखाई देती है; परंतु यह दृष्टिकोण सही नहीं है । 

भगवान मां की तरह हैं । जिस तरह एक मां अपने शैतान बच्चे को डांट-फटकार या मार कर उसे सही रास्ते पर लाती है; उसी प्रकार भगवान अपने आसुरी स्वभाव वाले पुत्रों को मारते नहीं बल्कि तारते हैं । श्रीकृष्ण की मार में भी प्यार है, उनके क्रोध में भी प्रेम भरा है । 

भगवान की दो प्रमुख शक्तियां हैं—अनुग्रह शक्ति और निग्रह शक्ति । अनुग्रह शक्ति से वे देवताओं का कल्याण करते हैं और निग्रह शक्ति से वे राक्षसों को तारते हैं ।

पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में हजारों ऋषि-मुनि, संत-महात्मा व राजा पधारे । प्रश्न यह उपस्थित हुआ कि प्रथम (अग्र) पूजा किसकी करनी है ? सभी ने एकमत से निर्णय किया कि प्रथम पूजा द्वारिकानाथ श्रीकृष्ण की होनी चाहिए । 

भगवान श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में भीष्म पितामह ने कहा–

‘श्रीकृष्ण ही समस्त लोकों की उत्पत्ति तथा प्रलय के आधार हैं । यह सम्पूर्ण विश्व और चराचर समस्त प्राणी श्रीकृष्ण की क्रीडा के लिए हैं; अतएव वे सबके पूज्यतम हैं । सूर्य-चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र, दिशा-विदिशा–सबके वे ही आधार हैं । जैसे वेदों का मुख अग्निहोत्र, छन्दों का मुख गायत्री, मनुष्यों का मुख राजा, नदियों का मुख समुद्र, नक्षत्रों का मुख चन्द्रमा, ज्योतिष्मान पदार्थों का मुख सूर्य, पर्वतों का सुमेरू और पक्षियों का गरुड़ है, वैसे ही संसार की जितनी भी गतियां हैं, उन सबके केन्द्रस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण हैं ।’

जब भीष्मपितामह ने सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का आदेश दिया, तब भीष्म पितामह के कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा की । इससे सभी प्रसन्न हुए; किंतु सभा में कुछ लोग ऐसे थे, जिन्हें यह बात पसंद नहीं आई । उनमें से एक चेदिराज शिशुपाल था । उसने भीष्म पितामह को काफी बुरा-भला कहा, जिससे युधिष्ठिर कुछ डर से गए । 

शिशुपाल सभा में सबके सामने श्रीकृष्ण को गालियां देने लगा । जिस सभा में श्रीकृष्ण को प्रथम पूजा का सम्मान मिला; उसी में शिशुपाल उन्हें गालियां दे रहा था—

‘कृष्ण राजा नहीं है फिर राजाओं के सम्मान का पात्र कैसे हो सकता है ? यह आयु में भी सबसे वृद्ध नहीं है । यदि तुम कृष्ण को आचार्य मानते हो तो द्रोणाचार्ण के उपस्थित होने पर इसकी पूजा अनुचित है । ऋत्विज् (यज्ञ कर्ता) की दृष्टि से भी सबसे वयोवृद्ध वेदव्यास जी की पूजा होनी चाहिए, कृष्ण की नहीं । भीष्मपितामह, अश्वत्थामा आदि के होने पर कृष्ण की पूजा भला कैसे हो सकती है ? यह कृष्ण न ऋत्विज् है, न राजा है और न आचार्य ही है; फिर तुमने किस कामना से इसकी पूजा की । तुम इस गुणहीन कृष्ण की पूजा करके हमारा तिरस्कार कर रहे हो । नपुंसक का ब्याह करना, अंधे को रूप दिखाना, राज्यहीन को राजाओं में बिठा देना जिस प्रकार अपमान है, वैसे ही तुम्हारी यह कृष्ण पूजा भी ।’

यह संसार ऐसा ही है । जब इस संसार में भगवान मानव-लीला करते हैं तो कितने ही प्राणी उनकी निंदा करते हैं । निंदा सहन करना महान पुण्य है और निंदा करना महान पाप है । जो निंदा सहन करता है, वह सुखी होता है; क्योंकि भगवान उसके पक्ष में रहते हैं और जो बुरा कहते हैं वे दु:खी होते हैं । अगर कोई किसी की निंदा करता है तो निंदा सहन करने वाले का बाल भी बांका नहीं होता है, उल्टे निंदा करने वाला ही पाप की गठरी ढोता है ।

शिशुपाल सभा में श्रीकृष्ण की निंदा करता है, भगवान शांति से सुनते हैं; क्योंकि उन्होंने अपनी बुआ को वचन दिया था कि वे उनके पुत्र के ऐसे सौ अपराधों को भी क्षमा कर देंगें जिनके बदले उसे मार डालना चाहिए था । 

शिशुपाल ने एक सौ एकवीं गाली देते हुए कहा—‘कृष्ण ! यदि तुझे सौ बार गरज हो तो मेरी बात सुन और सह । न गरज हो तो जो चाहे कर ले । तेरे क्रोध या प्रसन्नता से न मेरी कुछ हानि है और न ही लाभ ।’

जिस समय शिशुपाल यह कह रहा था और जैसे ही मर्यादा पूर्ण हुई, श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया और स्मरण करते ही चक्र उनके हाथ में चमकने लगा । 

श्रीकृष्ण ने सभी लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा—‘मैंने अब तक इसे जो क्षमा किया था, इसका कारण यह था कि मैंने इसकी मां की प्रार्थना से इसके सौ अपराध क्षमा करने की बात स्वीकार कर ली थी । अब वह संख्या पूरी हो गई है; इसलिए आप लोगों के सामने ही मैं इसका सिर धड़ से अलग किए देता हूँ ।’

श्रीकृष्ण ने चक्र से शिशुपाल का सिर काट डाला । शिशुपाल के शरीर से निकला हुआ दिव्य तेज सबके देखते श्रीकृष्ण के चरणों में लीन हो गया ।

शिशुपाल कोई साधारण प्राणी नहीं था । वह तो वैकुण्ठ धाम में श्रीहरि का पार्षद था । एक बार सनत्कुमार वैकुण्ठ धाम में भगवान के दर्शन के लिए गए । भगवान के पार्षद (द्वारपाल) जय-विजय ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया । इससे क्रोधित होकर सनत्कुमारों ने जय-विजय को तीन जन्मों तक राक्षस होने का श्राप दे दिया । यही जय-विजय पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुए । दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण बने और तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्त्र हुए ।

सभा में उपस्थित सभी लोग सोचने लगे कि श्रीकृष्ण की निंदा करने वाले को तो दुर्गति मिलनी चाहिए थी, इसकी सद्गति कैसे हो गई ? 

यही प्रश्न युधिष्ठिर ने नारद जी से पूछा । तब नारद जी ने कहा—‘भगवान श्रीकृष्ण अति प्रेममय और उदार हैं । शिशुपाल वैर-भाव से ही सही, परमात्मा का स्मरण कर रहा था । मन मित्र से ज्यादा शत्रु का स्मरण करता है । पारसमणि का काम है लोहे को सोना बनाना । अब यदि हथौड़ा पारसमणि पर मारा जाए तो यद्यपि पारसमणि टूट जाएगी पर वह अपने स्पर्श से हथौड़े को सोना बना देगी; परंतु पारसमणि नहीं बनाएगी । इसीलिए जिसने श्रीकृष्ण को छुआ या जिसे श्रीकृष्ण ने छुआ; उन्हें श्रीकृष्ण ने श्रीकृष्णमय बना दिया ।’हम श्रीकृष्ण को चाहें महापुरुष माने, योगेश्वर माने, परम पुरुष माने, महामानव माने, पूर्ण मानव माने, अपूर्ण मानव माने, निपुण राजनीतिज्ञ माने, कुटिल राजनीतिज्ञ माने, या कुछ भी माने–यह तो सत्य है कि एक बार जो उनके सम्पर्क में आ जता है, उसका कल्याण निश्चित है; क्योंकि संसार में सब कुछ वासुदेव श्रीकृष्ण में ही है ।

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