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भाग्यवान वृषभानुसुता सी को तिय त्रिभुवन माहीं।
जाकौं पति त्रिभुवन मनमोहन दिएँ रहत गलबाहीं।।
ह्वै अधीन सँगही सँग डोलत, जहां कुंवरि चलि जाहीं।
‘रसिक’ लख्यौ जो सुख वृंदावन, सो त्रिभुवन मैं नाहीं।।

अर्थात्– संसार में श्रीराधा जैसी भाग्यवान कोई स्त्री नहीं है। जिनके पति तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण सदैव उनके कन्धे पर गलबहियां डाले रहते हैं। जहां भी किशोरीजी जाती हैं, वे उनके अधीन होकर संग-संग जाते हैं। जो सुख वृन्दावन में है, वैसा तीनों लोकों में कहीं नहीं है।

आनन्दरूप श्रीकृष्ण और प्रेममूर्ति श्रीराधा

द्वापरयुग में व्रज में श्रीकृष्णावतार आनन्द-अवतार माना जाता है। आनन्द के मूर्तरूप श्रीकृष्ण हैं और प्रेममूर्ति श्रीराधा हैं। जहां आनन्द है, वहीं प्रेम है और जहां प्रेम है वहीं आनन्द है। इसलिए जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं श्रीराधा हैं। कृष्ण बिना राधा और राधा बिना कृष्ण रह ही नहीं सकते।

व्रज की लीला रसराज श्रीकृष्ण की माधुर्यलीला है। यहां श्रीकृष्ण ‘देव’ नहीं है, ‘मनुष्य’ हैं, अखिल ब्रह्माण्ड के परब्रह्म परमात्मा नहीं हैं; यहां तो वह व्रजवासियों के ‘निजजन’ हैं। व्रज में श्रीकृष्ण के सखा उन्हें प्यारा-दुलारा नंदनन्दन कन्हैया मानते हैं। श्रीराधा और गोपांगनाएं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की मधुर कान्ताभाव से सेवा-आराधना करती हैं। न वे श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य को जानती हैं, न मानती हैं, न उसे देखने की कभी उनमें इच्छा ही जागती है। वरन् श्रीकृष्ण के चतुर्भुजरूप को देखकर वे डरकर संकोच में पड़ जाती हैं। उन्हें जहां जरा भी श्रीकृष्ण का ऐश्वर्यरूप दिखायी दिया, वहीं वे अपने ही प्रियतम श्यामसुन्दर को श्यामसुन्दर न मानकर कुछ अन्य मानने लगती हैं। व्रज में श्रीकृष्ण की भगवत्ता या उनके परमेश्वररूप की कोई पूछ नहीं है। यहां तो केवल एक ही भाव है–‘श्रीकृष्ण ही हमारे हैं, केवल वे ही हमारे हैं।’

श्रीराधा के सामने नहीं ठहरता श्रीकृष्ण का चतुर्भुजरूप

श्रीराधा के सामने श्रीकृष्ण का ऐश्वर्यमय चतुर्भुजरूप ठहर ही नहीं सकता। वे तो गोपवेश, नवकिशोर, नटवर, मुरलीधारी, श्यामसुन्दर के सिवाय किसी अन्य रूप को देखना जानती ही नहीं। वे अपने तन, मन, वचन, प्राण और आत्मा से केवल द्विभुजरूप (दो हाथ वाले) श्रीकृष्णधन का अपने को धनी मानती हैं। श्रीकृष्णप्रेम की पराकाष्ठा महाभावरूपा श्रीराधा कहती हैं–

नहीं किसी में राग तनिक भी, नहीं किसी से भी वैराग्य।
प्रियतम का बस, एकमात्र सुख ही मेरा जीवन, सौभाग्य।। (भाई हनुमानप्रसादजी पोद्दार)

अर्थात्–मेरा किसी प्राणी, परिस्थिति या पदार्थ  मे न तो राग है और न वैराग्य है। एकमात्र प्रियतम श्रीकृष्ण का सुख ही मेरा जीवन है और वही मेरा सौभाग्य है।

श्रीकृष्ण के चतुर्भुजरूप और श्रीराधा से जुड़े दो लीलाप्रसंग यहां दिए गए हैं–

एक बार बसन्त ऋतु में श्रीकृष्ण गोवर्धनपर्वत पर गोपांगनाओं के साथ विहार कर रहे थे। उसी समय श्रीकृष्ण के मन में श्रीराधाजी के साथ एकान्तविहार करने की इच्छा हुई। श्रीकृष्ण श्रीराधा को अपने मन की बात बता कर वहां से अन्तर्धान हो गए और एक एकान्त निकुंज में जाकर श्रीराधा की प्रतीक्षा करने लगे।

इधर गोपांगनाओं ने जब श्रीकृष्ण को वहां नहीं देखा तो वे व्याकुल होकर उन्हें ढूंढने लगीं। ढूंढते-ढूंढते वे उसी निकुंज में पहुंच गयीं जहां श्रीकृष्ण बैठे हुए थे। श्रीकृष्ण ने जब गोपियों को आते देखा तो वे सोचने लगे कि ‘मैं सबको छोड़कर इस एकान्त निकुंज में अकेला क्यों बैठा हूँ’–गोपियों के इस प्रकार पूछने पर मैं क्या उत्तर दूंगा? गोपियां श्रीकृष्ण के इतने निकट आ गईं थी कि श्रीकृष्ण को दूसरे कुंज में जाने का अवसर ही नहीं रह गया था।

तब श्रीकृष्ण सोचने लगे–’यदि मेरे दो हाथ और होते तो मैं चतुर्भुज होकर अपने को छिपा सकता; पर दो हाथ आयें कहां से?’ भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा सोचते ही उनकी ऐश्वर्यशक्ति योगमाया सक्रिय हो गयी और श्रीकृष्ण को शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज नारायण बना दिया। उसी समय सभी गोपांगनाएं वहां आ गयीं परन्तु निकुंज में अपने प्यारे द्विभुज मुरलीधारी श्यामसुन्दर को न देखकर उदास हो गयीं। उन्होंने चतुर्भुज नारायण को देखा इससे द्विभुज श्रीकृष्ण में उनका जो कान्ताभाव था वह विलीन हो गया और वे सब चतुर्भुज नारायण की हाथ जोड़कर चरण-वंदना और स्तुति-विनती करने लगीं। फिर अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण को ढूंढने के लिए दूसरे वन में चली गयीं।

गोपियों के जाने के बाद श्रीकृष्ण के पूर्वनिर्देशानुसार श्रीराधाजी वहां पहुंची। एकान्त निकुंज में श्रीराधा को देखकर श्रीकृष्ण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हो रहे थे कि ‘मैं आज चार हाथों के साथ श्रीराधा के संग लीलाविहार करुंगा।’ परन्तु आश्चर्य ! श्रीराधा जितना ही पास आ रही थीं, उतनी ही शीघ्रता से श्रीकृष्ण के दोनों हाथ विलुप्त होते जा रहे थे। श्रीकृष्ण ने चतुर्भुज बने रहने का प्रयास भी किया परन्तु श्रीराधा की दृष्टि पड़ने से पहले ही श्रीकृष्ण के दोनों हाथ अन्तर्धान हो गए और वे चतुर्भुज नारायण की जगह द्विभुज श्रीकृष्ण बन गए।

यह श्रीराधाजी के अप्रतिम माधुर्य का प्रभाव है कि उनके सामने भगवान की ऐश्वर्यशक्ति अपना प्रभाव नहीं प्रकट कर पाती। जैसे करोड़ों सूर्यों के उदय होने पर सामान्य जुगनू का कहीं पता ही नहीं लगता, वैसे ही श्रीराधा के प्रेम के सामने भगवान के ऐश्वर्य को छिपना पड़ता है।

श्रीकृष्ण के चतुर्भुजरूप से गायब हुआ श्रीराधा का कान्ताभाव

एक बार श्रीकृष्ण के विरह में अधीर होकर श्रीराधाजी यमुना में कूद पड़ीं। यह देखकर विशाखा आदि सखियां भी यमुनाजी में कूद गयीं। तब सूर्यपुत्री यमुनाजी उनको सूर्यलोक में ले गयीं और सूर्यदेव की देखरेख में उनको वहां छोड़ दिया। श्रीकृष्ण के वियोग में वहां भी श्रीराधा अत्यन्त व्याकुल रहती थीं। तब सूर्यपत्नी छाया ने श्रीराधा को सान्त्वना देने के लिए एक उपाय सोचा। छाया ने विचार किया कि सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित नारायण श्रीकृष्ण ही हैं; अत: उनसे मिलकर श्रीराधा को सान्त्वना प्राप्त हो जाएगी।

छाया ने श्रीराधा से कहा–’तुम व्याकुल मत होओ। तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण इस सूर्यमण्डल में ही स्थित हैं।’ इस पर श्रीराधा की सखी विशाखा ने सूर्यपत्नी छाया को समझाते हुए कहा–’तुम समझती हो कि इस ऐश्वर्यमयी विष्णुमूर्ति के दर्शन से श्रीराधा की विरह-व्यथा शान्त हो जाएगी, तो तुम गलत हो। स्वयं श्रीकृष्ण भी व्रज के सारे माधुर्य को ज्यों-का-त्यों बनाए हुए ही यदि चतुर्भुजरूप धारण कर लेते हैं, तो उस चतुर्भुजरूप को देखकर ही श्रीराधा का कान्ताभाव गायब हो जाता है।’

श्रीकृष्ण को तत्काल वश में करने की औषधिरूपा श्रीराधा

व्रज में श्रीराधा की ही सत्ता है। श्रीराधा श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण उनके अधीन हैं। इसलिए श्रीकृष्ण की ऐश्वर्यशक्ति (योगमाया) श्रीराधा के सामने निष्क्रिय हो जाती है। परब्रह्म श्रीकृष्ण को व्रज के कुंजों में रूठी हुई श्रीराधा के पांवों को पलोटते देखा गया है–‘देखौ दुरौ वह कुंज कुटीर मैं बैठो पलोटत राधिका पायन।। (रसखान)

‘श्रीराधे! तुम्हारी प्रेमडोर में बंधे हुए भगवान श्रीकृष्ण पतंग की भांति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, तुम्हारे हृदय के भाव का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते तथा क्रीडा करते और कराते हैं।’

श्रीराधा के प्रेम में उन्मत्त श्रीकृष्ण कहते हैं कि राधा मुझे इतनी अधिक प्रिय है कि उन राधा से भी उनका ‘राधा’ नाम मुझे अधिक मधुर और प्यारा लगता है। ‘राधा’ शब्द कान में पड़ते ही मेरे हृदय की सम्पूर्ण कलियां खिल उठती हैं। प्रेम से परिपूरित ‘राधा’ नाम मेरा सदा ही बंधा-बंधाया मूल्य है। कोई भी ऐसा प्रेम से परिपूर्ण राधा नाम सुनाकर मुझे खरीद सकता है।

आनन्दकन्द श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा हैं इसलिए ‘श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण सुखद नहीं हैं और श्रीकृष्ण के बिना राधा सुखदा नहीं हैं और इन दोनों के बिना अन्य सखियां भी रसमयी नहीं हैं–जैसे रात्रि के बिना चन्द्रमा की शोभा नहीं होती और चन्द्रमा के बिना रात्रि शोभायमान नहीं होती और इन दोनों के बिना कुमुदिनी विकसित नहीं होती है।’

ब्रह्मवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि मैं सबका ईश्वर हूँ; मेरा ईश्वर दूसरा कोई नहीं है। गोलोक, गोकुल और वृन्दावन में मेरा निवास है। मैं स्वयं ही द्विभुज गोपवेष से राधापति बालक के रूप में गोप-गोपी और गौओं के सहित वृन्दावन में रहता हूँ और वैकुण्ठ में मेरा चतुर्भुज विष्णुरूप है जहां मैं लक्ष्मी और सरस्वती का पति होकर दो रूपों में रहता हूँ। द्वारिका में मैं चतुर्भुजरूप से रुक्मिणी, सत्यभामा और अन्य महिषियों का पति हूँ। गोलोक और गोकुल में जिस प्रकार तुम राधारूप से रहती हो; उसी प्रकार तुम वैकुण्ठ में महालक्ष्मी और सरस्वती होकर विराजमान हो। जिस प्रकार अपनी छाया और कलाओं के द्वारा तुम नाना रूपों में प्रकट हुई हो उसी प्रकार अपने अंश और कलाओं से मैं भी अनेक रूपों में प्रकट हुआ हूँ।

राधा जगते, सोते राधा, खान-पान में है राधा।
राधा उठने और बैठने में भी, हंसने में राधा।।
राधा नव बसन्त मलयानिल, राधा हरे सभी बाधा।
राधा सदा स्वामिनी मेरी, परमाराध्या है राधा।। (भाई हनुमानप्रसादजी पोद्दार)

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