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नारद बाबा कही वा दिनाँ, ब्रज की अति मीठी माटी।
तातैं चाखन कौं मैया ! रसना सौं रही तनिक चाटी।।

सबरे बोलत झूठ, सुनौ, मैं नायँ कबहुँ खाई माटी।
तुहूँ रही पतियाय इनहि, यासौं न बात नैकहुँ काटी।।

मानि लईं तूनैं इनकी नकली बातैं सबरी खाँटी।
यासौं पकरि मोय डरपावति, लै अपने कर में साँटी।।

काँपि रह्यौ डर सौं मैं, तौहू आँखि तरेरि रही डाँटी।
मैया ! तू क्यौं भई निरदई, कैसें तेरी मति नाठी।।

खोल दऊँ मुख, देखि अबहिं तू, नैकु कतहूँ जो होय माटी।
का जगात, जब डारि दई मैंने अपनी सबरी छाटी।। (पद रत्नाकर)

सच्चिदानन्द आनन्दकन्द परमब्रह्म श्रीकृष्ण अपने भक्तों को सुख देने के लिए ही इस पृथ्वी पर अवतरित हुये हैं। भगवान श्रीकृष्ण की सभी लीलाएं बड़ी अटपटी हैं। उनसे अनेक बार ब्रह्मादिक देवता भी भ्रम में पड़ जाते हैं। इन लीलाओं में ऐसी शक्ति है कि सांसारिक विषयों में फंसा मन अनायास ही संसार को भूल जाता है और श्रीकृष्ण से प्रेम करने लगता है।

श्रीकृष्ण और माँ यशोदा में होड़ सी लगी रहती। जितना यशोदामाता का वात्सल्य उमड़ता, उससे सौगुना बालकृष्ण अपना और लीलामाधुर्य बिखेर देते। इसी क्रम में यशोदामाता का वात्सल्य अनन्त, असीम, अपार बन गया था। उसमें डूबी माँ के नेत्रों में रात-दिन श्रीकृष्ण ही बसे रहते। कब दिन निकला, कब रात हुयी–यशोदामाता को यह भी किसी के बताने पर ही भान होता था। इसी भाव-समाधि से जगाने के लिए ही मानो यशोदानन्दन ने मृद्-भक्षण (माटी खाने की) लीला की थी।

एक दिन श्रीकृष्ण बलराम व अन्य गोपों के साथ घरौंदे बनाने का खेल खेल रहे थे। जो अपनी इच्छा से कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड बनाया-बिगाड़ा करते हैं, उसका घरौंदा अन्य बालकों से अच्छा नहीं बन पा रहा था। बहुत समय बीत गया पर श्रीकृष्ण का घरौंदा अच्छा नहीं बना। भोजन का समय हो गया और सभी बालक भोजन के लिए घर जाना चाहते थे। पर श्रीकृष्ण अच्छा घरौंदा बनाने की जिद करने लगे और खीझते हुए कहने लगे–’मैं यहीं माटी खाऊंगा और घरौंदा बनाऊंगा। जब तक अच्छा नहीं बनेगा, उठूँगा नहीं।’ हठ में आकर उन्होंने सचमुच माटी खाली।

श्रीकृष्ण ने माटी क्यों खायी?

श्रीकृष्ण के मिट्टी (माटी) खाने के अनेक कारण बतलाये गये हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं–

–भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि शिष्ट पुरुष जब घी आदि स्निग्ध पदार्थों का सेवन करते हैं तो हाथों की चिकनाई हटाने के लिए मिट्टी लगा लिया करते हैं। अत: श्रीकृष्ण ने भी पहले माखन खाया अब माटी खाकर मुँह साफ कर लिया।
–वैद्य लोग कहा करते हैं कि ‘विषस्य विषमौषधम्’ अर्थात विष ही विष की दवा है। विष मिट्टी का ही विकार है। भगवान ने सोचा कि पहले पूतना का विष पीया अब मिट्टी खाकर दवा कर लेनी चाहिए।

–भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं।  भगवान के पेट में जो बहुत से लोक हैं, वे चाह रहे थे कि हम लोगों को व्रज की माटी (रज) मिले । वह रज जिसका सम्बन्ध गोपियों व गायों के चरणों से है और जिस रज को पाने के लिए ब्रह्मा व श्रुतियां भी लालायित रहते हैं, भक्तवांछाकल्पतरू भगवान ने व्रज की माटी खाकर व्रजरज उन तक पहुँचा दी।
–श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकता है। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं।

–पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ।
–पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है, किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया।

–भगवान श्रीकृष्ण को अपनी मां को अपने मुंह के अन्दर सारे विश्व की सृष्टि दिखानी थी। इसके लिए उन्हें रजोगुण की आवश्यकता थी अत: माटी खाकर रज का संग्रह कर रहे थे।

–भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रक्खे हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं।
–पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया।

गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी, मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ?

‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। तू अकेले में छिपकर माटी खाने लगा है? तेरे सब सखा क्या कह रहे हैं? तेरे बड़े भैया बलदाऊ भी तो सखाओं की ओर से गवाही दे रहे हैं।’

मोहन तें माटी क्यों खाई।
ठाडे ग्वाल कहत सब बालक जे तेरे समुदायी।।

मुकरि गये में सुनी न देखी झूठेई आनि बनाई।
दे प्रतीति पसारी वदन तब वसुधा दरसाई।।

मगन भई जसुमति मुख चितवन ऐसी बात उपजाई।
सूरदास उर लाइ लालको नोन उतारत राइ।।

हमारे वेद, पुरान, श्रुतियां, उपनिषद् किसी में भी श्रीकृष्ण के लिए इस तरह ढीठ, चटोरा आदि शब्द नहीं बोले गए हैं। ये अधिकार केवल एक मां को है जो परब्रह्मरूपी पुत्र के अनिष्ट की आशंका से उसे साँटी लेकर डांट सकती है और कह सकती है कि–’अरे ओ चटोरे, तेरी जीभ तेरे वश में नहीं है, हाथ तेरे वश में नहीं है, पांव तेरे वश में नहीं है।’

मैया के भय से श्रीकृष्ण के अधर सूख गये थे। श्रीकृष्ण के नेत्र भी डर के मारे नाच रहे थे। श्रीकृष्ण के नेत्र सोच रहे हैं कि सत्य का पक्ष लें या स्वामी का पक्ष लें, इसलिए वे व्याकुल हो रहे हैं और उनसे बड़ी-बड़ी अश्रुबूंदें कपोलों पर ढुलकती हुई काजल की रेखा बना रही थी।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। इस पर श्रीकृष्ण तर्क देते हैं कि यदि ग्वालों ने देखा तो मैं अकेला नहीं था और अकेले में था तो ग्वाले साथ नहीं थे। ये सब मुझसे द्वेष करके झूठ बोल रहे हैं। मैया ने कहा कि अच्छा, तेरे ये सब साथी झूठे-तो-झूठे सही, पर तुम्हारा बड़ा भाई बलराम भी तो यही बोल रहा है। अब बताओ, दाऊ दादा की बात का क्या जबाव है तुम्हारे पास? इतने में दाऊ दादा श्रीकृष्ण के पास आकर खड़े हो गए और बोले–’तुम सबको झूठा बताते हो, जरा बाहर चलो, हम तुम्हें बताते है कि सच क्या है।’

श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’
यह सब कहते समय श्रीकृष्ण के मन में यह बात थी कि कुछ दिन पूर्व जब मैंने जँभाई लेते समय अपना मुँह खोला था तब मां ने उसमें समस्त विश्व देख लिया था और डर के मारे आँखें बन्द कर लीं थी। यदि आज भी मैं अपना मुँह खोलूंगा तो मैया अपनी आंखें बन्द कर लेगी और मैं बच जाऊंगा।

‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया।

भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी। और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं।

श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप, समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात् प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को।

उन्हें संदेह हुआ–यह है क्या ! यह कोई स्वप्न है या भगवान की माया? कहीं मेरी बुद्धि में ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया? सम्भव है, मेरे इस बालक में ही कोई जन्मजात योगसिद्धि हो।’ फिर उन्हें श्रीकृष्ण के स्वरूप का ज्ञान हो गया कि यह तो सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक नारायण हैं और वे उन्हें प्रणाम करने लगीं।

अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है। श्रीकृष्ण ने सोचा यदि मैया को यह ज्ञान बना रहता है तो हो चुकी बाललीला, फिर तो वह मेरी नारायण के रूप में पूजा करेगी। न तो अपनी गोद में बैठायेगी, न दूध पिलायेगी और न मारेगी। जिस उद्देश्य के लिए मैं बालक बना वह तो पूरा होगा ही नहीं। श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्र स्नेहमयी वैष्णवी माया को उनके हृदय में संचार कर दिया। यशोदामाता तुरन्त उस घटना को भूल गयीं। वात्सल्य से पूर्ण मैया ने लाला को गोद में उठा लिया और स्नेहपूर्वक उनका सिर सूँघने लगीं। माता का गुस्सा शांत हो गया।

उपनिषद्, सांख्य, योग, पांचरात्र आदि दूर-दूर से ही हाथ जोड़कर जिनकी महिमा का गान करते हैं, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता अपने अनन्त स्नेह से बेटा बनाकर गोदी में लिटाकर अपने हृदय का प्रेम-रस (दूध) पिला रही हैं और कृष्णप्रेम में तन्मय हो गयीं हैं। माता जिस समय अपने पुत्र को दूध पिलाती है, तब माता और पुत्र दोनों एक हो जाते हैं। अर्थात् माता यशोदा का ब्रह्मसम्बन्ध हो गया है। उसी समय माता की नजर चूल्हे पर उबलते गंगी (पद्मगन्धा)  गाय के दूध पर गयी। श्रीकृष्ण को गंगी गाय का दूध बहुत भाता है। इसलिए माता इस दूध का विशेष ध्यान रखती है। यह दूध बड़ा विलक्षण है। हजार गायों का दूध सौ गायों को, सौ गायों का दूध दस गायों को और दस गायों का दूध एक पद्मगन्धा गाय को पिलाकर उस पद्मगन्धा गाय से निकाला हुआ दूध है यह। इस प्रकार इस दूध का सम्बन्ध सैंकड़ों गायों से है। यह कन्हैया को अतिप्रिय दुर्लभ दूध है, यह यदि जल जायेगा तो बहुत हानि होगी। यह सोचकर माता ने श्रीकृष्ण को अतृप्त ही छोड़ दिया। माता श्रीकृष्ण को गोद से उतारकर पृथ्वी पर बैठा देती हैं और चूल्हे पर रखे दूध को देखने चली जाती हैं।

मनुष्य जब भगवान की अपेक्षा जगत से अधिक प्रेम करता है तो यह बात भगवान को अच्छी नहीं लगती है। यशोदा माता की भी यह बात श्रीकृष्ण को अच्छी नहीं लगी और वे चूल्हे में अग्नि को जोर से प्रज्जवलित होने की आज्ञा देते हैं। इसलिए दूध में एकदम उफान आता है।

दूध में उफान का भाव क्या है?

दूध में उफान का भाव है कि जब भी जीव का परमात्मा (ब्रह्म) से सम्बन्ध जुड़ता है तब परमात्मा थोड़ी परीक्षा लेते हैं। जब भी मनुष्य परमात्मा से मिलने की इच्छा रखकर साधना में आगे बढ़ने का प्रयास करता है तभी उसे सांसारिक सुखों व आसक्तियों की याद आने लगती है। अक्सर देखा जाता है कि जब भी हम पूजा कर रहे होते हैं तभी हमें घर व दफ्तर के सारे कार्य याद आते हैं। जो सुख हम भोग चुके हैं या जो सुख हमें भोगने हैं उनका स्मरण हमें तभी होता है जब हम जप आदि कर रहे होते हैं।

अनेक संतों ने दूध में उफान क्यों आया? इस पर अपने-अपने सुन्दर भाव रक्खे हैं। प्रस्तुत हैं कुछ भाव–

–इस दूध की इच्छा थी कि मैं श्रीकृष्ण के पेट में जाऊँ ताकि भगवत्सेवा में मेरा सदुपयोग हो। परन्तु यशोदामाता लाला को अपना दूध भरपेट पिलाती हैं। चूल्हे पर रखे दूध को विश्वास हो गया कि अब लाला के पेट में भूख नहीं रहेगी और मेरा उपयोग श्रीकृष्णसेवा में नहीं होगा। इसलिए मेरा जीवन व्यर्थ है। अत: मैं अग्नि में गिरकर मर जाऊँ।

–दूध ने विचार किया कि ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्णदर्शन से सारे पाप जल जाते हैं। परन्तु मैंने तो यशोदामाता की गोद में श्रीकृष्ण के दर्शन किए हैं फिर भी मुझे चूल्हे की अग्नि का ताप सहन करना पड़ रहा है। अत: मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं अग्नि में गिरकर मर जाऊँ। इसलिए दूध में उफान आया।

श्रीकृष्ण को अभी भी भूख लगी है। और मां उन्हें भूखा छोड़कर दूध को चूल्हे से उतारने चली गई।

यशोदामाता ने जलते हुए दूध को क्यों उतारा, इसकी बड़ी सुन्दर व्याख्या संतों ने की है–यशोदामाता ने मानो यह कहा कि जो भगवान का नाम ले, वह तर जाता है और उसको भव-ताप नहीं होता। किन्तु तुम (दूध) भगवान के सामने भगवान के लिए ताप-तप्त हो रहे हो, यह उचित नहीं है। यह कहकर माता ने उसको उतार दिया अर्थात् ‘तार दिया’।

माता ने मुझे पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तप किया और आज मुझे ही अतृप्त छोड़कर लौकिक वस्तुओं की चिन्ता कर रही है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि उसे जो मिलता है उसकी वह उपेक्षा करता है। श्रीकृष्ण को यह बहुत बुरा लगा और उन्हें क्रोध आ गया। वहां रखे चटनी पीसने के पत्थर को उन्होंने दही की मटकी पर दे मारा। उससे दही भरी मटकी फूट गयी।

संसार की आसक्ति ही दही भरी मटकी है और श्रीकृष्ण में आसक्ति ही भक्ति है। जब मनुष्य यह सोचता है कि पहले संसार को व्यवस्थित कर लूँ फिर भक्ति करूंगा तो यह गलत है। संसार तो क्षण-प्रतिक्षण बदल रहा है। न किसी का संसार (गृहस्थी) पूरी तरह से व्यवस्थित हुआ है, न होगा। इसलिए भगवान मटकी फोड़ देते हैं। संसार की आसक्ति को तोड़ देते हैं।

सुमरौ गोपाल लाल, सुंदर अति रूप-जाल,
मिटिहैं जंजाल सकल, निरखत सँग गोप-बाल। (श्रीछीतस्वामी)

सूरदासजी अपनी ‘सूर-विनयपत्रिका’ में कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की  को कौन समझ सकता है? बड़े-बड़ों का  (इन्द्र का) मान-भंग हुआ है और नीच कहलाने वाले (पूतना) पावन बनते हुए देखे जाते हैं। उनकी लीला का रहस्य कौन जान सकता है? भक्त नंददासजी कहते हैं कि जो ब्रह्म अनादि सनातन है, घट-घट में व्याप्त है, वही ब्रह्म का सगुणरूप श्रीकृष्ण, माता यशोदा की गोद में खेल रहा है, नन्द के आंगन में गोपियों के इशारों पर नाच रहा है, माटी खा रहा है, माखन चुरा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का अपने प्रेमी भक्तों के साथ बिलकुल खुला व्यवहार होता है; क्योंकि वहां वे योगमाया का आवरण हटाकर ही लीला करते है। भगवान श्रीकृष्ण भक्त के साथ खेलते हैं, खाते हैं, सोते हैं, कहीं भक्त के लिए रोते हैं, कहीं भक्त की सेवा करते हैं, कहीं भक्त के शत्रुओं को अपना शत्रु बतलाते हैं, कहीं भक्तों के साथ प्रेमालाप करते हैं, कहीं ज्ञान देते हैं। भक्त और भगवान में न जाने क्या-क्या रस की बातें होती हैं। वे उसके हो जाते हैं और उसको अपना बना लेते हैं।

इन रहस्यमयी लीलाओं का उद्देश्य प्रकट नहीं किया जा सकता है।

श्रीकृष्ण और माँ यशोदा में होड़ सी लगी रहती। जितना यशोदामाता का वात्सल्य उमड़ता, उससे सौगुना बालकृष्ण अपना और लीलामाधुर्…

Posted by Aaradhika on Sunday, January 24, 2016

6 COMMENTS

    • Archna Ben ko pranam Apka yah punit prayas is kalyug ke prabhav me akanth dube manas ko sanjeevani dene ka mahat karya kar hai.Aapke Hirday me sthapit us alokik param tatva ko ham naman karate hai

      • धन्यवाद आशुतोषजी ! आपके ये विचार मुझे लिखने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।

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  1. काफी अच्छा लगा पड़ के।लेकिन समझना मुश्किल हो जाता है।

  2. archana ji
    Archna Ben ko pranam Apka yah punit prayas is kalyug ke prabhav me akanth dube manas ko sanjeevani dene ka mahat karya kar hai.Aapke Hirday me sthapit us alokik param tatva ko ham naman karate hai

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