SHARE

‘गोपी’ शब्द का अर्थ

गोपी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ है पान करना। ‘गोभि: इन्द्रियै: भक्तिरसं पिबति इति गोपी।जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है।

FullSizeRender

गोपी का एक अन्य अर्थ है केवल श्रीकृष्ण की सुखेच्छा। जिसका जीवन इस प्रकार का है, वही गोपी है। गोपियों की प्रत्येक इन्द्रियां श्रीकृष्ण को अर्पित हैं। गोपियों के मन, प्राण–सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए हैं। उनका जीवन केवल श्रीकृष्ण-सुख के लिए है। सम्पूर्ण कामनाओं से रहित उन गोपियों को श्रीकृष्ण को सुखी देखकर अपार सुख होता है। उनके मन में अपने सुख के लिए कल्पना भी नहीं होती।  श्रीकृष्ण को सुखी देखकर ही वे दिन-रात सुख-समुद्र में डूबी रहती हैं।

गोपी श्रीकृष्ण से अपने लिए प्रेम नहीं करती अपितु श्रीकृष्ण की सेवा के लिए, उनके सुख के लिए श्रीकृष्ण से प्रेम करती है।

गोपी की बुद्धि, उसका मन, चित्त, अहंकार और उसकी सारी इन्द्रियां प्रियतम श्यामसुन्दर के सुख के साधन हैं। उनका जागना-सोना, खाना-पीना, चलना-फिरना, श्रृंगार करना, गीत गाना, बातचीत करना–सब श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाने के लिए है। गोपियों का श्रृंगार करना भी भक्ति है। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने के विचार से श्रृंगार किया जाए तो वह भी भक्ति है। मीराबाई सुन्दर श्रृंगार करके गोपालजी के सम्मुख कीर्तन करती थीं। उनका भाव था–’गोपालजी की नजर मुझ पर पड़ने वाली है। इसलिए मैं श्रृंगार करती हूँ।’

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा है–‘हे अर्जुन ! गोपियां अपने शरीर की रक्षा उसे मेरी वस्तु मानकर करती हैं। गोपियों को छोड़कर मेरा निगूढ़ प्रेमपात्र और कोई नहीं है।’ यही कारण है कि श्रीकृष्ण जोकि स्वयं आनन्दस्वरूप हैं, आनन्द के अगाध समुद्र हैं, वे भी गोपीप्रेम का अमृत पीकर आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।

गोपियों का मन व प्राण

बंदौं गोपी-जन-हृदय, जो हरि राखे गोय।
पलकहुँ नहिं निकसत कबहुँ, मानि परम सुख सोय।। (पद रत्नाकर)

गोपियों के प्राण और श्रीकृष्ण में और श्रीकृष्ण के प्राण और गोपियों में कोई अंतर नहीं हैं क्योंकि वे परस्पर अपने-आप ही अपनी छाया को देखकर विमुग्ध होते हैं क्योंकि गोपियां भगवान श्रीकृष्ण की छायामूर्तियां हैं और उनका प्रेम दिव्य, अप्राकृत और अलौकिक है।

कान्ह भए प्रानमय प्रान भए कान्हमय,
हिय मैं न जानि परै कान्ह है कि प्रान है।।

भगवान श्रीकृष्ण ने गोपांगनाओं के विषय में स्वयं उद्धवजी से कहा है–

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्त्तदैहिका:। (श्रीमद्भागवत)

‘गोपियों ने मेरे मन और मेरे प्राण को ही अपने मन-प्राण बना लिया और मेरे लिए ही उन्होंने समस्त देह-सम्बन्धी कार्यों का त्याग कर दिया है।’ श्रीकृष्ण ही गोपियों के मन हैं। श्रीकृष्ण ही उनके प्राण हैं। उनके सारे कार्य सहज ही श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और श्रीकृष्ण के सुख के लिए ही होते हैं। इसलिए गोपी को यह पता नहीं लगाना पड़ता कि भगवान किस बात से प्रसन्न होंगे। उसके अंदर भगवान का मन ही काम करता है।

बंदौं गोपी-मन सरस, मिल्यौ जो हरि-मन जाय।
हरि-मन गोपीमन बन्यौ करत नित्य मनभाय।। (पद रत्नाकर)

श्रीकृष्ण गोचारण के लिए वन में जाते थे। गोपियां गांव में ही रहती थीं, परन्तु उनके मानस नेत्रों के सामने दिनभर श्रीकृष्ण की मधुर लीला प्रकट होती रहती थी। न उन्हें अपनी देह की सुध रहती थी और न ही घर-गृहस्थी में मन लगता था। कभी उन्हें आभास होता कि कन्हैया दांये खड़ा है, कभी लगता कि वह बांये खड़ा है। उनकी आँखों के सामने तो श्रीकृष्ण का मतवाला रूप ही छाया रहता। यथा–श्रीकृष्ण का कपोल (गाल) बांयी बाँह की ओर झुका है, उनके कपोलों पर गायों के खुरों से उड़ी धूल की वजह से कुछ पीतिमा आ गई है, नेत्रों में लाली है, काले-काले घुँघराले बालों पर धूल लगी है, फहराता हुआ पीताम्बर है, चितवन में प्रेम है, अधरों पर मुस्कान है और वे मतवाले हाथी के समान मन्द-मन्द गति से हमारा दु:ख दूर करने के लिए आ रहे हैं। यह था गोपियों का मन। घर में, वन में, कुँज में, नदी-तट पर–जहां भी ये रहती हैं, वहां इनका मन उसी चितचोर मोहन को देखने के लिए मचलता रहता था। वे अपने मन में, अपनी वाणी में और अपनी आँखों में निरन्तर श्रीकृष्ण का ही स्पर्श पातीं थीं, उन्हीं के दर्शन करती थीं। इस प्रकार वे भगवन्मयी हो गयीं थीं।

IMG_1792

श्रीकृष्ण के मथुरा से जाने के बाद जब उद्धवजी गोपियों को समझाने व्रज में आते हैं तब गोपियाँ उद्धवजी से कहती हैं–’यहां तो श्याम के सिवा और कुछ है ही नहीं; सारा हृदय तो उससे भरा है, रोम-रोम में तो वह छाया है। तुम्ही बताओ, क्या किया जाय ! वह तो हृदय में गड़ गया है और रोम-रोम में ऐसा अड़ गया है कि किसी भी तरह निकल ही नहीं पाता; भीतर भी वही और बाहर भी सर्वत्र वही।’

उर में माखनचोर गड़े।
अब कैसे निकसैं वे ऊधौ, तिरछे आनि अड़े।।

आगे गोपियां कहती हैं–

ऊधौ, मन न भए दस-बीस।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस।।

अर्थात् हे उद्धव ! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। एक ही मन है, वह तो स्याम के संग चला गया अब वह दूसरे में कैसे रमे। इसीलिए गोपी श्रीकृष्ण को ‘मनचोर’ भी कहती है।

मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हरि लियौ माधुरी मूरति, निरख नयन की कोर।

मन तो पहले से ही किसी एक (श्रीकृष्ण) का हो गया है; उन्होंने मन पर पूरा अपना अधिकार जमा लिया है, और स्वयं आकर सदा के लिए उसमें बस गये हैं। इसलिए अब और किसी दूसरे की इसमें गुंजायश ही नहीं है। यदि कोई आता भी है तो उसे श्रीकृष्ण को देखकर दूर से ही लौट जाना पड़ता है।

सबसे अधिक आश्चर्य तो उद्धवजी को तब हुआ, जब गोपी-कृपा से उद्धवजी ने श्रीकृष्ण को गोपियों के बीच अपनी आंखों के सामने देखा। तब वे अपनी ज्ञानगाथा भूल गए और गोपियों की चरणरज पाने के लिए व्रज में लता-गुल्म-औषधि बनने की इच्छा करके गोपियों का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया।

श्रीकृष्ण ने अपने को गोपियों से अलग करके उन्हें कोटि-कोटि रूप में अपने-आप का दान किया था। गोपियां आधे क्षण के लिए भी श्यामसुन्दर को अपने हृदय से दूर नहीं कर पातीं हैं। श्रीकृष्ण साक्षात् नहीं हैं तो क्या हुआ, उनकी स्मृतियां तो हृदय में जीवित हैं। उनकी गौएँ, उनके स्पर्श किए हुए कदम्ब के वृक्ष, करील की कुँजें, यमुना-तट तो है; जिन्हें देखकर वे प्रियतम का आभास कर लेती हैं। इन्हीं स्थानों पर श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ लीलाएं की थीं, उन अमृत क्षणों को वे कैसे भूल सकती हैं। उनकी एकमात्र चिन्ता और अभिलाषा यही है कि उनके प्रियतम श्यामसुन्दर जहाँ भी रहें, सुखी रहें।  जब उद्धवजी ने गोपियों से कहा कि तुम कहो तो मैं हमेशा के लिए श्रीकृष्ण को तुम्हारे पास ले आता हूँ तब गोपियों ने उत्तर दिया–यदि हमारे पास आने पर उनकी रत्ती भर भी बात बिगड़ती है तो वे यहां कभी न आएं। हम आजीवन उनके विरह में घुल-घुलकर मरती रहेंगी। परन्तु हमारा जन्म उनको सुख पहुँचाने के लिए है, दु:ख पहुँचाने के लिए नहीं। ब्रह्माजी कहते हैं कि इसी उत्कृष्ट प्रेम के कारण गोपियों की चरणधूलि का इतना महत्व है कि इसके लिए श्रुतियां लालायित रहती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं–‘उसके (गोपी) पीछे-पीछे मैं सदा इस विचार से चला करता हूँ कि उसके चरणों की धूलि उड़कर मुझ पर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊँ।’

इसी सत्य के आधार पर यह कहा गया है–वृन्दावनं परितज्य पादमेकं न गच्छति। अर्थात् श्यामसुन्दर वृन्दावन को छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाते। कुछ वैष्णवाचार्यों के अनुसार श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी के साथ अपना एक प्रकाश-विशेष मथुरा भेज दिया। व्रज शब्द में रज के सिवाय और है क्या? व्रज में ब्रह्म का ‘ब’ है और रज है–ब्रह्मरज को ही संक्षेप में व्रज बोलते हैं। वहां ब्रह्म ही धूल के रूप में उड़ता-पड़ता रहता है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में गोपियों की अपने से अभिन्नता और दिव्यता बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं–’जैसा मैं वैसी तुम हो। वेद में हमारा किसी प्रकार का भेद वर्णित नहीं है। मैं तुम्हारा प्राण हूँ और तुम मेरे प्राण हो। तुम गोलोक से मेरे साथ आयी हो और मेरे साथ ही तुम्हारा यहाँ से गमन होगा।’

गोपियों के नेत्र

सूरदासजी ने गोपियों के श्रीकृष्णप्रेम का अद्भुत चित्रण किया है। एक गोपी दूसरी गोपी से कह रही है–

नैना कह्यौ न मानैं मेरौ।
मो बरजत बरजत उठि धाए, बहुरि कियौ नहिं फेरौ।।

मेरे नेत्र मेरा कहना नहीं मानते, मेरे बार-बार मना करने पर भी वे श्यामसुन्दर की तरफ देखने लगे और फिर उन पर मोहित हो गए और लौटकर आये ही नहीं। हरिदर्शन से नेत्र ललचा गए और भगवान के दास हो गए।

लोचन भए स्याम के चेरे।
एते पै सुख पावत कोटिक, मो न फेरि न हेरे।।

श्यामसुन्दर के दास हो जाने के कारण नेत्र करोड़ों गुना आनंद पाते हैं पर इन्होंने मेरा ही साथ छोड़ दिया है। फिर गुस्से में कहती है–’स्याम छवि लोचन भटकि परे।’ श्यामसुन्दर की शोभा ही कुछ ऐसी है कि बड़े-बड़े योगियों को भी भटका देती है। इसलिए इसमें इनका कोई दोष नहीं है। मैं ही गलती पर थी। सखी ! ये तो बड़े भाग्यशाली हैं कि इनपर श्रीकृष्ण की कृपा हो गयी।

ये अँखियाँ बड़भागिनी, जिन्हि रीझे स्याम।
अंग तैं नैक न टारहीं बासर औ जाम।।

जबसे हमने श्यामसुन्दर की सुन्दर छवि के दर्शन किए हैं, हम तो मानो बिक गई हैं। जिन आँखों में भगवान की छवि बस जाती है, उनमें अन्य वस्तुओं के लिए स्थान ही कहाँ? गोपियां कहती हैं–

जिन नैनन प्रीतम बस्यौ, तहँ किमि और समाय।
भरी सराय रहीम लखि, पथिक आपु फिरि जाय।।

गोपियां भगवान को नित्य ही देखती थीं; परन्तु क्षण भर का वियोग भी उनके लिए असह्य हो जाता था, आँखों पर पलक बनाने के लिए वे विधाता को कोसती थीं; क्योंकि पलकें न होतीं तो आँखें सदा खुली ही रहतीं। श्रीमद्भागवत में गोपियां कहती हैं–

‘जब आप दिन के समय वन में विचरते हैं तब आपको न देख सकने के कारण हमारे लिए एक-एक पल युग के समान बीतता है। फिर सन्ध्या के समय, जब वन से लौटते समय हम घुँघराली अलकावलियों से युक्त आपके मुख को देखती हैं, तब हमें आँखों में पलक बनाने वाले ब्रह्मा मूर्ख प्रतीत होने लगते हैं। अर्थात् एक पल भी आपको देखे बिना हमें कल नहीं पड़ती।’

गोपियों के श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम की एक बहुत सुन्दर कथा

द्वारका में जब भी गोपियों की बात चलती तो श्रीकृष्ण को रोमांच हो आता। आँसू बहने लगते, वाणी गद्गद् हो जाती और वे कुछ बोल नहीं पाते। श्रीकृष्ण की ऐसी दशा देखकर सभी पटरानियों को बड़ा आश्चर्य होता कि हममें ऐसी क्या कमी है और गोपियों में ऐसा क्या गुण है जो श्रीकृष्ण की यह दशा हो जाती है ! क्या नहीं है यहां, जो वहां था?

भगवान ने इसका उत्तर देने के लिए एक नाटक किया। वे सर्वसमर्थ हैं, कुछ भी बन सकते हैं। वे रोग बन गए और उनका पेट दुखने लगा। सभी रानियों ने काफी दवा की पर श्रीकृष्ण के पेट का दर्द ठीक नहीं हुआ। वैद्यजी बुलाए गए। उन्होंने पूछा–’महाराज, क्या पहले भी कभी पेट में दर्द हुआ है और कोई दवा आपने प्रयोग की हो तो बताएँ।’

भगवान ने कहा–’हां, दवा तो मैं जानता हूँ। यदि हमारा कोई प्रेमी अपने चरणों की धूल दे दे तो उस धूल के साथ हम दवा ले लें।’ रुक्मिणीजी और सत्यभामाजी ने सोचा–चरणों की धूल तो हमारे पास है ही और प्रेमी भी हम हैं ही, पर शास्त्र कहता है कि पति को चरणों की धूल देने पर पाप लगेगा और नरक में जाना पड़ेगा। अत: पाप और नरक के डर से उन्होंने चरणधूलि देने से मना कर दिया। उनको देखकर अन्य सोलह हजार रानियों व द्वारकावासियों ने भी चरणधूलि देने से मना कर दिया।

उसी समय नारदजी वहां पधारे और बोले–’महाराज पेट दुखता है, यह कैसी माया रची है आपने?’ भगवान श्रीकृष्ण बोले–’दुखता तो बहुत है, तुम कुछ उपाय कर दो, किसी प्रेमी की चरणधूलि ला दो।’ नारदजी ने सोचा–प्रेमी तो हम भी हैं और हमारे पास भी धूल है पर जब हमसे बड़ा प्रेम का दर्जा रखने वाली रुक्मिणीजी ने ही चरणधूलि नहीं दी तो हम कैसे दे दें? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–’नारद ! जरा व्रज में तो हो आओ।’ वीणा बजाते हरिगुणगान करते हुए नारदजी व्रज में गोप-गोपियों के बीच जा पहुँचे। सब गोपियों ने नारदजी को घेर कर पूछा–’कहां से पधारे हैं, महाराज?’ जब उनको मालूम हुआ कि द्वारका से आये हैं तो श्रीकृष्ण के समाचार जानने के लिए वे अधीर हो गईं और उन्होंने नारदजी से प्रश्नों की झड़ी लगा दी। गोपियों ने पूछा–’हमारे प्राणनाथ प्रसन्न हैं न?’ नारदजी ने उत्तर देने के बजाय मुँह बना लिया। गोपियों के प्राण निकलने लगे। वे बोली–’महाराज, जल्दी बताइए, मामला क्या है?’ नारदजी बोले–’श्यामसुन्दर का पेट दुखता है, दवा तो बहुत हुई पर कुछ लाभ न हुआ।’ गोपियों ने पूछा–’कोई उपाय?’ नारदजी ने कहा–’उपाय तो स्वयं श्रीकृष्ण ने बतलाया है। किसी प्रेमी की चरणधूलि मिल जाए तो वह अच्छे हो जायेंगे। श्रीकृष्ण ने कहा था कि गोपियां हमारी बड़ी प्रेमिका हैं।’  गोपियाँ बोली–’वे प्रेमी मानते हैं हमको? तो ले जाइए चरणों की धूल। जितनी चाहिए उतनी ले जाइए।’ ऐसा कहकर सब गोपियों ने अपने चरण आगे बढ़ा दिए। जितनी मरजी हो बाँध लें महाराज ! नारदजी ने कहा–’अरे ! पागल हो गयी हो क्या, क्या कर रही हो तुम? जानती नहीं किसको धूल दे रही हो तुम, भगवान को ! नरक मिलेगा तुम्हें।’ गोपियाँ बोली–’हम भगवान तो जानती नहीं, वे तो हमारे प्राणनाथ हैं और यदि उनके पेट का दर्द अच्छा होता है तो हमें अनन्तकाल तक नरक में रहना पड़े तो भी हम नरक में रहेंगी, कभी शिकायत नहीं करेंगी। आप धूल ले जाइए और जल्दी जाइए जिससे उनके पेट का दर्द अच्छा हो जाए।’

प्रेम की ऐसी उज्जवलता जिसमें न पुण्य का लोभ है न पाप की आशंका, न नरक की विभीषिका का डर है, न स्वर्ग का लालच, न सुख की कामना है, न दु:ख का दर्द। ऐसा प्रेम केवल गोपियों में ही दिखाई देता है। गोपियों को निज सुख की कामना रत्ती भर भी नहीं है। नारदजी चकित रह गये। मन-ही-मन सोचने लगे–’हम तो झूठे ही प्रेमी बन रहे थे अब तक। उद्धव ने तो व्रज की लता, गुल्म बनकर गोपियों की चरणधूलि मांगी थी। हमें तो प्रत्यक्ष मिल गयी। धन्य हो गये हम।’ इसके बाद गोपियों की चरणधूलि से अपने मस्तक को अभिषिक्त किया और फिर गोपियों की चरणधूलि की पोटली बाँधकर सिर पर रख ली और वीणा बजाते हरिगुण गाते पहुँच गये द्वारका के महल में। नारदजी ने भगवान से कहा–’ले आया, महाराज।’  भगवान ने पूछा–’किसने दी?’ नारदजी ने कहा–’गोपियों ने दी। बहुत समझाया महाराज, पर वे ऐसी पगली हैं कि मानी ही नहीं।’ कहने लगीं–’हमारे अघासुर को तो पहले ही श्यामसुन्दर मार गये, हमारे पास ‘अघ’ (पाप) है कहां और यदि कोई पाप होगा भी तो अपने प्राणधन के लिए हम नरक में रहने को तैयार हैं। घोर यन्त्रणा सहने को तैयार हैं। पर हमारे श्रीकृष्ण प्रसन्न रहें, इसी में हमारी प्रसन्नता है। हमें आपके ज्ञान-ध्यान की बातें समझ में नहीं आतीं। हम तो प्रेम के उस मधुर आस्वाद को जानती हैं जिसकी एक चितवन से कोटि-कोटि नरकों की यन्त्रणाएं आनन्द के सागर में बदल जाती हैं। आप ये चरणधूल ले जाइए और श्यामसुन्दर को जल्दी अच्छा कीजिए।’ भगवान हंसने लगे और अधीर होकर उस पोटली को कभी अपने वक्ष:स्थल पर, कभी आँखों पर, कभी सिर पर रखते हुए प्रेवावेश में निमग्न हो गए और गोपियों की चरणधूलि मस्तक पर लगा ली। सत्यभामाजी, रुक्मिणीजी और अन्य रानियां चकित रह गईं। चलते-चलते नारदजी ने पटरानियों से कहा कि हम सब प्रभु को सुख पहुँचाने की कोशिश तो करते हैं, किन्तु हमारा भाव गोपियों के सामने अति तुच्छ है। सचमुच गोपियों का प्रेम ही प्रेम कहलाने योग्य है। पेट तो अच्छा था ही, यह तो श्रीकृष्ण की लीला थी यह अवगत कराने के लिए कि गोपियों के नाम से उनकी आँखों में आँसू क्यों आते हैं।

गोपियों का यह भाव प्रेम की अत्यन्त ऊंची स्थिति का द्योतक है। यह गोपी-भाव या गोपी-प्रेम सर्वस्व त्याग की भावना पर ही प्रतिष्ठित होता है। गोपी-प्रेम विलक्षण है। इसमें ‘भोग’ है पर ‘अंगसंयोग’ नहीं; ‘श्रृंगार’ है पर ‘राग’ नहीं; ‘जगत’ है पर ‘माया’ नहीं।

बंदौं गोपी-भाव, जो नित प्रियतम-सुख हेतु।
बढ़त पलहिं पल भंग करि सब मरजादा-सेतु।। (पद रत्नाकर)

गोपियों के भाग्य की सराहना करते हुए श्रीमद्भागवत में शुकदेवजी कहते हैं–’ब्रह्मा, शिव और सदा हृदय में रहने वाली लक्ष्मीजी ने भी मुक्तिदाता भगवान का वह दुर्लभ प्रसाद नहीं पाया, जो प्रेमिकाश्रेष्ठ गोपियों को मिला।’

भगवान को निर्गुण से सगुण, निराकार से साकार, भोक्ता से भोग्य बनाकर व्रज-भूमि में लाने वाली गोपियां ही हैं।

श्रीगोपियों का प्रेम साक्षात कौस्तुभमणि के समान है जो केवल एक ही है और भगवान के कण्ठ का आभूषण है, वह अन्य किसी भी जगह नहीं मिलती। इसी तरह गोपियों का श्रीकृष्ण-प्रेम भी भगवान की लीलास्थली व्रज के सिवाय कहीं और नहीं मिलता।

कबीरदासजी गोपियों की वंदना करते हुए कहते हैं–

कबिरा कबिरा क्या कहे चल यमुना के तीर।
एक एक गोपी चरण पर बारौ कोटि कबीर।।

4 COMMENTS

  1. Didi ji_charan sparsh Bagwan shree krishn aur gopiyoin ji key barey main jaisa aapney varnarn kiya ye bahut Hi achchah laga.Issay hamari aastha ko majbuti mili.Aap sey binti hai aysi Hi dharmik kathaon ka barman karti rahain.Jai shree radhe shyam ji ki.

  2. अदभुत ! जय  हो  !

    મંગળવાર, 19 જાન્યુઆરી, 2016 9:05:38 AM એ, Aaradhika લખાયેલ:

    #yiv0135957664 a:hover {color:red;}#yiv0135957664 a {text-decoration:none;color:#0088cc;}#yiv0135957664 a.yiv0135957664primaryactionlink:link, #yiv0135957664 a.yiv0135957664primaryactionlink:visited {background-color:#2585B2;color:#fff;}#yiv0135957664 a.yiv0135957664primaryactionlink:hover, #yiv0135957664 a.yiv0135957664primaryactionlink:active {background-color:#11729E;color:#fff;}#yiv0135957664 WordPress.com | Archana Agarwal posted: “‘गोपी’ शब्द का अर्थगोपी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ है पान करना। ‘गोभि: इन्द्रियै: भक्तिरसं पिबति इति गोपी।’ जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है।गोपी का एक अन्य ” | |

  3. Gopiyon aur BHAGWAN ke prem ko samjh paana iss buddhi ke bass kaa nahin. Gopiyon ka niswaarth prem aur Bhakti ki koi vyakhya nhin. Krishan kripa se gopi bhaav ka ek sukshm ansh bhi mil jaaye..to yeh aankhe aur jeevan safal ho jaaye. Krishan aur gopiyon ke prem aur virah ko yaad krke aankhe bhari rhe..aesi ichha ho… Bahut bahut dhanyawaad.

LEAVE A REPLY