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श्याम श्याम केहि बिधि भये कहो सखी यह बात।
मात तात गोरे सबै कारो कृष्णहि गात।।
बिछुरत को अति दुख लह्यो, सुरति करी बसुजाम।
राधा की विरहाग्नि में भयो श्याम जरि श्याम।। (रामरत्न अवस्थी)

अर्थात्—एक सखी दूसरी सखी से पूछती है कि श्यामसुन्दर श्यामवर्ण क्यों हैं जबकि उनके माता-पिता तो गोरे हैं। दूसरी सखी कहती है कि श्रीराधा से बिछुड़ने पर दिनरात उनकी याद कर दु:खी होते हैं, इसलिए विरहाग्नि में जलकर श्यामसुन्दर काले हो गए हैं।

नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण होने से श्रीकृष्ण नीलमणि, सांवरा, श्यामसुन्दर, श्याम, सांवलिया सेठघनश्याम कहलाते हैं।

सांवले सलोने श्रीकृष्ण को देख यशोदाजी को हुआ आश्चर्य

सूतिकागृह में व्रजराजनन्दिनी यशोदा ने जब अपने बगल में लेटे शिशु को देखा तो वे सोचने लगीं—क्या यह बालक मणिमय है? इसके शरीर के अंग नीलमणि (नीलम) से, होंठ रक्तरागमणि (रूबी) से और नख अनार के दानों के समान रंग वाली हीरकमणि या पुखराजमणि से बने हैं। परन्तु यह तो संभव नहीं; क्योंकि मणि तो कठोर होती है; यह शिशु तो अत्यन्त मृदु और सुकुमार है। लगता है विधाता ने इसकी रचना पुष्पों से की है—मानो नीलकमल से इसके अंगों का, बन्धूकपुष्पों से इसके होंठों का, जपाकुसुमों से इसके हाथ व पैर के तलवों का और मल्लिकापुष्पों से इसके नखों का निर्माण हुआ है। इसी कारण वे श्रीकृष्ण को ‘नीलमणि’ कहकर बुलाती थीं।

गोरे नन्द जशोदा गोरी, तू कत स्यामल गात

इन्द्रदेव के कोप से व्रजवासियों और गौओं की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने जब सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका ऊंगली पर उठाया तो सभी लोगों को प्रसन्नता हुई कि कन्हैया कि वजह से व्रज, व्रजवासियों और गौओं की रक्षा हुई; लेकिन अनेक लोगों को शंका होने लगी कि ’क्या यह नन्दजी का लाला है या कोई बड़ा देव है?’

व्रजवासी नन्दमहल के आंगन में एकत्र हो गए। एक ने कहा—‘यह नन्दबाबा का पुत्र नहीं है।’ दूसरा बोला—‘तुझे यह बात अब समझ में आई है, मुझे तो इसके जन्म से ही यही शंका है। नन्दबाबा गोरे हैं, नन्दरानी यशोदा गोरी हैं, पर कन्हैया काला क्यों है? क्या नन्दबाबा किसी दूसरे का लड़का ले आए हैं?’

सभी ने नन्दरायजी से आग्रह किया—‘महाराज! आप सच-सच बताइए, क्या यह कन्हैया आपका लड़का है? नन्दबाबा ने हाथ जोड़कर कहा—‘मैं अपनी गायों की शपथ खाकर कहता हूँ कि कन्हैया मेरा पुत्र है।’ श्रीकृष्ण उस समय यशोदाजी की गोद में खेल रहे थे। जब व्रजवासियों की बात यशोदाजी ने सुनी तो उन्होंने विनोद में श्रीकृष्ण से पूछा—‘बेटा! तू किसका पुत्र है?’ श्रीकृष्ण मचलते हुए बोले—‘मैं तेरा बेटा हूँ और तू मेरी मां है।’ माता ने कन्हैया को पुचकारते हुए कहा—‘बेटा! ये सब संदेह कर रहे हैं कि मैं और नन्दबाबा गोरे हैं, फिर तू काला कैसे हो गया?’

श्रीकृष्ण ने कहा—‘मां! इसमें तेरा दोष है। मेरा जन्म अंधियारी रात्रि को बारह बजे हुआ। मैं तुझे जगाने लगा, किन्तु तू जगी नहीं। इसलिए मैं सवेरे तक अन्धकार में लोटता रहा। अन्धकार मुझसे लिपट गया; इसलिए मैं काला हो गया।’

सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के बालसुलभ मन में उठने वाली इसी शंका को बड़ी बारीकी के साथ चित्रित किया है—

मैया मोहै दाऊ बहुत खिझायो।
मोसौ कहत मोल को लीनों, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौ इहि रिसि के मारे, खेलन हौं नहिं जात।
पुनि-पुनि कहत कौन हौ माता, को हौ तेरौ तात।
गोरे नन्द जशोदा गोरी, तू कत स्यामल गात।।

सूरदासजी का यह अत्यन्त लोकप्रिय पद है। बड़े भाई बलदाऊ गौरवर्ण थे। वे श्रीकृष्ण के श्याम रंग पर यदा-कदा उन्हें चिढ़ाया करते थे। एक दिन कन्हैया मैया से बलदाऊ की शिकायत करते हुए कहने लगे—मैया, दाऊ मुझे ग्वालबालों के सामने बहुत चिढ़ाता है। वह मुझसे कहता है कि यशोदा मैया ने तुझे मोल लिया है। तेरे माता-पिता कौन हैं? क्योंकि नंदबाबा तो गोरे हैं और मैया यशोदा भी गौरवर्णा हैं, लेकिन तू सांवले रंग का कैसे है? यदि तू उनका पुत्र होता तो तुझे भी गोरा होना चाहिए। जब दाऊ ऐसा कहता है तो ग्वाल-बाल चुटकी बजाकर मेरा उपहास करते हैं, मुझे नचाते हैं और मुस्कराते हैं। क्या करूं मैया! इसी कारण मैं खेलने भी नहीं जाता। इस पर भी तू मुझे ही मारने को दौड़ती है। दाऊ को कभी कुछ नहीं कहती। श्रीकृष्ण की रोष भरी बातें सुनकर माता यशोदा कन्हैया को समझाकर कहती हैं कि वह बलदाऊ तो बचपन से ही चुगलखोर और धूर्त है। जब श्रीकृष्ण मैया की बातें सुनकर भी नहीं माने तब यशोदाजी बोलीं—‘कन्हैया मैं गौओं की सौगंध खाकर कहती हूँ कि तू मेरा ही पुत्र है और मैं तेरी मैया हूँ।’

श्रीकृष्ण का रंग सांवला क्यों हैं—जैसे भाव वैसा स्पष्टीकरण

श्यामसुन्दर के श्यामरंग से सम्बन्धित विभिन्न भाव इस प्रकार हैं—

—एक बार निकुंजलीला में श्रीराधाजी ने कहा—‘श्यामसुन्दर आप सुन्दर तो हैं किन्तु काले क्यों हैं?’ श्रीकृष्ण ने कहा—‘राधे मैं तो तेरी शोभा बढ़ाने के लिए ही काला होकर आया हूँ।’

—गोपियां सब जगह श्रीकृष्ण का दर्शन करतीं है, उनके नेत्रों और हृदय में श्रीकृष्ण ही बसे हैं।

सांवलिया मन भाया रे।
सोहिनी सूरत मोहिनी मूरत, हिरदै बीच समाया रे।।
देस में ढूंढ़ा, विदेस में ढूंढ़ा, अंत को अंत न पाया रे।। (यकरंगजी)

दिन-रात श्रीकृष्ण-चर्चा में लगी हुई गोपियों में से एक दिन एक गोपी ने पूछा—‘नन्दबाबा गोरे, यशोदाजी गोरी, दाऊजी गोरे, घर भर में सभी गोरे हैं, पर हमारे श्यामसुन्दर ही सांवरे कैसे हो गए?’ इस पर दूसरी गोपी ने उत्तर दिया—‘बहिन! क्या तू इतना भी नहीं जानती, सुन—

कजरारी अँखियन में बस्यो रहत दिन रात।
पीतम प्यारो है सखी, तातें सांवर गात।। (नागरीदास)

कितना अद्भुत श्रीकृष्णप्रेम है गोपी का। गोपी की कजरारी आँखों में केवल श्रीकृष्ण ही बसते हैं, जगत में उसकी आँखें किसी और को देखती ही नहीं। इसलिए गोपियों की आँखों में लगे काजल से उनके प्रीतम स्यामसुन्दर सांवले हो गए हैं।

—भगवान श्रीकृष्ण जब कौरवों और पांडवों में संधि कराने के लिए हस्तिनापुर गए तो दुर्योधन श्रीकृष्ण का अपमान करने के लिए पूछता है—‘तुम नंद-यशोदा के पुत्र हो फिर काले क्यों हो?’ श्रीकृष्ण ने कहा—‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृतप्रवृत्त: अर्थात् ‘मैं गोरा था किन्तु तेरा काल होने के कारण काला होकर आया हूँ।’

—ज्ञानेश्वरजी ने अपने गीता भाष्य में लिखा है कि दूर से तो श्रीकृष्ण का श्रीअंग भक्तों को श्याम लगता है किन्तु समीप जाने पर मालूम पड़ता है कि वह अत्यन्त प्रकाशमय है।

—एकनाथजी का मत है कि लोभ का रंग पीला है, क्रोध का रंग लाल है, काम का रंग काला है। मनुष्य के हृदय में काम रहता है इसलिए कलेजा काला होता है। जो श्रीकृष्ण का ध्यान करता है, प्रेम से श्रीकृष्ण की सेवा करता है उसका हृदय धीरे-धीरे उजला हो जाता है। भगवान उसके हृदय के कालेपन को खींच लेते हैं और अपने श्रीअंग में रखते हैं; इसलिए वे ‘स्यामल गात’ हैं।

यह सांवरा रंग ऐसा है कि इसमें डूबते चले जाओ तो मन उज्जवल होता चला जाता है। संसार और इसके भोग बहुत सुन्दर और उज्जवल दीखते है पर इसमें डूबते ही हृदय मलिन, काला हो जाता है।

बलिहारी वा प्रेम की गति नही समझे कोय।
ज्यों-ज्यों डूबै स्याम रंग त्यों-त्यों उज्जवल होय।।

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