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ग्रहाधीनं जगत्सर्वं ग्रहाधीना: नरावरा:।
कालज्ञानं ग्रहाधीनं ग्रहा: कर्मफलप्रदा:।। (बृहस्पतिसंहिता)

अर्थात्–यह सम्पूर्ण संसार ग्रहों के अधीन है, सभी श्रेष्ठजन भी ग्रहों के ही अधीन हैं, काल का ज्ञान भी ग्रहों के ही अधीन है और ग्रह ही कर्मों का फल देने वाले होते हैं।

मानव शरीर है भोगयोनि

जिस-जिस कर्म का फल भोगने के लिए मनुष्य ने यह शरीर धारण किया है, उसे उस-उस कर्म का फल इस शरीर से भोगना ही पड़ेगा। प्रारब्ध के भोगों में बिल्कुल भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। उनको भोगने पर ही उनसे छुटकारा मिल सकता है। इसी से मानव शरीर का एक नाम ‘भोगायतन’ है अर्थात् गत जन्मों के शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगने का स्थान।

कुण्डली में ग्रहों के अशुभ प्रभाव से कैसे बचें?

कुण्डली के ग्रह बलवान हों तो मनुष्य के जीवन में अपार खुशियां आती हैं। ज्योतिषशास्त्र में कहा गया है कि जीव अच्छे कर्म करके भविष्य का निर्माण अपनी इच्छानुसार कर सकता है।

▪️जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं,
▪️इष्टदेव की आराधना व स्तोत्रपाठ करते हैं,
▪️भगवान के नाम का जप करते हैं,
▪️तीर्थों में स्नान करते हैं,
▪️किसी को पीड़ा नहीं पहुंचाते हैं,
▪️सबका भला करते हैं,
▪️सदाचार का पालन करते हैं,
▪️तथा शुद्ध व सरल हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर अनिष्ट ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ता; बल्कि वही ग्रह उन्हें सुख प्रदान करते हैं।

नवग्रह होंगे बलवान तो पूरे हो जाते हैं जीवन के अरमान

स्तुति यानि प्रशंसा किसे प्रिय नहीं होती? नवग्रहों को भी प्रसन्न करने के लिए यदि नित्य स्तोत्रपाठ कर लिया जाए तो कुण्डली के ग्रहदोष दूर हो जाते हैं और सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं।

भगवान वेदव्यासजी ने मनुष्य के दु:खों को दूर करने के लिए ऐसे ही अनेक स्तोत्रों की रचना की जिनमें से एक स्तोत्र है नवग्रह स्तोत्र। यह स्तोत्र बहुत ही प्रभावशाली है। यदि धैर्यपूर्वक श्रद्धा के साथ इस नवग्रह स्तोत्र का पाठ नित्य किया जाए तो कुण्डली के अशुभ ग्रह भी धीरे-धीरे अनुकूल हो जाते हैं और मनुष्य ऐश्वर्य व आरोग्य प्राप्त कर खुशी से जीवन-संग्राम पार कर लेता है।

सभी ग्रहों को प्रसन्न करने वाला नवग्रह स्तोत्र (हिन्दी अर्थ सहित)

नवग्रह स्तोत्र वेदव्यासजी द्वारा रचित है—

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्।।

अर्थात्–जो जपा (अड़हुल) के पुष्प के समान लाल आभा वाले हैं, महान तेज से सम्पन्न हैं, अन्धकार के विनाशक हैं, सभी पापों को दूर करने वाले तथा महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।

दधिशंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम्।।

अर्थात्–जो दही, शंख तथा हिम के समान सफेद आभा वाले हैं, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं, भगवान शंकर के मुकुट के आभूषण हैं तथा अमृतस्वरूप हैं, उन चन्द्रमा को मैं नमस्कार करता हूँ।

धरणीगर्भ सम्भूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात्–जो पृथ्वीदेवी से प्रकट हुए हैं, बिजली की-सी आभा वाले हैं, कुमार अवस्था वाले हैं तथा हाथ में शक्ति लिए हुए हैं, उन मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।

प्रियंगुकलिका श्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात्–जो प्रियंगुलता की कली के समान गहरे हरे रंग वाले हैं, अतुलनीय सौन्दर्य वाले तथा सौम्य हैं, उन चन्द्रमा के पुत्र बुध को मैं प्रणाम करता हूँ।

देवानां च ऋषीणां  च गुरुं कांचनसंनिभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।

अर्थात्–जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, सोने की-सी आभा वाले हैं, ज्ञान और बुद्धि के अखण्ड भण्डार हैं तथा तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति को मैं प्रणाम करता हूँ।

हिमकुन्द मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात्–जो हिम (बर्फ), कुन्द के फूल तथा कमलनाल के तन्तु के समान सफेद आभा वाले हैं, दैत्यों के पूजनीय गुरु हैं, सभी शास्त्रों के उपदेष्टा (वक्ता) तथा महर्षि भृगु के पुत्र हैं, उन शुक्र (शुक्राचार्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।

नीलांजन समाभासं रविपुत्रंयमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

अर्थात्–जो काले काजल के समान आभा वाले हैं, सूर्य के पुत्र हैं, यमराज के बड़े भाई हैं तथा छाया व मार्तण्डसूर्य से उत्पन्न हैं, उन शनैश्चर को मैं नमस्कार करता हूँ।

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात्–जो आधे शरीर वाले हैं, महापराक्रमी हैं, सूर्य और चन्द्र को ग्रसने वाले हैं तथा सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

पलाशपुष्प संकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।

अर्थात्–पलाशपुष्प के समान जिनकी लाल आभा है, जो रुद्रस्वभाव वाले हैं, रौद्रात्मक हैं, भयंकर रूपधारी हैं, तारकादि ग्रहों में प्रधान हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।

स्तोत्रपाठ का फल

इति व्यासमुखोद्गीतं य: पठेत् सुसमाहित:।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति।।

अर्थात्–भगवान वेदव्यासजी के मुख से गायी हुई इस स्तुति का जो दिन में अथवा रात में एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, उसके समस्त विघ्न शान्त हो जाते हैं।

नरनारीनृपाणां च भवेद्दु:स्वप्ननाशनम्।
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम्।।

अर्थात्–पाठ करने वाले स्त्री-पुरुष और राजाओं के दु:स्वप्नों का नाश हो जाता है, अतुलनीय ऐश्वर्य, आरोग्य तथा पुष्टि की वृद्धि होती है।

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