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इक हाथ से गर तू लुटायेगा खजाने।
सौ हाथ से मालिक तेरे भर देगा खजाने।।

सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से दान करो

अथर्ववेद में कहा गया है—‘शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर’ अर्थात् ‘सैंकड़ों हाथों से धन अर्जित करो और हजारों हाथों से उसे बांटो।’  वेद में दान करने के लिए धन कमाना मनुष्य के लिए आवश्यक कर्म माना गया है। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि दान से देवता भी वश में हो जाते हैं। दान ईश्वर को प्रसन्नता प्रदान करता है।  

और सब लोग भगवान की खोज करते,
किंतु दानी की खोज भगवान स्वयं करते हैं।।

जीवन में किया हुआ दान अगले जन्मों में सुख एवं आनन्द देने वाला होता है। परलोक में केवल दान ही प्राणी से मित्रता निभाता है। महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि मरने के बाद साथ क्या जाता है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि मरने के बाद दान ही साथ जाता है। भविष्यपुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं—‘मृत्यु के बाद धन-वैभव व्यक्ति के साथ नहीं जाते, व्यक्ति द्वारा सुपात्र को दिया गया दान ही परलोक में पाथेय (रास्ते का भोजन) बनकर उसके साथ जाता है।’ हम जो भी देते हैं, वह वास्तव में नष्ट नहीं होता बल्कि दुगुना-चौगुना होकर हमें मिलता है।

दान दिया संग लगा,
खाया पिया अंग लगा,
और बाकी बचा जंग लगा।

‘नादत्तं कस्योपतिष्ठते’  अर्थात् बिना दिए किसी को क्या मिलेगा।

जितना बोओगे, उसका कई गुना अधिक पाओगे

महाभारत के अनुशासनपर्व में बताया गया है कि पूर्वजन्म के किन कार्यों के कारण शुभ या अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

जिस समय दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने छल से जुए में युधिष्ठिर के राज्य को छीन लिया और पांडव द्रौपदी के साथ वन को जा रहे थे, उस समय प्रजा व ब्राह्मण भी उनके साथ वन में जाने लगे। यह देखकर युधिष्ठिर को बहुत दु:ख हुआ और वे सोचने लगे कि वन में मैं इन सबका पेट कैसे भर सकूंगा। अपना पेट तो सब भर लेते हैं लेकिन उसी व्यक्ति का जीवन सफल है जो अपने कुटुम्ब, मित्र, अतिथि व ब्राह्मणों का पोषण कर सके। युधिष्ठिर ने उन ब्राह्मणों से कहा कि इस निर्जन वन में मुझे बारह वर्ष बिताने हैं अत: ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे मेरे परिवार सहित आप लोगों के भोजन का प्रबन्ध हो सके।

साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।।

तब उन ब्राह्मणों में से मैत्रेय मुनि ने द्रौपदी के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हुए युधिष्ठिर से कहा—‘लक्ष्मी रूपी द्रौपदी जहां रह रही हो वहां कोई भी चीज दुर्लभ नहीं है। द्रौपदी अपनी स्थाली (बटलोई, वह पात्र जिसमें भोजन बनाया जाता है) के अन्न से जगत को तृप्त कर सकती है।’

द्रौपदी जिसकी स्थाली कभी नहीं होती थी खाली : द्रौपदी के पूर्वजन्म की कथा

जन्म-जन्मान्तर में किया गया कोई सत्कर्म कितना पुण्यदायी हो सकता है इसी तथ्य को दर्शाती है द्रौपदी के पूर्वजन्म की यह कथा।

पूर्वकाल में एक निर्धन ब्राह्मणी तपोवन में रहती थी। वह प्रतिदिन ब्राह्मणों का पूजन करती थी। एक दिन ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने के लिए कहा। ब्राह्मणी ने कहा—‘ऐसा कोई व्रत या दान बताएं जिसके करने से मैं पतिप्रिया, सौभाग्यशाली, धनी व संसार में प्रशंसा के योग्य हो जाऊं।’ तब वशिष्ठजी ने ब्राह्मणी को स्थालीदान करने की विधि बतलाई, जिसके करने से उसका भोजन बनाने का पात्र (स्थाली) सदैव सबको भोजन प्रदान कर सकेगा।

स्थालीदान की विधि

स्थालीदान के लिए एक तांबे या मिट्टी की गहरी हांडी (बटलोई)  लेकर उसे मूंग व चावल से भर कर स्वच्छ स्थान पर रख दें। स्थाली (बटलोई) के पास सब तरह के शाक, जल से भरा पात्र और घी का पात्र रख दें। फिर गंध, पुष्प, धूप से सब सामग्री का पूजन करके प्रार्थना करें—

‘अग्नि हो, चावल हो, जल भी हो किन्तु यदि स्थाली (बटलोई) न हो तो भोजन नहीं पकाया जा सकता। स्थाली तुम सिद्धि व पुष्टि रूप हो। जब तक मेरे सुहृद, भाई-बन्धु, अतिथि, नौकर-चाकर भोजन न कर लें तबतक तुममें-से भोजन घटे नहीं—ऐसा वर मुझे प्रदान करो।’

इस प्रकार कहकर वह पात्र दक्षिणा सहित ब्राह्मण को दान दे दें। यह दान रविवार, संक्रान्ति, तृतीया, अष्टमी या चतुर्दशी को करना चाहिए।

अगले जन्मों का साथी है दान

ब्राह्मणी ने दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को स्थालीदान दिया। उसी पुण्य के प्रभाव से वही ब्राह्मणी जन्मान्तर में द्रौपदी हुई।

मैत्रेयजी ने युधिष्ठिर को बताया कि द्रौपदी अपनी स्थाली से अन्न दे तो सम्पूर्ण जगत को तृप्त कर सकती है। इसलिए आपको ब्राह्मणों को भोजन कराने की चिन्ता नहीं करना चाहिए।

स्थालीदान का फल

जो व्यक्ति तांबे की स्थाली को चावलों से भरकर विधिपूर्वक ब्राह्मण को दान देता है, उसके घर में सगे-सम्बन्धी, मित्र, नौकर-चाकर, अतिथि भी यदि रोजाना भोजन करें तो भी उसे भोजन की कमी नहीं होती है।

दान से अनेक जन्मों तक सुख प्राप्त होता है

मनुष्य का प्राण अन्न है क्योंकि अन्न के बिना कोई भी प्राणी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता है। अन्न से ही मनुष्य का तेज, बल और सुख है। अन्न का दान करने वाला प्राणदाता है इसलिए थोड़ा बहुत अन्न का दान अवश्य करना चाहिए। जितना बांटोगे, उतना धन और पुण्य बढ़ेगा। दान देने से पुण्य की फसल उगती व बढ़ती है।

तुलसी पंछिन के पिये घटे न सरिता नीर।
दान किये धन न घटे जो सहाय रघुबीर।।

शेख सादी ने भी कहा है—‘जो भाग्यवान है वह दानशीलता को अपनाता है तथा दान देने से ही मनुष्य भाग्यवान बनता है।’

यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। (गीता १८।५)

यज्ञ, दान एवं तप—इन तीन सत्कर्मों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ये विद्वान लोगों को भी पवित्र करने वाले हैं।

शोभा बढ़ती हाथ की जो करते हैं दान।
कंगन बाजूबन्द से बढ़े न कर का मान।।
मनुज योनि में सहज है ईश नाम, जप, दान
किन्तु दान में कभी मत कीजै गर्व बखान।।

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