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श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अध्याय १३८-१४८ को ‘श्रीगणेशगीता’ कहा जाता है। श्रीगणेशगीता के ११ अध्यायों में ४१४ श्लोक हैं। भगवान गजानन ने सिन्दूरासुर से युद्ध के बाद राजूर की पवित्रभूमि में श्रीगणेशगीता का उपदेश राजा वरेण्य को दिया था।

भगवान गजानन और राजा वरेण्य

पूर्वजन्म में राजा वरेण्य और उनकी पत्नी पुष्पिका की बारह वर्ष की कठोर आराधना से प्रसन्न होकर भगवान श्रीगणेश ने उन्हें वर दिया था कि—‘अगले जन्म में मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा।’ सिन्दूरासुर के अत्याचार से भयभीत होकर सभी देवताओं ने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वह भगवान शिव के घर जन्म लेकर सिन्दूरासुर का वध करें।’ श्रीगणेश राजा वरेण्य को दिया वचन भूले नहीं थे अत: वे चतुर्बाहु व रक्तवर्ण रूप में जगदम्बा पार्वती के यहां अवतरित हुए। भगवान की योगमाया शक्ति ने सब योजना पहले से ही बना रखी थी।

भगवान गजानन के प्राकट्य के समय रानी पुष्पिका भी एक बालक को जन्म देकर मूर्च्छित हो गयीं जिसे एक राक्षसी उठा ले गयी। शिवगण नन्दी ने बालक गजानन को ले जाकर मूर्च्छित रानी पुष्पिका के पास सुला दिया। जब रानी की मूर्च्छा टूटी तो वह अद्भुत (चार हाथ व रक्तवर्ण वाले) बालक को देखकर भयभीत हो गयी। भगवान की मायाशक्ति ने सब लोगों पर माया का पर्दा डाल दिया अत: कोई भी परब्रह्म गजानन को पहचान न सका। राजा वरेण्य ने उस बालक को निर्जन वन में एक सरोवर के पास छोड़ दिया। भगवान गजानन की कृपा से महर्षि पाराशर ने बालक को पहचान लिया और उसे अपने आश्रम पर ले आए और पुत्ररूप में पालन करने लगे।

नवें वर्ष में बालक गजानन ने सिन्दूरवाड़ में जाकर सिन्दूरासुर का वध किया। श्रीगणेश की कृपा से राजा वरेण्य पर से माया का पर्दा हटते ही उन्होंने बालक गजानन को पहचान लिया। राजा के मन में केवल एक ही पश्चात्ताप था कि—

‘मैं कैसा अभागा हूँ। माया से मोहित होकर मैंने कितना बड़ा अनर्थ कर डाला। स्वयं भगवान गणेशजी ने मेरे घर जन्म लिया, उस पर भी मैंने उन्हें कुरूप पुत्र मानकर उनका सरोवर पर त्याग कर दिया। यह अच्छा हुआ कि यह बालक पराशरमुनि को मिला और उन्होंने उसका पालन-पोषण किया। इसी नौ वर्ष के बालक गजानन ने सिन्दूरासुर का वध करके पृथ्वी के भार को कम कर दिया। अब मैं इन्हीं गजानन से उनके चरणों में आश्रय देने की विनती करुंगा।’

राजा वरेण्य ने गजानन से प्रार्थना की—‘हे सब शास्त्रों और विद्याओं के ज्ञाता महाबाहु विघ्नेश्वर! आप मेरा अज्ञान दूरकर मुझे मुक्ति के मार्ग का उपदेश कीजिए।’

तब भगवान गजानन ने राजा वरेण्य को योगामृत से भरी ‘श्रीगणेशगीता’ का उपदेश किया। श्रीगणेशगीता को सुनने के बाद राजा वरेण्य विरक्त हो गए और पुत्र को राज्य सौंपकर वन में चले गए। वहां योग का आश्रय लेकर वे मोक्ष को प्राप्त हुए।

यथा जलं जले क्षिप्तं जलमेव हि जायते।
तथा तद्ध्यानत: सोऽपि तन्मयत्वमुपाययौ।।

‘जिस प्रकार जल जल में मिलने पर जल ही हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मरूपी गणेश का चिन्तन करते हुए राजा वरेण्य भी उस ब्रह्मरूप में समा गये।’

भगवान गजानन ने ग्यारह अध्यायों में बताए ग्यारह योग

श्रीगणेशगीता में कर्मयोग, सांख्ययोग और भक्तियोग का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के समान ही है। श्रीगणेशगीता के ११ अध्यायों में योगसाधना, प्राणायाम, तान्त्रिकपूजा, मानसपूजा, सगुण उपासना आदि का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।

—प्रथम अध्याय को ‘सांख्यसारार्थ’ कहा गया है। इसमें श्रीगणेश ने कहा है—‘मैं ही सब कुछ हूँ और मुझमें ही सब है। मैं ही सत्, चित् और आनन्दरूप ब्रह्म हूँ। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य तथा मुझमें जो अभेद दृष्टि है, वही सबसे उत्तम योग है।’

‘कर्मयोग’ नामक दूसरे अध्याय में श्रीगजानन ने राजा वरेण्य को कर्मयोग का उपदेश दिया है—‘जो कर्म मेरे लिए किए जाते हैं वे कहीं और कभी कर्ता को बांधते नहीं हैं फल की कामना से किया गया कर्म मनुष्य को बांध लेता है।’

‘विज्ञानयोग’ नामक तीसरे अध्याय में गजानन ने अपने अवतार-धारण के सम्बन्ध में बताया है।

—चौथा अध्याय ‘वैधसंन्यासयोग’ कहलाता है जिसमें योगाभ्यास और प्राणायाम के सम्बन्ध में विशेष बातें बतलाई गयीं हैं।

—पांचवे अध्याय ‘योगवृत्तिप्रशंसनयोग’ में श्रीगणेश ने योगाभ्यास के लिए अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों के बारे में बताया है। मनुष्य को थका, भूखा व व्याकुल होने पर, अत्यधिक गर्मी-सर्दी व शोर वाली जगहों पर योगाभ्यास नहीं करना चाहिए। दोष वाली जगहों पर योग करने से लाभ की जगह हानि होती है।

—छठा अध्याय ‘बुद्धियोग’ है जिसमें कहा गया है जिसका जैसा भाव होता है उसी के अनुसार मैं उसकी इच्छापूर्ण करता हूँ। अंत समय में मुझे भजने वाला मुझे ही प्राप्त होता है।

‘उपासनायोग’ नामके सातवें अध्याय में ‘सगुण भक्ति’ को उपासना कहा गया है। ‘जो मनुष्य ध्यान, पंचामृत, स्नान, वस्त्र, अलंकार, सुगन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल और दक्षिणा से मेरी अर्चना करता है, मैं उसकी मनोकामना पूरी करता हूँ।’ तान्त्रिक, मानसी व पत्र-पुष्पादि—ये पूजा के तीन प्रकार बताये गये हैं किन्तु निष्काम भाव से की गयी पूजा को ही सर्वश्रेष्ठ कहा गया है और पूजा में सभी का अधिकार है।

—श्रीगणेशगीता का आठवां अध्याय ‘विश्वरूपदर्शनयोग’ कहलाता है जिसमें श्रीगणेश ने भक्त वरेण्य को विश्वरूप का दर्शन कराया है। जैसे समुद्र से उत्पन्न सारा जल समुद्र में ही लीन हो जाता है, वैसे ही अनेक विश्व भगवान गणेश के विशाल रूप में समाते जा रहे थे जिसे देखकर राजा वरेण्य ने भयभीत होकर श्रीगणेश से सौम्य रूप दिखलाने की प्रार्थना की। तब भगवान श्रीगणेश ने सौम्यरूप धारण कर कहा मुझे ‘सगुण उपासना’ ही अधिक प्रिय है।

—श्रीगणेशगीता का नवां अध्याय ‘क्षेत्रज्ञातृज्ञानज्ञेयविवेकयोग’ कहलाता है। इसमें श्रीगणेश ने सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों के लक्षण बतलाए हैं और कहा है—‘लोग जिस-जिस रूप में मेरी उपासना करते हैं, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं उन्हें उसी-उसी रूप में दर्शन देता हूँ।’

‘उपदेशयोग’ नामक दसवें अध्याय में दैवी, आसुरी और राक्षसी—इन प्रकृतियों के लक्षण बताए गए हैं। पूर्व के पापों के कारण ही पापी जीव संसार में कुबड़े, अंधे, विकलांग व दीन-हीन होते हैं।

—ग्यारहवां अध्याय ‘त्रिविधवस्तु विवेकनिरूपणयोग’ कहलाता है। इसमें तप के—कायिक, वाचिक और मानसिक—ये तीन प्रकार बताये गये हैं। पवित्रता, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, देव और ब्राह्मणों का पूजन आदि शारीरिक तप हैं। सत्य और प्रिय बोलना वाणी का तप है। शान्ति, दया, क्षमा व कपटहीनता आदि मानसिक तप हैं।

भगवान श्रीकृष्ण प्रदत्त ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ और ‘गणेशगीता’ के उपदेशों में काफी समानता है परन्तु ‘श्रीगणेशगीता’ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ से थोड़ी संक्षिप्त है।

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