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’जगत को किसने जीता? जिसने मन को जीता। मन को जीत कर ही संसार पर विजय प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि मन ही बन्धन और मोक्ष का हेतु हैं।’ (शंकराचार्यजी)

सभी रोगों का कारण अशुद्ध मन

‘मन को ही सारे अनर्थों की जड़’ मानते हुए कहा गया है–जिस मनुष्य का मन बिगड़ता है, उसका स्वभाव भी बिगड़ जाता है। आयुर्वेद ने रोगों का मूल कारण कीटाणु को नहीं अपितु मनोविकारों के कारण रोग के कीटाणुओं का उत्पन्न होना माना है। अन्तर्मन में व्याप्त भय, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, राग-द्वेष के भीतर ही समस्त रोगों का बीज या अंकुर छिपा रहता है। राग, द्वेष, मोह मनुष्य के बनाये हैं, ये ही प्राणी को दु:ख देते हैं, बांधते हैं। जैसे रेशम का कीड़ा रेशम बनाकर उसमें बंध जाता है, उसमें ही फंसकर मर जाता है; इसी तरह मनुष्य ने अपना राग, द्वेष का जाल बुन लिया है और उन्हीं से बंधा मनुष्य बार-बार इस संसार में जन्म लेता है।

‘मैं’ ‘मेरे’ की जेवरी, गल बंध्यो संसार।
दास कबीरा क्यों बंधे, जाके राम अधार।।

मानस रोग का अर्थ

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, व्यग्रता, आसक्ति, ममता, चिन्ता, असहिष्णुता, अधीरता असंयम और दर्प मन की व्याधियां (मानसिक रोग) हैं। जिन्हें ये रोग लगते हैं उनकी दशा खिन्न-सी हो जाती है और ये मनुष्य को अधोगति (दुर्दशा) की ओर ले जाते हैं। यद्यपि मानसिक रोगों की लम्बी सूची गोस्वामी तुलसीदासजी ने बतायी है परन्तु उनमें तीन ही प्रधान हैं–

काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।।
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।
उपजइ सन्यपात दुखदाई।। (राचमा ७।१२१। २८-३१)

गोस्वामीजी ने काम को वातरोग, लोभ को कफ के रोग और क्रोध को पित्तजनित रोग कहा है। शरीर की संरचना में वात, कफ और पित्त का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जब ये सम अवस्था में रहते हैं तो शरीर स्वस्थ रहता है, लेकिन इनके विषम होते ही शरीर रोगों का घर बन जाता है, तीनों कुपित हो जाएं तो सन्निपात हो जाता है। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में श्रीकाकभुशुण्डिजी गरुड़जी से कहते हैं–मोह से ही सभी रोग उत्पन्न होते हैं–

मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
गीता में भगवान ने इन्हें रजोगुण से उत्पन्न होने वाला कहा है।

अन्तर्मन के विभिन्न विकार

काम  काम की जगत में बड़ी महिमा है। शास्त्रों के अनुसार इसका पालन करने से लोक-परलोक दोनों ही बनते हैं। इसके बिना सृष्टिकार्य चल ही नहीं सकता परन्तु अमर्यादित रूप से कामोपभोग करने से मनुष्य दु:ख का ही भागी होता है। काम का दूसरा अर्थ है कामना। मनुष्य की कामनाओं का कोई अंत नहीं है। इसकी शान्ति का एकमात्र उपाय है संतोष।

लोभ — जैसे ही मानसिक रोग में लोभ का पार नहीं है। लोभी व्यक्ति उसी प्रकार शोभाहीन हो जाता है जैसे श्वेत कुष्ठ हो जाने से शरीर की सुन्दरता नष्ट हो जाती है।

क्रोध — मानस रोगों में क्रोध को पित्त कहा गया है। क्रोधरूपी पित्त सदा छाती को जलाता रहता है। क्रोध से मनुष्य का ओज नष्ट हो जाता है। क्रोधी की शक्ल बिगड़ने के साथ ही उसकी बुद्धि, बल भी क्षीण होने लगता है। क्रोध को शान्ति से ही जीता जा सकता है।

ममता — मानस रोगों में ममता को दाद कहा गया है। दाद में खुजलाने में पहले खुशी और बाद में दर्द होता है। उसी तरह ममता में किसी वस्तु की प्राप्ति में पहले सुख परन्तु प्राप्त न होने पर (वियोग होने पर) मन में बहुत दु:ख होता है।

ईर्ष्या — ईर्ष्या में व्यक्ति चाहता है कि उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी कार्य का कभी कोई श्रेय न मिले। ईर्ष्या करने वाले ईर्ष्या को छोड़ भी दें पर ईर्ष्या उन्हें कभी नहीं छोड़ती। ईर्ष्या करने वाले मनुष्य में पित्त बढ़ जाता है; इससे उसकी बुद्धि व हृदय पित्त के तेजाब से जल जाते हैं और उसका तेज व विवेक नष्ट हो जाता है। ईर्ष्या बढ़ने से मनुष्य के पेट में दर्द शुरु हो जाता है। ईर्ष्या से मनुष्य पित्त, पथरी, जलन व लीवर की खराबी आदि रोगों से ग्रस्त हो जाता है।

द्वेष — द्वेष का अर्थ है कि दूसरों की निन्दा करके झूठा आत्मसंतोष प्राप्त करना। मनुष्य के अंदर द्वेष हीनभावना और अपनी स्थिति से असंतोष से पैदा होता है। द्वेष से परनिन्दा और परनिन्दा से घृणा जन्म लेती है।

मत्सर — दूसरों की सम्पत्ति व सम्मान को देखकर मन में जो जलन होती है और अपने को धिक्कार करना और हीनभावना से ग्रस्त होने को ही मत्सर कहते हैं। पराये सुख को देखकर जलना क्षय रोग है। जैसे क्षय रोग शीघ्रता से जाता नहीं वैसे ही दुष्ट लोग दूसरों के सुख को देखकर सदा जलते रहते हैं।

मन की कुटिलता — मन की कुटिलता कुष्ठरोग के समान है। जैसे कुष्ठी को कोई अपने पास बैठने नहीं देता वैसे ही कुटिल व्यक्ति (छली, चालबाज) भी समाज में निन्दित हो जाता है। भगवान ने भी कहा है–‘मोहि कपट छल छिद्र न भावा।’

अहंकार — अहंकार अत्यन्त दु:ख देने वाला डमरुआ (गलगण्ड, घेंघा) रोग के समान है। जिस प्रकार घेंघारोग हो जाने पर व्यक्ति गला ऊंचा करके चलता है; उसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति अपने झूठे अहं में सिर ऊंचा करके अकड़ कर चलता है।

तृष्णा — भोगों को प्राप्त करने की कामना को तृष्णा कहते हैं, जो कभी मिटती नहीं वरन् दिनोंदिन बढ़ती जाती है। तृष्णा की तुलना जलोदर रोग से की जाती है। इस रोग में मनुष्य का पेट फूलकर ढोलक के समान हो जाता है, जिससे उसे बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। उसी तरह तृष्णा बढ़ने से मनुष्य का पेट भोगों से कभी नहीं भरता और वह सदैव अशांत रहता है।

पुत्र, धन और जगत में मान — इन्हें ‘त्रिविध एषणा’ (तीन प्रकार की तृष्णा) कहा जाता है। त्रिविध एषणा से ग्रस्त मनुष्य अपना विवेक खोकर जड़बुद्धि होकर इन्हें ही प्राप्त करने में लगा रहता है।

दम्भ, अभिमान — दम्भ या अभिमान में मनुष्य अपने को बड़ा व दूसरों को तुच्छ समझता है। अभिमान मनुष्य के दुर्गुणों का राजा है। यह सभी दोषों व रोगों को आकर्षित करने वाला चुम्बक है। अभिमान व्यक्ति के वायु, पित्त और कफ को कुपित करके भारीपन, गैस और अन्य कफ के रोग व संनिपात उत्पन्न कर देने वाला होता है।

अविवेक — मानस रोग में अविवेक की तुलना ज्वर से की गयी है। जिस प्रकार ज्वर मनुष्य के मन, इन्द्रिय व शरीर को ताप पहुंचाता है उसी प्रकार अविवेक से किए गए कार्य मनुष्य को अंत में दु:खरूपी ताप प्रदान करते हैं।

असंयम — खाने-पीने में असंयमी व्यक्ति पेट का रोगी बन जाता है। इसी तरह जिस व्यक्ति का वाणी पर संयम नहीं होता, वह किसी से भी गाली-गलौज करें, निन्दा, अपमान करे तो वह अपने जीभ से सम्बन्धित मस्तिष्क के ज्ञान कोषों (cells) को हानि पहुंचता है और मुंह या जीभ के कैंसर या लकवा जैसी बीमारियों का शिकार हो जाता है या पुनर्जन्म में गूंगा होता है।

मनोविकारों से होने वाले विभिन्न रोग

हृदय की दूषित भावनाएं हमारे मन और शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव डालती हैं–

गठिया एक भयंकर रोग है। डॉक्टर्स का मानना है कि मन की अशान्ति और चिन्ता से यह रोग उग्र रूप धारण कर लेता है।

हृदय-रोग क्रोध, चिड़चिड़ापन, आवेश और असंतुलित भावना का परिणाम है। इन विकारों से हृदय धड़कने लगता है और बाद में वही धड़कनें भयानक रोग में बदल जाती हैं। प्रेम और संतुलित जीवन से दूर चले जाना ही इस रोग का कारण है। अत: इसकी अमोघ दवा है–निष्काम भगवत्प्रेम। सभी से प्रेम करने से कठोर-से-कठोर हृदय भी कोमल (रोगमुक्त) बन जाता है।

डाइबिटीज (मधुमेह) रोग का प्रधान कारण मानसिक थकावट और चिन्ता है। अत्यधिक दु:ख और चिन्ता में शरीर खून में अधिक मात्रा में शक्कर रक्तनलिकाओं में प्रवाहित करता रहता है। इस रोग को दूर करने की एकमात्र दवा है–सबसे प्रेम और मन का सदा निश्चिन्त और प्रसन्न रहना।

‘उच्च रक्तचाप’ रोग मानसिक संताप, हृदय की वेदना, चिन्ता और भय के कारण होता है। इस रोग की दवा यही है कि मनुष्य अपनी सारी चिन्ताएं परमात्मा को सौंप दे और बात-बात में क्रोध और चिढ़ने का स्वभाव न बनाए।

‘मैं कभी क्रोध नहीं करुंगा, मैं कभी नहीं चिढूंगा और मैं कभी नहीं डरुंगा’–इस तरह के भाव मन में रखने से मन प्रसन्न होकर शरीर स्वस्थ हो जाता है व रक्तचाप ठीक हो जाता है। क्योंकि–

‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’

रोग हमारे पास आयें ही क्यों?

ईश्वर समस्त सद्गुणों–अनन्त साहस, शक्ति, सौन्दर्य, स्वास्थ्य व सम्पत्ति के निधान हैं। हम ईश्वर की संतान हैं, अत: ईश्वर की सम्पूर्ण वस्तु पर हमारा अधिकार है। हमारे जीवन में भी वही साहस, वही शक्ति, वही सौन्दर्य, वही स्वास्थ्य और वही सम्पत्ति होनी चाहिए जो ईश्वर के पास है। यदि हमारे जीवन में ये सब नहीं है तो हमें ईश्वर से सम्पर्क स्थापित करना यानी प्रार्थना करनी चाहिए–

‘मैं ईश्वर की प्रिय संतान हूँ। अपनी प्रिय संतान को ईश्वर तन और मन का पूर्ण स्वास्थ्य अवश्य प्रदान करेंगे। मेरे पिता परमेश्वर का वरदहस्त मेरे सिर पर है। मेरा शरीर और मन अवश्य स्वस्थ होंगे।’

मानस रोगों की सर्वश्रेष्ठ औषधि है–भगवन्नाम स्मरण

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा।। (राचमा ७।१२२।५)

जिस प्रकार हविष्यान्न की आहुति पाकर कड़ुवा धुआं भी मीठा और सुगन्धित हो जाता है, समुद्र का खारा जल सूर्य की किरणों के सम्पर्क से मीठे जल में बदल जाता है; वैसे ही सदाचार और ईश्वर की प्रार्थना के फलस्वरूप मन के हताश-निराश-उदास विकार दूर होकर नयी तरंग, नयी उमंग में बदल जाते हैं।

हमारा मन जितना-जितना परमात्मा की ओर झुकता जाएगा, उतनी-उतनी मन में शान्ति आती जाएगी। जहां शान्ति आयी, मन प्रसन्न हो जाएगा। प्रसन्नता आने पर मन का उद्वेग मिट जाता है। उद्वेग मिटना ही दु:खों की समाप्ति है। (गीता २।६५)

भगवान वेदव्यासजी एक विलक्षण उपाय बतलाते हुए कहते हैं कि यदि मानव संसार के सभी प्राणियों में भगवद्बुद्धि रखते हुए सभी के उपकार का व्रत ले ले तो वह सदा के लिए रोगों से मुक्त हो जाएगा।

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