नंद घर आनन्द भयौ जय कन्हैयालाल की

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भादौं की थी असित अष्टमी, निशा अंधेरी।
रस की बूंदे बरस रहीं फिर घटा घनेरी।।
मधु निद्रा में मत्त प्रचुर प्रहरी थे सोये।
दो बंदी थे जगे हुए चिन्ता में खोए।।
सहसा चन्द्रोदय हुआ ध्वंस हेतु तम वंश के।
प्राची के नभ में तथा कारागृह में कंस के।। (भाई हनुमानप्रसादजी पोद्दार)

अजन्मा का जन्म

भाद्रपद की अंधियारी अष्टमी की अर्धरात्रि को कंस के कारागार में वसुदेव-देवकी के यहां अद्भुत चतुर्भुज नारायणरूप में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ।

पिता हुए आश्चर्यचकित, थी विस्मित माता।
अद्भुत शिशु वह मन्द-मन्द हंसता, मुसकाता।।

देवकीजी इनके चतुर्भुजरूप की तीव्र प्रभा को सह न सकीं और बोलीं–’भगवन्! अपने इस शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी अलौकिक रूप को छिपा लो।’ भगवान ने वसुदेव-देवकी को उनके पूर्व-जन्मों की याद दिलाकर कहा कि ‘मैं परब्रह्म परमात्मा ही तुम्हारा पुत्र बना हूँ’ और फिर एक लौकिक शिशु का-सा रूप धारण कर लिया।

वसुदेवजी भगवान की आज्ञा के अनुसार शिशुरूप श्रीकृष्ण को नन्दालय में यशोदाजी के पास सुलाकर बदले में यशोदाजी की कन्या जगदम्बा महामाया को कारागार में ले आए। भगवान की माया से नन्दालय में और कारागार में किसी को भी इस बात का पता नहीं चला।

जन्माष्टमी पर ‘नंद घर आनन्द भयौ जय कन्हैयालाल की’ क्यों कहा जाता है?

परमात्मा श्रीकृष्ण परमानंदस्वरूप हैं। श्रीकृष्ण में आनन्द के सिवा कुछ नहीं है, उनके श्रीअंग में और उनके नाम में आनन्द-ही-आनंद है। ‘नंद’ शब्द का अर्थ है–जो मधुर वाणी, विनय, सरल स्वभाव, उदारता आदि सद्गुणों से सभी को आनन्द देते हैं, उन्हें नंद कहते हैं। जो सबको आनन्द देता है उसे सबका आशीर्वाद मिलता है। श्रीकृष्ण जन्म पर नंदबाबा भी अति आनंद में भरे हैं–

फूले अति बेठेहें ब्रजराज।
ठाडे कहत सकल ब्रजवासी जन्म सुफल भयो आज।।
देख देख मुख कमलनेन को आनंद उर न समाय।
फिर फिर देत बुलाय बधाई मगन भये नंदराय।।
डोलत फिरत नंद गृह आनंद अति आनंद भरे।
श्रीविट्ठल गिरिधर के देखत मन में हरख करे।।

श्रीकृष्ण जन्म पर व्रज में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द

आनन्दकंद श्रीकृष्ण नंदबाबा के घर प्रकट हुए हैं, पुत्र तो वे नंदरायजी के हैं पर आनन्द पूरे व्रज में छाया है। गांव की गोपियों में जब कन्हैया के जन्म की बात फैली तो वे सब उनके दर्शन के लिए दौड़ पड़ीं मानो नवधा भक्ति दौड़ती हुयी ईश्वर मिलन के लिए जा रही हो। गोपियों का एक-एक अंग कृष्णमिलन और कृष्णस्पर्श के लिए आन्दोलित हो रहा था। उनकी आँखें कह रही थीं कि हमारे जैसा कोई भाग्यवान नहीं; हमें ही कृष्ण दर्शन का आनन्द मिलेगा। हाथों ने कहा–हम भाग्यशाली हैं, हम ही प्रभु को भेंट देंगे। गोपियों के कानों ने कहा–हमने सबसे पहिले श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समाचार सुना है, अत: हम ही सबसे ज्यादा भाग्यशाली हैं। पाँव कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होंने कहा–हम भाग्यशाली हैं जो आज प्रभु दर्शन के लिए दौड़ रहे हैं; अब जन्म-मृत्यु के दु:ख से छुटकारा मिलेगा।

श्रीकृष्ण जन्म के समाचार से गोपों का आनंद-उन्माद भी बढ़ता जा रहा था। उन्होंने नंदबाबा को अपने बीच में ले लिया और इतना दूध, दही, घी, मक्खन ढरकाया कि चारों ओर श्वेत नदी-सी बह चली और उसमें लोटते हुए गोपों का शरीर उज्जवल दीखने लगा। गोप-गोपियां बूढ़ा या जवान जो भी मिलता, उसको चारों ओर से घेर लेते और कहते–पहले नाचो, तब तुम्हें छोड़ेंगे। अन्दर अन्त:पुर में भी हल्दी व तेल की कीच मची थी। गोपियां एक-दूसरे पर हल्दी-तेल छिड़क रही थीं।

प्रथम दर्शन से ही प्रभु ने सभी का मन अपनी ओर खींच लिया। एक गोपी ने यशोदाजी से कहा–मां ! आज जो मैं माँगूं वह आप दें। यशोदाजी ने कहा–मांग लो, तुम जो मांगोगी, वह मैं दूंगी। गोपी ने कहा–मां, दो मिनट के लिए लाला को मेरी गोद में दीजिए। यशोदाजी ने गोपी की गोद में लाला को दे दिया। हजारों वर्षों से जीव ईश्वर से बिछड़ गया था, वह आज मिला है। जीव और परमात्मा का मिलन हुआ है। गोपी ने अति आनंद में अपनी देह का होश गंवा दिया है। वह कहती है–आज तक नंद-यशोदा हमें आनंद देते थे, आज परमानंद उनके घर आया है। आज गोपी के हाथ में लक्ष्मीपति आए हैं। अति आनंद में गोपी नाचती-गाती है–
नंद घर आनंद भयौ, जय कन्हैयालाल की।
हाथी, घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की।।
जहाँ मधुर रागात्मिका प्रीति है, वहीं असीमित आनन्द-समूह उमड़ता है। नन्दालय में वही समुद्र उमड़ा।

इसलिए समस्त व्रजवासी हर्षित होकर उद्घोष कर रहे हैं–‘नंद घर आनन्द भयौ जय कन्हैयालाल की’

जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण-उपासना से संवर जाता है पूरा जीवन

कंस वध के बाद मथुरा निवासियों को जन्माष्टमी का रहस्य बतलाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–

‘पुरवासियों! आप लोग मेरे जन्मदिन को विश्व में जन्माष्टमी के नाम से प्रसारित करें। प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को जन्माष्टमी का व्रत अवश्य करना चाहिए। जिस समय सिंह राशि पर सूर्य और वृषराशि पर चन्द्रमा था, उस समय भाद्रपदमास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को अर्धरात्रि में मेरा जन्म हुआ। वसुदेवजी द्वारा माता देवकी के गर्भ से मैंने जन्म लिया। यह दिन संसार में जन्माष्टमी के नाम से प्रसिद्ध होगा।’

‘जयन्ती’ और ‘केवला’ जन्माष्टमी

श्रीकृष्णजन्माष्टमी यदि रोहिणी नक्षत्र और सोम या बुधवार से संयुक्त हो तो वह ‘जयन्ती’ कहलाती है। ऐसा योग अनेक वर्षों के बाद सुलभ होता है। बड़े ही पुण्यों से मनुष्य को जयन्ती उपवास का योग प्राप्त होता है। यदि जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्रयोग से रहित हो तो वह ‘केवला’ कहलाती है।

इस दिन व्रत करके रात्रि में बालकृष्ण की प्रतिमा को निम्न मन्त्र बोलकर स्नान कराएं–

‘योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपतये गोविन्दाय नमो नम:’

बालकृष्ण की प्रतिमा को निम्न मन्त्र बोलकर चंदन, धूप, दीप अर्पण करें–

‘यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नम:’

इस मन्त्र से नैवेद्य निवेदित करें

‘विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नम:’

दीप अर्पण करने का मन्त्र है–

‘धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:’

कुछ लोग चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करते हैं। रात्रि में भगवान के स्तोत्र (गोपालसहस्त्रनाम आदि) का पाठ करना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महिमा बताते हुए कहा है कि–इस व्रत को करने से संसार में शान्ति होगी, मनुष्यों को सुख प्राप्त होगा और प्राणी रोगरहित हो जाएंगे। इस एक ही व्रत को कर लेने जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य पुत्र, संतान, आरोग्य, धन-धान्य, घर, दीर्घ आयु और सभी मनोरथों को प्राप्त करता है। इस व्रत को करने से घर में अकालमृत्यु, गर्भपात, वैधव्य और कलह नहीं होता है। मनुष्य इस संसार के सभी सुखों को भोगकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

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