मूलप्रकृति श्रीराधा का सम्पूर्ण परिचय

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कृष्णेन आराध्यत इति राधा।
कृष्णं समाराधयति सदेति राधिका।। (राधिकोपनिषद्)

‘श्रीकृष्ण इनकी नित्य आराधना करते हैं, इसलिए इनका नाम राधा है और श्रीकृष्ण की ये सदा आराधना करती हैं, इसलिए राधिका नाम से प्रसिद्ध हैं।’

मूलप्रकृति ईश्वरी श्रीराधा

श्रीराधा सर्वेश्वरी मूलप्रकृति हैं। ‘रा’ शब्द का अर्थ है–जिनके एक-एक लोमकूप में सम्पूर्ण विश्व भरे हैं वे महाविष्णु, विश्व के प्राणी और सम्पूर्ण विश्व; एवं ‘धा’ शब्द का अर्थ है धात्री। अत: श्रीराधा ही महाविष्णु, विश्व के समस्त प्राणी व सम्पूर्ण विश्व की माता मूलप्रकृति हैं।

श्रीराधा : एक परिचय

श्रीराधा के उपासकों के मन में अपने इष्ट के बारे में जानने की जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि उनके मातृकुल और पितृकुल में कौन-कौन थे? वे अपने श्रीअंगों में कौन-कौन-से आभूषण धारण करती थीं, कौन-से स्थान उन्हें अत्यन्त प्रिय थे, उनके प्रिय पशु-पक्षियों के क्या नाम थे, आदि।

गौड़ीय सम्प्रदाय के जीवन-सर्वस्व श्रीजीवगोस्वामीजी के ग्रन्थ ‘श्रीराधाकृष्णगणोद्देश दीपिका’ में श्रीराधा का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। व्रज के रसिक संत श्रीराधाबाबा ने भी अपनी पुस्तक ‘महाभागा व्रजदेवियां’ में श्रीराधा के बारे में विस्तृत वर्णन किया है। इन्हीं स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यहां श्रीराधा से सम्बन्धित कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है–

श्रीराधा के परिवार का परिचय

पितामह (दादा)–महीभानु
पितामही (दादी)–सुखदा
पिता–वृषभानु
माता–कीर्तिदा
भाई–श्रीदाम
छोटी बहिन–अनंगमंजरी
चाचा–भानु, रत्नभानु एवं सुभानु
बुआ–भानुमुद्रा
नाना–इन्दु
नानी–मुखरा
मामा–भद्रकीर्ति, महाकीर्ति, चन्द्रकीर्ति
मौसी–कीर्तिमती
कुल-उपास्य देव–श्रीराधारानी के कुलदेवता भगवान सूर्यदेव हैं।

श्रीराधा के प्रिय आभूषणों के नाम

तिलक–स्मरयन्त्र
हार–हरिमनोहर
नाक की बुलाक–प्रभाकरी
कड़े की जोड़ी (कड़ूला)–चटकाराव
बाजूबंद–मणिकर्बुर
अंगूठी–विपक्षमर्दिनी इस पर ‘श्रीराधा’ नाम गुदा है।
रत्नताटंक जोड़ी–रोचन
करधनी (कमरपेटी)–कांचनचित्रांगी
नूपुर–रत्नगोपुर (इनकी मधुर झंकार ही श्रीकृष्ण का मन मोह लेती थी)
मणि–सौभाग्यमणि (यह मणि सूर्य और चन्द्र दोनों के समान कान्तियुक्त थी। इसका नाम स्यमन्तकमणि भी है)
वस्त्र–श्रीराधा को दो वस्त्र अत्यन्त प्रिय थे। १. मेघाम्बर–मेघ की कान्ति के समान यह वस्त्र श्रीराधा को अत्यन्त प्रिय है। २. कुरुविन्दनिभ–श्रीराधा का लाल रंग का यह वस्त्र श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।
दर्पण–मणिबान्धव
कंघी–स्वस्तिदा
सुवर्णशलाका (काजल लगाने के लिए सोने की सलाई)–नर्मदा
श्रीराधा को प्रिय सोनजूही का पेड़–तडिद्वल्ली
राग–श्रीराधा के प्रिय राग मल्हार व धनाश्री हैं।
वीणा–श्रीराधा की रुद्रवीणा का नाम मधुमती है।
नृत्य–श्रीराधा के प्रिय नृत्य का नाम छालिक्य है।
कुण्ड–श्रीराधाकुण्ड

श्रीराधा की प्रिय गायों के नाम

सुनन्दा, यमुना, बहुला आदि श्रीराधा की प्रिय गाय हैं।
प्रिय हिरनी–रंगिणी
प्रिय चकोरी–चारुचंद्रिका
प्रिय हंसिनी–तुण्डीकेरी
प्रिय मैना–शुभा और सूक्ष्मधी
प्रिय मयूरी–तुण्डिका

श्रीकृष्णह्लादिनी श्रीराधा व्रज की अधीश्वरी देवी हैं–’व्रजेश्वरी व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते।’(राधाकृपाकटाक्षस्तोत्र)

व्रज में सभी जगह ‘जय श्रीकृष्ण’ की गूंज सुनाई पड़ती है परन्तु व्रज में चार स्थान ऐसे भी हैं, जहां सभी लोग ‘जय श्रीराधे’ कहते हैं। ये चार स्थान हैं–

१. रावलग्राम जहां श्रीराधा का जन्म हुआ (जन्मभूमि)
२. बरसाना, माता-पिता की भूमि (क्रीडाभूमि)

बरसानो जानो नहीं जानो न राधा नाम।
तो तूने जानो कहाँ ब्रज को तत्व महान।।

३. राधाकुण्ड (लीलाभूमि) वनभ्रमणभूमि
४. श्रीधाम वृन्दावन जो श्रीकृष्ण का श्रीधाम हैं–

वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वर:।
जीवने निधने नित्यं राधाकृष्णौ गतिर्मम।।

श्रीराधा का ‘श्रीकिशोरीजी’ नाम क्यों?

व्रज की अधीश्वरी श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा का व्रज में ‘श्रीकिशोरीजी’ नाम बहुत प्रसिद्ध है। श्रीराधा सभी समय किशोरावस्था में ही रहती हैं, उनके जैसा मधुर स्वरूप और किसी का नहीं है। प्रेम सदैव किशोर ही रहता है। श्रीराधा प्रेम की प्रतिमा हैं अत: किशोरी हैं, नित्यकिशोरी हैं।

स्यामा गोरी नित्य किशोरी प्रीतम जोरी श्रीराधे।
जय राधे जय राधे राधे जय राधे जय श्रीराधे।। (श्रीनिम्बार्काचार्यजी)

श्रीराधाका स्वभाव बहुत कोमल है। वे कोमलातिकोमल हृदय हैं। वह कोमल हृदय वाले व्यक्ति के कोमल भावों से सदैव प्रसन्न रहती हैं। उन्हें कठोर मन व भाव वाला मनुष्य पसन्द नहीं है। श्रीराधा सुन्दरता की सीमा है। श्रीराधा के तत्त्व और रहस्य को समझना हर किसी के लिए संभव नहीं है। भगवान से अपने लिए कभी भी कुछ न चाहने की इच्छा रखकर भगवान से प्रेम करने का क्या अभिप्राय है–इसी भक्ति की अभिव्यक्ति का नाम श्रीराधा है।

ये प्रेम की अकथ कहानी नाहिं समझैं ज्ञानी-ध्यानी।
जाहे जानें बिरज की नारि जपे जा राधे राधे।।
जो राधा नाम न होतो रसराज बिचारो रोतो।
नहीं होतो कृष्ण अवतार जपे जा राधे राधे।।
जो राधा राधा गावें वो प्रेम पदारथ पावें।
बाकौ ह्वै जाए बेड़ा पार जपे जा राधे राधे।।

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