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shri radha charan kamal

श्रीराधा के चरणकमल हैं समस्त सुखों की खान

मधुराभक्ति की सजीव प्रतिमा श्रीराधा के चरणकमल की सेवा ही वैष्णवों का जीवन है। श्रीराधा और उनके चरणकमलों की महिमा का ज्ञान इसी से होता है कि जिन श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य और माधुर्य पर समस्त जगत मोहित है, वे भुवनमोहन श्रीकृष्ण स्वयं अपने हाथों से तूलिका से उन पर महावर लगाते हैं। श्रीकृष्ण श्रीराधा की आराधना करते हुए किस प्रकार उनके अधीन रहकर सुख का अनुभव करते हैं इसका श्रीव्यासजी ने अपने पद में बहुत सुन्दर वर्णन किया है–

चांपत चरन मोहनलाल।
पलंग पौढ़ी कुंवरि राधा नागरी नव बाल।।

समस्त सुखों की खान, कमल से भी कोमल श्रीराधा के चरणों की रज की चाह ब्रह्मा, शिव, सनकादिक, नारद, व्यास आदि भी करते हैं। श्रीराधा के चरणकमलों में ऐसा क्या है जो उनका ध्यान करने पर मनुष्य को प्राकृत और अप्राकृत वैभव देने के साथ ही श्रीकृष्ण की प्राप्ति करा देते हैं, इसी का वर्णन इस ब्लॉग में किया गया है।

श्रीराधा के चरणकमलों के चिह्न

श्रीराधा ने अपने चरणकमलों में सुख देने वाले 19 चिन्हों को धारण किया है। इन चिह्नों के ध्यान से मन और हृदय पवित्र होते हैं तथा सांसारिक क्लेश, पीड़ा और भय का नाश होता है। श्रीराधा के चरणकमलों के 19 पवित्र चिह्नों का भक्तकवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने बहुत ही सुन्दर भाव बतलाया है–

श्रीराधा के वाम-चरण के चिह्न और उनका भाव

श्रीराधा के बांये पैर में कुल 11 चिह्न हैं–बांये पैर के अंगूठे के मूल में जौ, उसके नीचे चक्र, चक्र के नीचे छत्र, छत्र के नीचे कंकण, अंगूठे के बगल में ऊर्ध्वरेखा, मध्यमा के नीचे कमल का फूल, कमल के फूल के नीचे फहराती हुई ध्वजा, कनिष्ठिका के नीचे अंकुश, एड़ी में ऊंगलियों की ओर मुंह वाला अर्धचन्द्र,  चन्द्रमा के दायीं ओर पुष्प और बायीं ओर लता के चिह्न हैं।

छत्र

जदुपति ब्रजपति गोपपति त्रिभुवनपति भगवान।
तिनहूँ की यह स्वामिनी छत्र चिन्ह यह जान।।
सब गोपिन की स्वामिनी प्रगट करन यह अत्र।
गोप-छत्रपति-कामिनी धरयो कमल-पद छत्र।।

श्रीराधा के बांये चरण में छत्र का चिह्न यह दर्शाता है कि यदुपति, व्रजपति, गोपपति एवं त्रिभुवनपति श्रीकृष्ण की स्वामिनी श्रीराधा हैं। वे समस्त गोपीयूथ की भी स्वामिनी हैं। इस चिह्न का ध्यान करने से मनुष्य को राज्यसुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति व त्रिविध तापों से रक्षा होती है।

चक्र

एक चक्र ब्रजभूमि में श्रीराधा को राज।
चक्र चिन्ह प्रगटित करत यह गुन चरन विराज।।

व्रजभूमि में एकछत्र  व्रजेश्वरी श्रीराधा का ही राज्य है। तेज-तत्त्व का प्रतीक चक्र-चिह्न ध्यान करने पर भक्तों के मन के कामरूपी निशाचर को मारकर अज्ञान का नाश कर देता है।

ध्वज

परम विजय सब तियन सों श्रीराधा पद जान।
यह दरसावन हेतु पद ध्वज को चिन्ह महान।।

कलियुग की कुटिल गति देखकर मनुष्य शीघ्र ही भयभीत हो जाता है। अत: उसे निर्भयता और सभी कार्यों में विजय दिलाने के लिए श्रीराधा ने अपने चरण में ध्वज-चिह्न धारण किया है।

लता-चिह्न

लता चिन्ह पद आपु के वृक्ष चिन्ह पद स्याम।
मनहुं रेख प्रगटित करत यह सम्बन्ध ललाम।।

श्रीराधा के वाम-चरण में लता चिह्न है और श्रीकृष्ण के चरण में वृक्ष चिह्न है। जिस प्रकार लता वृक्ष का आश्रय लेकर सदैव ऊपर चढ़ती चली जाती है उसी प्रकार श्रीराधा सदैव श्रीकृष्णाश्रय में रहती हैं। लता चिह्न का ध्यान करने से साधक की सदैव उन्नति होती है और भगवान श्रीराधाकृष्ण में प्रीति बढ़ती है।

पुष्प

पाय पलोटत मान में चरन न होय कठोर।
कुसुम चिन्ह श्रीराधिका धारत यह मति मोर।।

मानिनी (रूठी) श्रीराधिका को मनाते समय भगवान श्रीकृष्ण उनके पांव पलोटते है। श्रीराधा के चरण श्रीकृष्ण को कठोर न प्रतीत हों इसलिए श्रीराधाजी अपने चरणों में पुष्पचिह्न धारण करती हैं। इसका ध्यान करने से मनुष्य श्रीराधाजी की भक्ति प्राप्त करता है, उसका यश बढ़ता है और मन प्रसन्न रहता है।

कंकण

पिय विहार में मुखर लखि पद तर दीनों डारि।
कंकन को पद चिन्ह सोइ धारत पद सुकुमारि।।

निकुंजलीला में कंकणों के मुखरित होने से श्रीराधा ने कंकण उतारकर रख दिए और उनका चिह्न अपने चरणकमल में धारण किया है। इनका ध्यान मंगलकारक है।

कमल

कमलादिक देवी सदा सेवत पद दै चित्त।
कमल चिह्न श्रीकमल पद धारत एहि हित नित्त।।

श्रीराधा के चरणकमल में कमलचिह्न का भाव है कि लक्ष्मीजी इन चरणों का सदा ध्यान करती हैं, उन पर बलिहार जाती हैं। इस चिह्न का ध्यान सभी प्रकार के वैभव व नवनिधि का दाता है।

ऊर्ध्वरेखा

सरन गहे ते तरहिंगे यहै लीक कहि दीन।
ऊरध रेखा चिन्ह है सोई चरन नवीन।।

संसाररूप सागर अपार है, इसलिए श्रीराधा ने वाम-चरण में ऊर्ध्वरेखा धारणकर पुल बांध दिया है। भक्त श्रीराधा के चरणों में ऊर्ध्वरेखा का ध्यान करने से सहज ही संसार-सागर से पार हो जाते हैं। जो श्रीराधा के चरणों की भक्ति करते हैं उनकी कभी अधोगति नहीं होती है।

अंकुश

बहुनायक पिय मन सुगज मति औरन पै जाय।
या हित अंकुस चिन्ह श्रीराधा-पद दरसाय।।

मनरूपी उन्मत्त हाथी किसी भी प्रकार वश में नहीं आता है। अत: मन के निग्रह के लिए श्रीराधा के चरणों में अंकुश चिह्न का ध्यान करना चाहिए।

अर्ध-चन्द्र

निष्कलंक जग-वंद्य पुनि दिन दिन याकी वृद्धि।
अर्ध-चन्द्र को चिन्ह है या हित करत समृद्धि।।

अर्ध-चन्द्र निष्कलंक माना जाता है। यह शिवजी व गणेशजी के मस्तक पर विराजमान रहता है और एक-एक दिन करके वृद्धि को प्राप्त होता है। श्रीराधा के चरण में अर्ध-चन्द्र के चिह्न का ध्यान त्रिताप को नष्ट करके भक्ति और समृद्धि को बढ़ाता है। चन्द्रमा मन के देवता है, भक्तों का मन श्रीराधा के चरणों में लगा रहे इसलिए श्रीराधा के चरण में अर्ध-चन्द्र का चिह्न है।

यव (जौ)

भोजन को मत सोच करु भजु पद तजु जंजाल।
जव को चिन्ह लखात पद हरन पाप को जाल।।

श्रीराधा के चरणकमल में यव के चिह्न का अर्थ है कि भोजन की चिन्ता और सांसारिक मोहमाया को छोड़कर इन चरणकमलों की शरण लेने से सारे पाप-ताप मिट जाते हैं। जौ का चिह्न सर्वविद्या और सिद्धियों का दाता है, इसका ध्यान करने वालों को सुमति, सुगति, विद्या और सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।

श्रीराधा के दायें-चरण के चिह्न और उनका भाव

श्रीराधा के दाहिने पैर में अंगूठे के नीचे शंख, बगल की दो उंगलियों के नीचे पर्वत, आखिरी दो उंगलियों के नीचे यज्ञवेदी, शंख के नीचे गदा, वेदी के नीचे कुण्डल, उसके नीचे शक्ति, एड़ी में मत्स्य और मत्स्य के ऊपर रथ इस प्रकार कुल 8 चिह्न हैं।

पाश

जे आवैं याकी सरन कबहुं न ते छुटि जाहिं।
पास-चिन्ह श्रीराधिका येहि कारन पद माहिं।।

श्रीराधा के चरणकमल में पाश-चिह्न का भाव है कि जो उनकी शरण लेता है, वह श्रीराधा के प्रेमपाश में फंसकर भवसागर से तर जाता है।

गदा

जे आवत याकी सरन पितर सबै तरि जात।
गया गदाधर चिन्ह पद या हित गदा लखात।।

श्रीकृष्ण विष्णुरूप में गदाधारी हैं, इसलिए श्रीराधा के चरणों में गदा का चिह्न है। इसके ध्यान से शत्रु नष्ट हो जाते हैं, पितरों की सद्गति होती है।

रथ

यह जग सब रथ रूप है सारथि प्रेरक आप।
या हित रथ को चिन्ह है पग मैं प्रगट प्रताप।।

श्रीराधा के चरण में रथ के चिह्न का भाव है कि यह संसार रथरूप है जोकि निरन्तर आगे बढ़ता ही जा रहा है और उसके सारथि श्रीयुगलस्वरूप श्रीराधाकृष्ण हैं। श्रीराधा के चरणकमल में रथ चिह्न का ध्यान करने से संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

वेदी

जग्य रूप श्रीकृष्ण हैं स्वधा रूप हैं आप।
यातें वेदी तिन्ह है चरन हरन सब पाप।।
अग्नि रूप ह्वै जगत को कियो पुष्टि रस गान।
या हित वेदी चिन्ह है प्यारी-चरन महान।।

श्रीराधा और श्रीकृष्ण दोनों अभिन्न हैं। श्रीकृष्ण यज्ञरूप हैं तो श्रीराधा स्वधा हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञ की वेदी से अग्नि अवतार (महाप्रभु वल्लभाचार्यजी) लेकर संसार को पुष्टिरस का दान दिया। इसलिए श्रीराधा के चरणों में वेदी का चिह्न है।

कुण्डल

प्यारी पग नुपूर मधुर धुनि सुनिवे के हेत।
मनहुं करन पिय के बसे चरन सरन सुख देत।।

श्रीराधा के चरणों के नूपुर से जो कलरव होता है, वही विश्व में शब्दब्रह्मरूप में व्याप्त है। उन्हीं नूपुरों की मधुर झंकार सुनने के लिए श्रीकृष्ण के कान सदैव तरसते रहते हैं इसलिए श्रीकृष्ण के कुंडल के चिह्न श्रीराधा के चरणों में हैं। इनके ध्यान से साधक को सुख प्राप्त होता है।

मत्स्य

जल बिनु मीन रहै नहीं तिमि पिय बिनु हम नाहिं।
यह प्रगटावन हेत हैं मीन चिन्ह पद मांहि।।

जिस प्रकार जल के बिना मछली जिन्दा नहीं रहती उसी प्रकार श्रीराधा श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। श्रीराधा के चरण में मछली का चिह्न इसी भाव को प्रकट करता है।

पर्वत

सब ब्रज पूजत गिरिवरहिं सो सेवत हैं पाय।
यह महात्म्य प्रगटित करन गिरिवर चिन्ह लखाय।।

व्रज के देवता गिरिगोवर्धननाथ (श्रीकृष्ण) हैं, वे श्रीराधा की आराधना करते हैं। श्रीराधा की इसी महिमा को प्रकट करने के लिए उनके चरण में पर्वत का चिह्न है।

शंख

कबहूँ पिय को होइ नहिं बिरह ज्वाल की ताप।
नीर तत्त्व को चिन्ह पद यासों धारत आप।।

कभी भी प्रियतम श्रीकृष्ण को विरह की अग्नि न सताए इसलिए श्रीराधा के चरण में जलतत्त्वरूपी शंख का चिह्न है।

श्रीराधा के चरण-चिह्नों के ध्यान से समस्त ऐश्वर्यों, भुक्ति-मुक्ति और भक्ति की अक्षयनिधि प्राप्त होती  है।

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