तुलसीदासजी ने अपनी वातपीड़ा दूर करने के लिए रचा ‘हनुमानबाहुक’

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‘हनुमानबाहुक’ : एक मन्त्रात्मक काव्य

गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी द्वारा रचित ‘हनुमानबाहुक’ लोकप्रसिद्ध काव्यरचना है। यह एक मन्त्रात्मक स्तोत्र है जो आकार में छोटा होने पर भी मनन करने पर विपुल फल प्रदान करता है। ‘हनुमानबाहुक’ का पाठ वातपीड़ा दूर करने में रामबाण औषधि की तरह काम करता है।

तुलसीदासजी ने ‘हनुमानबाहुक’ के रूप में हनुमानजी के दरबार में लगाया अपना प्रार्थना-पत्र

तुलसीदासजी ने जिस प्रकार ‘विनयपत्रिका’ के रूप में अपनी अरजी श्रीराम के दरबार में लगायी है, उसी प्रकार ‘हनुमानबाहुक’ के रूप में उन्होंने समस्त कष्ट-निवारण के लिए अपना प्रार्थना-पत्र अपने आराध्य हनुमानजी तथा उनके भी आराध्य श्रीराम को अर्पित किया है। असहनीय कष्ट से मुक्ति के लिए तुलसीदासजी ने छन्द में बद्धकर हनुमानजी की वन्दना के कुल चौंवालीस (४४) पद्य रचे, जो ‘हनुमानबाहुक’ के नाम से जाने जाते हैं।

‘हनुमानबाहुक’ पाठ की विधि

समस्त मनोरथों को पूर्ण कर अभीष्ट फलदाता होने से ‘हनुमानबाहुक’ का पाठ नित्य किया जा सकता है। स्नान करके शुद्ध आसन पर बैठकर हनुमानजी की प्रतिमा या चित्रपट पर गुग्गुल का धूप निवेदन करें। बेसन के पांच लड्डू या पांच फल या पंचमेवा का नैवेद्य (भोग) अर्पणकर एकाग्रमन से हनुमानजी का ध्यान करते हुए ‘हनुमानबाहुक’ का नित्य पाठ करने पर वायु सम्बन्धी सभी रोगों का शमन हो जाता है।

हनुमानजी का नख-शिख ध्यान

श्रीरामदूत हनुमान सुवर्ण-पर्वत (सुमेरु) के समान शरीरवाले, करोड़ों मध्याह्न के सूर्य के सदृश अनन्त तेजोराशि, विशाल-हृदय, अत्यन्त बलवान भुजाओं वाले तथा वज्र के तुल्य नख और शरीर वाले हैं, भौंह, जीभ, दाँत और मुख विकराल हैं, बाल भूरे रंग के तथा पूँछ कठोर और दुष्टों के दल के बल का नाश करने वाली है। तुलसीदासजी कहते हैं श्रीपवनकुमार हनुमानजी की विकटमूर्ति (डरावनी मूर्ति) जिसके हृदय में निवास करती है, उस पुरुष के समीप आधि, व्याधि और पाप स्वप्न में भी नहीं आते। (पद सं. २)

‘हनुमानबाहुक’ के तीन पाठ मिटा देते हैं वातरोग

ऐसी मान्यता है कि औषधि सेवन से जो वातकष्ट दूर नहीं हो पाता, उसे ‘हनुमानबाहुक’ के केवल तीन पाठ पूरी तरह से दूर कर देते हैं। इतना ही नहीं ‘हनुमानबाहुक’ के ग्यारह हजार एक सौ आठ (११,१०८) पाठ करने से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है।

स्वयं तुलसीदासजी को हुई भयंकर वातपीड़ा

विक्रमी-संवत् १६६४ के लगभग गोस्वामी तुलसीदासजी की बाहुओं में भयंकर वातपीड़ा हुई और फोड़े-फुंसियों के कारण उनका सारा शरीर भयंकर पीड़ा से कराह उठा। उन्होंने औषधि, यन्त्र-मन्त्र, टोने-टोटके आदि अनेक उपाय किए, किन्तु रोग घटने के बदले दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया। अपनी असह्य बाहु-पीड़ा के बारे में तुलसीदासजी ने लिखा है–

पायँपीर पेटपीर बाँहपीर मुँहपीर,
जरजर सकल सरीर पीरमई है।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहिपर दवरि दमानक सी दई है।।
हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारेही तें,
ओट रामनाम की ललाट लिखि लई है।
कुंभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,
हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है।। (पद सं. ३८)

भावार्थ–पांव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा–सारा शरीर पीड़ामय होकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। देवता, प्रेत, पितर, कर्म, काल और दुष्टग्रह–सब साथ ही दौरा करके मुझ पर तोपों की बाड़-सी दे रहे हैं। बलि जाता हूँ। मैं तो लड़कपन से ही आपके हाथ बिना मोल बिका हुआ हूँ और अपने कपाल में रामनाम का आधार लिख लिया है। हाय राजा रामचन्द्रजी! कहीं ऐसी भी दशा हुई है कि समुद्र को भी पी जाने वाले अगस्त्य मुनि का सेवक गाय के खुर डूबने-योग्य पानी में डूब गया हो?

अत्यधिक कष्ट में तुलसीदासजी आत्मावलोकन करते हैं और अपने-आप को ही दोषी मानते हुए कहते हैं–

मैं बाल्यावस्था से ही सीधे मन से श्रीरामचन्द्रजी के सम्मुख हुआ, मुख से रामनाम लेता और टुकड़ा-टुकड़ी माँगकर खाता था। फिर युवावस्था में लोकरीति में पड़कर अज्ञानवश राजा रामचन्द्रजी के चरणों की पवित्र प्रीति को संसार में कूदकर तोड़ बैठा। उस समय, खोटे-खोटे आचरणों को करते हुए मुझे अंजनीकुमार ने अपनाया और रामचन्द्रजी के पुनीत हाथों से मेरा सुधार करवाया। किन्तु तुलसी जब गोस्वामी बन गया, तब उसने पिछले खराब दिनों को भुला दिया, आज उसी का फल अच्छी तरह पा रहा है । (पद सं. ४०)

जिसे भोजन-वस्त्र से रहित भयंकर विषाद में डूबा हुआ और दीन-दुर्बल देखकर ऐसा कौन था जो हाय-हाय नहीं करता था, ऐसे अनाथ तुलसी को दयासागर स्वामी रघुनाथजी ने सनाथ करके अपने स्वभाववश उत्तम फल दिया। इस बीच में यह नीचजन प्रतिष्ठा पाकर फूल उठा, अपने को बड़ा समझने लगा और तन-मन-वचन से रामजी का भजन छोड़ दिया, इसी से शरीर में से भयंकर बरतोर (कष्टकारी फोड़ा-फुंसी)  के बहाने रामचन्द्रजी का नमक फूट-फूटकर निकलता दिखायी दे रहा है। (पद सं. ४१)

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें,
बढ़ी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,
को है जगजाल जो न मानत इताति है।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है।। (पद सं. ३०)

भावार्थ–मेरे ही पाप व तीनों ताप अथवा शाप से बाहु की पीड़ा बढ़ी है, वह न कही जाती और न सही जाती है। अनेक औषधि, यन्त्र-मन्त्र-टोटकादि किये, देवताओं को मनाया, पर सब व्यर्थ हुआ, पीड़ा बढ़ती ही जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कर्म, काल और संसार का समूह-जाल कौन ऐसा है जो आपकी आज्ञा को न मानता हो? हे रामदूत हनुमान! तुलसी आपका दास है और आपने इसको अपना सेवक कहा है। आपकी यह ढील मुझे इस पीड़ा से भी अधिक पीड़ित कर रही है।

तुलसीदासजी द्वारा हनुमानजी के अलौकिक गुणों का बखान

तुलसीदासजी हनुमानजी के अलौकिक गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं–सूर्य भगवान के समीप हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमानजी ने सूर्य की ओर मुख करके पीठ की तरफ पैरों से (उल्टे चलकर)  प्रसन्नमन से आकाशमार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं। (पद संख्या ४)

महाभारत में अर्जुन के रथ की पताका पर कपिराज हनुमानजी ने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधन की सेना में घबराहट उत्पन्न हो गयी । द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह ने कहा कि ये महाबली पवनकुमार है, जिनका बल वीररस-रुपी समुद्र का जल है । (पद संख्या ५)

तुलसीदासजी ने कराया हनुमानजी को उनके बल का स्मरण

अतुलित बलधाम हनुमानजी को जब उनके बल का स्मरण कराया जाता है, तभी वह अपने बल-प्रदर्शन के लिए तैयार होते हैं। ‘हनुमानबाहुक’ के पद सं. २०-२४ तक तुलसीदासजी ने हनुमानजी को उनके बल का स्मरण कराया है। पद सं. २२ का भाव बहुत सुन्दर है—

हे केशरीकुमार ! आप उजड़े हुए (सुग्रीव-विभीषण) को बसाने वाले और बसे हुए (रावणादि) को उजाड़ने वाले हैं, अपने उस बल का स्मरण कीजिये। हे रामदूत ! रामचन्द्रजी के सेवकों के लिये आप कल्पवृक्ष हैं और मुझ-सरीखे दीन-दुर्बलों को आपका ही सहारा है। हे वीर ! तुलसी के माथे पर आपके समान समर्थ स्वामी विद्यमान रहते हुए भी वह बाँधकर मारा जाता है। बलि जाता हूँ, मेरी भुजा विशाल पोखरी के समान है और यह पीड़ा उसमें जलचर के सदृश है, सो आप मकरी के समान इस जलचरी को पकड़कर इसका मुख फाड़ डालिये।  (पद सं. २२)

तुलसीदासजी ने हनुमानजी को उपालम्भ देते हुए की वन्दना

भक्त और भगवान के बीच जब प्रेम की अत्यधिक प्रगाढ़ता हो जाती है, तब उनमें पूज्य व पूजक का भाव नहीं रहता। तभी भक्त भगवान को अपना सबसे करीबी मानकर उन्हें खरी-खोटी भी सुना देता है और अपनी हीनता को भी सहज ही स्वीकार कर लेता है। तुलसीदासजी कहते हैं–

‘संसार जानता है कि आपका कृपापात्र सदा निर्विघ्न और प्रसन्न रहता है, इसलिए आप अपनी इस प्रतिज्ञा को भूलिए नहीं। आप अपनी साहिबी संभालिए। यदि मैं अपराधी हूँ तो मेरी हजारों प्रकार की दुर्दशा कीजिए। किन्तु लड्डू से ही मरने वाले को जहर देकर मत मारिये। हे महाबली! मेरी बाहुपीड़ा को शीघ्र ही दूर कर दीजिए।’ (पद सं. २०)

इतना ही नहीं, वे श्रीराम और श्रीशंकरजी को ललकार कर कहते हैं–

कहों हनुमान सों सुजान रामरायसों,
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये।
हरष विषाद राग रोष गुन दोषमई,
बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के,
करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये।
तुम्ह तें कहा न होय हाहा सो बुझैये मोहि,
हौं हूँ रहों मौन ही बयो सो जानि लुनिये।। (पद सं. ४४)

भावार्थ–मैं हनुमानजी से, सुजान राजा राम से और कृपानिधान शंकरजी से कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनिये। देखा जाता है कि विधाता ने सारी दुनिया को हर्ष, विषाद, राग, रोष, गुण और दोषमय बनाया है। वेद कहते हैं कि माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव के करने वाले रामचन्द्रजी हैं। इस बात को मैंने चित्त में सत्य माना है। तुलसीदासजी ने उपालम्भ देते हुए हनुमानजी से यहां तक कह दिया कि मुझे यह समझा दीजिए कि आपसे यदि मेरी पीड़ा दूर नहीं हो सकती, तो फिर मैं यह जानकर चुप रहूंगा कि मैंने जो बोया है, वही अब काट रहा हूँ।

तुलसीदासजी की आर्त पुकार

तुलसीदासजी आर्त पुकार करते हुए कहते हैं–हे देव! तुलसी आपका निजी सेवक है, उसके हृदय में आपका निवास है और वह भारी दुःखी दिखायी देता है। वात-व्याधि-जनित बाहु की पीड़ा केवाँच की लता के समान है, उसकी उत्पन्न हुई जड़ को बटोरकर वानरी खेल से उखाड़ डालिये। (पद सं. २४)

आपके टुकड़ों से पला हूँ, चूक पड़ने पर भी मौन न हो जाइये। मैं कुमार्गी दो कौड़ी का हूँ, पर आप अपनी ओर देखिये। हे भोलेनाथ! अपने भोलेपन से ही आप थोड़े से रुष्ट हो जाते हैं, सन्तुष्ट होकर मेरा पालन करके मुझे बसाइये, अपना सेवक समझकर दुर्दशा न कीजिये। आप जल हैं तो मैं मछली हूँ, आप माता हैं तो मैं छोटा बालक हूँ, देरी न कीजिये, मुझको आपका ही सहारा है। बच्चे को व्याकुल जानकर प्रेम की पहचान करके रक्षा कीजिये, तुलसी की बाँह पर अपनी लम्बी पूँछ फेरिये जिससे पीड़ा निर्मूल हो जावे। (पद संख्या ३४)

हे महाबली कपिराज ! तुलसी की बाहु की पीड़ा पूतना पिशाचिनी के समान है और आप बालकृष्ण-रुप हैं, यह आपके ही मारने से मरेगी । (पद सं. २५)

‘हनुमानबाहुक’ रूपी वन्दना से तुलसीदासजी की पीड़ा हुयी दूर

‘दनुजवनकृशानु’ श्रीरामदूत श्रीहनुमानजी के स्मरण व मनन से तुलसीदासजी के आधि (मन के क्लेश) और व्याधि (शरीर के क्लेश) दोनों एक साथ दूर हो गये। उन्होंने सभी लोगों से हनुमानजी का आश्रय लेने की प्रार्थना की–

तुलसीदासजी के दुस्सह दरिद्र-रुपी रावण का नाश करने के लिये आप तीनों लोकों में आश्रय रुप प्रकट हुए हैं। अरे लोगो! तुम ज्ञानी, गुणवान्, बलवान् और सेवा (दूसरों को आराम पहुँचाने) में सजग हनुमानजी के समान चतुर स्वामी को अपने हृदय में बसाओ। (पद सं. ८)

श्रीराम व हनुमानजी में अगाध श्रद्धा रखने वाले अनगिनत भक्त कष्टों के निवारण के लिए ‘हनुमानबाहुक’ का निरन्तर पाठ कर अपने वांछित मनोरथ को प्राप्त करते हैं। संकट के समय इस तत्काल फलदायक स्तोत्र का श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करना रामभक्तों के लिये परमानन्ददायक सिद्ध हुआ है।

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