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नमस्कारं भानु: प्रिय: अलंकारं विष्णु: प्रिय:।
जलधारा शिवं प्रिय: ब्राह्मणं मधुरं प्रिय:।।

‘अभिषेक प्रिय: शिव:’ अर्थात् भोले-भण्डारी भगवान सदाशिव को अभिषेक अत्यन्त प्रिय है। ‘रुद्राष्टाध्यायी’ तथा ‘मृत्युंजय’ महामन्त्र से भगवान शंकर का अभिषेक किया जाता है। श्रावणमास में तो इसकी बहार देखने-योग्य होती है। भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए व्यक्ति को घर में या मन्दिर में शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। भगवान शिव ने अपने कण्ठ में कालकूट विष को धारण कर रखा है। उस विषाग्नि को शान्त करने के लिए उनके मस्तक पर गंगा और चन्द्रकला फायरब्रिगेड की तरह काम करते हैं। उसी विषाग्नि की तीव्रता को शान्त करने के लिए भगवान शिव का शीतल वस्तुओं से अभिषेक किया जाता है,  जैसे–कच्चा दूध, गंगाजल, पंचामृत, गुलाबजल, इक्षुरस (गन्ने का रस), चंदन मिश्रित जल, कुश-पुष्पयुक्त जल, सुवर्ण एवं रत्नयुक्त जल (रत्नोदक), नारियल का जल आदि।

नीलगाय के सींग में जल, दूध आदि भरकर शिवजी का अभिषेक किया जाता है। ताम्रपात्र में दूध डालकर शिवजी व अन्य देवताओं पर नहीं चढ़ाना चाहिए, वह मदिरा हो जाता है; परन्तु ताम्रपात्र में जल गंगाजल के समान है। शिवपुराण की रुद्र संहिता में जलादि धाराओं, विभिन्न पुष्पों व अन्नों से शिवपूजा का फल बताया गया है।

मनोकामनापूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की धाराओं से शिवपूजन

सुख और संतान की वृद्धि के लिए शिवजी का जलधारा से पूजन अत्यन्त उत्तम माना गया है। साधक को मस्तक पर भस्म व गले में रुद्राक्ष धारणकर शिवपूजन करना चाहिए।

  • शिवलिंग पर  शिव सहस्त्रनाम का जप करते हुए घी की धारा चढ़ाने से वंश का विस्तार होता है।
  • नपुंसकता दोष को दूर करने के लिए व जिसकी संतान होकर मर जाती है, घी से शिवजी की पूजा करनी चाहिए।
  • व्याधि विनाश के लिए पात्र में कुशा लगाकर जलधारा से रुद्राभिषेक करना चाहिए।
  • लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस की धारा से शिवजी का अभिषेक करना चाहिए। यह जीवन में आनन्द की प्राप्ति कराती है।
  • पशु-सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए दही की धारा से शिवलिंग का पूजन करना चाहिए।
  • जब जी उचट जाए, कहीं भी प्रेम न रहे, दु:ख बढ़ जाय और घर में सदा कलह रहने लगे, तब शर्करामिश्रित दुग्ध की धारा शिवजी को चढ़ानी चाहिए।
  • जडबुद्धि दोष को दूर करने के लिए भी शिवजी को शर्करामिश्रित दुग्ध की धारा चढ़ानी चाहिए। ऐसा करने पर उसे बृहस्पति के समान उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जाती है।
  • शिवलिंग पर गंगाजल की धारा भोग और मोक्ष दोनों फलों को देने वाली है।
  • ज्वर के कारण जब मनुष्य प्रलाप करने लगता है, उसकी शान्ति के लिए शिवजी पर जलधारा चढ़ाना शुभ होता है।
  • सुगन्धित तेल से शिवलिंग की पूजा करने पर भोगों की वृद्धि होती है।
  • मधु (शहद) से शिवपूजन करने पर राजयक्ष्मा (टी बी) का रोग दूर हो जाता है।

ये सब धाराएं महामृत्युंजय मन्त्र से, शिवजी के विभिन्न नामों के अंत में नम: लगाकर, शतरुद्रिय मन्त्र से व पुरुषसूक्त से चढ़ानी चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

विभिन्न पत्र-पुष्पों से शिवपूजन

देवताओं को दैत्यों के कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना की। उनका नियम था कि श्रीशिवसहस्त्रनाम का पाठ करते जाते और प्रत्येक नाम पर मानसरोवर में उत्पन्न एक-एक कमल शिवजी को चढ़ाते जाते। इस प्रकार प्रतिदिन सहस्त्र (हजार) कमलों से भगवान शिव की पूजा करते थे।

फूल, फल व पत्ते जैसे उगते हैं, वैसे ही इन्हें भगवान पर चढ़ाना चाहिए। उत्पन्न होते समय इनका मुख ऊपर की ओर होता है, अत: चढ़ाते समय इनका मुख ऊपर की ओर रखना चाहिए। दूर्वा व तुलसीदल को अपनी ओर और बिल्वपत्र को नीचे मुख कर चढ़ाना चाहिए।

  • कमल, बिल्वपत्र, शंखपुष्पोंसे शिवजी का पूजन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यदि एक लाख पुष्पों से शिवजी का पूजन किया जाए तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • भगवान शिव पर बेला के फूल चढ़ाने से सुन्दर व सुशील पत्नी प्राप्त होती है।
  • मुक्ति की कामना करने वाले मनुष्य को कुशा से शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • पुत्र की इच्छा रखने वाले मनुष्य को एक लाख लाल डंठल वाले धतूरे से शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • यश प्राप्ति के लिए अगस्त्य के फूलों से शिव पूजन करना चाहिए।
  • तुलसीपत्र और मंजरियों से शिवजी की अर्चना करने से भोग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं।
  • लाल और सफेद आक, अपामार्ग और श्वेत कमल के फूलों से शिवपूजन से मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त करता है।
  • काम-क्रोधादि के नाश के लिए मनुष्य को भगवान सदाशिव की जपाकुसुम (अड़हुल) के पुष्पों से, रोग और उच्चाटन आदि के लिए कनेर के फूलों से पूजन करना चाहिए।
  • बन्धूक (दुपहरिया) के पुष्पों से पूजा करने पर मनुष्य को आभूषण और चमेली के पुष्पों से वाहन की प्राप्ति होती है।
  • अलसी के फूलों से महादेवजी का पूजन करने वाला मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।
  • शमीपत्रों से पूजन अनेक प्रकार के सुख व मोक्ष देने वाला है।
  • सुन्दर व सुशील पत्नी प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की बेला के पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।
  • जूही के फूलों से पूजा की जाए तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
  • सुन्दर नए वस्त्र व सम्पत्ति की कामना पूर्ति के लिए कर्णिकार (कनेर) के फूलों से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।
  • निर्गुण्डी के पुष्पों से शिवपूजन करने से मन पवित्र व निर्मल हो जाता है।
  • बिल्वपत्रों के पूजन करने से भगवान शिव समस्त मनोकामना पूर्ण करते हैं।
  • हरसिंगार के पुष्पों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति की वृद्धि होती है।
  • ऋतु अनुसार पुष्पों से शिवपूजन करने से संसार के आवागमन से मनुष्य मुक्त हो जाता है।
  • राई के फूलों से शिवजी की पूजा से शत्रुओं का नाश होता है।
  • आयु की इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओं से शिवजी का पूजन करे।

शिव सहस्त्रनाम या अष्टोत्तरशतनाम द्वारा पुष्प चढ़ाते हुए शिवार्चन किया जाता है। मनोकामना सिद्धि के लिए एक लाख पुष्पों द्वारा शिव पूजा का विधान है। भगवान शिव की पूजा में चम्पा और केवड़े के पुष्पों का निषेध है।

विभिन्न धान्यों से शिवपूजन

  • शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव पर अखण्ड चावल चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। शिवजी के ऊपर एक वस्त्र चढ़ाकर उसी पर चावल अर्पित करने चाहिए।
  • शिवजी पर तिल चढ़ाने से घोर पापों का नाश हो जाता है।
  • जौ द्वारा की हुई शिव की पूजा स्वर्गीय सुख की वृद्धि करने वाली है।
  • गेहूँ शंकरजी को संतोष प्रदान करता है। (९ सेर में एक लाख गेहूँ होता है।)
  • मूँग द्वारा शिवपूजन करने से सुख की प्राप्ति होती है।
  • प्रियंगु (कंगनी) द्वारा शिव का पूजन करने से उपासक के धर्म, अर्थ, काम-भोग की वृद्धि होती है।
  • राई से पूजन करने पर काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी शत्रुओं का विनाश होता है।
  • अरहर के पत्तों से शिवजी का श्रृंगार करके की गयी पूजा सभी फलों को देने वाली है।

शिवोपासना में जहां रत्नों से निर्मित शिवलिंगों की पूजा में विशाल वैभव का प्रयोग होता है, वहां सरलता की दृष्टि से केवल बिल्वपत्र, जल, अक्षत और मुख से बम-बम की ध्वनि निकालने से ही शिवपूजा पूर्ण हो जाती है। इसीलिए वे ‘उदारशिरोमणि’ और ‘आशुतोष’ कहे जाते हैं। भगवान सदाशिव धर्म की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं और उनके विधिवत् पूजन से जीवन में कभी दु:ख की अनुभूति नहीं होती है। अनिष्टकारक दुर्योगों में शिवलिंग के अभिषेक से भगवान आशुतोष की प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है, सभी ग्रहजन्य बाधाएं शान्त हो जाती हैं, अपमृत्यु भाग जाती है और सभी प्रकार के सुखभोग प्राप्त हो जाते हैं।  शिवलिंग के अर्चन से मनुष्य को भूमि, विद्या, पुत्र, बान्धव, श्रेष्ठता, ज्ञान एवं मुक्ति सब कुछ प्राप्त हो जाता है।

धरती पर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके लिए भूमि ही सहारा है; उसी प्रकार जिन्होंने शिव का अपराध किया है, उनके लिए भी भगवान शिव ही शरणदाता हैं। भगवान शंकर सबके एकमात्र मूल हैं, उनकी पूजा ही सबसे बढ़कर है; क्योंकि मूल के सींचे जाने पर शाखा रूपी समस्त देवता स्वत: तृप्त हो जाते हैं।

शिवे भक्ति: शिवे भक्ति: शिवे भक्तिर्भवे भवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।।

अर्थात्–’प्रत्येक जन्म में मेरी शिव में भक्ति हो, शिव में भक्ति हो, शिव में भक्ति हो। शिव के सिवा दूसरा कोई मुझे शरण देने वाला नहीं। महादेव ! आप ही मेरे लिए शरणदाता हैं।’

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