SHARE

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

श्रीहनुमान कौन हैं?

भगवान शंकर के अंश से वायु के द्वारा कपिराज केसरी की पत्नी अंजना से हनुमानजी का प्रादुर्भाव हुआ;

इसलिए वे ‘आंजनेय’ तथा ‘केसरीनन्दन’ कहलाते हैं। वायु के अंश से उत्पन्न होने के कारण ‘वायुपुत्र’ या ‘पवनपुत्र’, शिव के अंश से उत्पन्न होने के कारण ‘शंकरसुवन’, श्रीराम की सेवा करने से ‘रामदूत’, अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थित होकर हुंकारमात्र से कौरवों की सेना के वीरों में घबराहट उत्पन्न कर देने के कारण ‘फाल्गुनसख’, गरुड़ के वेग के समान समुद्र लांघने से ‘उदधिक्रमण’ व कभी न पराजित होने से ‘अपराजित’, आदि नामों से जाने जाते हैं। हनुमान ‘महाबल’ हैं, ‘रामेष्ट’ हैं, ‘पिगाक्ष’ (भूरे नेत्रों वाले) हैं, सीताजी के शोक का नाश करने वाले’ हैं, ‘लक्ष्मण के प्राणदाता’ तथा ‘रावण का दर्प-भंग करने वाले’ हैं।

हनुमानंजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।
रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिंगाक्षोऽमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्यदर्पहा।। (आनन्दरामायण ८।१३।८-९)

संकटमोचन हनुमानजी के इन बारह नामों का प्रात: व रात्रि में पाठ करने से मनुष्य के समस्त भय दूर हो जाते हैं।

‘हनुमान’ नाम की कथा

कहा जाता है कि हनुमानजी को जन्म ग्रहण करने के कुछ ही समय बाद इतनी भूख लगी कि वे माता के पय:पान से तृप्त नहीं हो सके। इससे चिन्तित होकर मां अंजना जंगल में फल लेने गयीं, तब तक सूर्योदय होने लगा। आकाश में उगते सूर्य को देखकर हनुमान उसे लाल फल समझकर निगलने के लिए बढ़े। उस समय सूर्यग्रहण था और राहु सूर्य को ग्रस्त करने के लिए आया था। हनुमानजी का विशाल आकार और उनको सूर्य को निगलते देखकर राहु ने डरकर देवराज इन्द्र से निवेदन किया कि एक दूसरा महाराहु मेरा अधिकार छीनकर मुझे भी ग्रस्त करना चाहता है, अत: आप मेरी रक्षा करें। इन्द्र को ऐरावत पर चढ़कर आते देख पवनकुमार ने उसे बड़ा-सा सफेद फल समझा और उसी को पकड़ने के लिए चले। इस पर इन्द्र ने अपने वज्र से हनुमानजी के मुख पर जोरों से प्रहार किया, जिससे उनकी हनु (ठुड्डी) टेढ़ी हो गयी और वे पृथ्वी पर गिर पड़े। इससे कुपित होकर वायुदेव ने अपना प्रवाह रोक दिया जिससे सबका श्वास अवरुद्ध होने लगा। यह देखकर ब्रह्माजी ने हनुमानजी को पूर्ण स्वस्थ कर उन्हें अमरत्व प्रदान किया और अग्नि-जल-वायु से अभय प्रदान किया। इस प्रकार हनु के टेढ़ी हो जाने से वे ‘हनुमान’ कहलाए।

हनुमान वे हैं जिन्होंने बालपन में ही सूर्य का भक्षण कर लिया–’बाल समय रबि भक्षि लियो’,  तब उन्हें सभी देवताओं ने वरदान दिया जिससे वे ‘अतुलित बलधाम’ हो गए। जातिस्वभाव से चंचल हनुमान बचपन में ऋषियों का सामान अस्त-व्यस्त कर देते थे। अत: ऋषियों ने इन्हें शाप दिया–’तुम अपना बल भूले रहोगे। जब कोई तुम्हें स्मरण दिलायेगा, तभी तुम्हें अपने बल का भान होगा।’ तब से वे सामान्य वानर की तरह रहने लगे।

श्रीहनुमान के रूप में शंकरजी के वानर रूप धारण करने का कारण
‘जयति मंगलाकार, संसारभारापहर, वानराकार विग्रह पुरारी’ (विनयपत्रिका २७)

हनुमानजी कल्याण के धाम, संसार के भार को हरने वाले और वानर रूप में शंकरजी के ग्यारहवें रुद्ररूप हैं। भगवान शिव श्रीराम को अपना इष्टदेवता मानते हैं। भगवान नारायण ने जब नररूप धारणकर श्रीराम के रूप में अवतार ग्रहण किया तो शंकरजी शिवरूप में नररूप की आराधना नहीं कर सकते थे। अत: नरावतार श्रीराम की उपासना के लिए भगवान शंकर ने अपना रुद्रविग्रह त्याग दिया और वानर का रुप धारण कर माता अंजना के गर्भ से प्रकट हो गए।

हनुमानजी के गुरु स्वयं सूर्यदेव

वाल्मीकीय रामायण के अनुसार हनुमानजी माता के आदेश से भगवान सूर्यनारायण के पास अध्ययन के लिए गए। सूर्यदेव ने इसे बालक का खेल समझकर बहाना किया कि मैं स्थिर नहीं रह सकता, अत: पढ़ाना सम्भव नहीं है। हनुमानजी को सूर्य के सामने अध्ययन करने में उनके रथ की गति के समान ही तीव्र गति से पीछे की ओर चलना पड़ता था परन्तु इससे उन्हें सूर्यदेव की बातों को सुनने, समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई। उन्होंने समस्त वेदों, शास्त्रों व कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इस आश्चर्यजनक खेल को देखकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि आश्चर्यचकित रह गये और सोचने लगे कि यह शौर्य, वीररस, धैर्य आदि का साक्षात् स्वरूप आकाश में उपस्थित हो गया है।

विद्या, बुद्धि, ज्ञान तथा पराक्रम की मूर्ति

अपने इष्ट के सारे असम्भव कार्यों जैसे–समुद्र को लांघकर सीताजी का पता लगाना, लंकादहन, लंका से गृह सहित सुषेण वैद्य को लाना, संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण को प्राण दान देना, अजेय दुष्ट राक्षसों का वध करना और श्रीराम के अभिषेक के लिए चारों समुद्रों और पांच सौ नदियों से जल लाना आदि हनुमानजी के शौर्य व पराक्रम व असाधारण शक्ति से संभव था।

हनुमानजी लंका जलाकर अकेले ही रावण का मान-मर्दन कर जब प्रभु श्रीराम के पास लौटे तो श्रीराम ने पूछा कि ‘भुवन विजयी रावण की लंका को तुम कैसे जला सके?’ तब उन्होंने उत्तर दिया–

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा।।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

वीरवर हनुमान अपने बल के साथ बुद्धि के भी सागर हैं। तुलसीदासजी के शब्दों में–‘जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।’

हनुमानजी की प्रशंसा में श्रीराम अगस्त्य मुनि से कहते हैं–‘इसमें संदेह नहीं कि बालि और रावण का बल अतुलित था किन्तु हनुमान (बलिष्ठतम) के साथ इनके बल की तुलना नहीं की जा सकती। शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम तथा प्रभुत्व–इन सभी सद्गुणों ने हनुमानजी के भीतर घर कर रखा है।’

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

‘रामदूत’ हनुमान

प्रेम और राजनीति का संवादवाहक ‘दूत’ ही होता है। दूत अखण्ड विश्वास और आस्था का प्रतीक है।अशोकवाटिका में माता जानकी के सामने करुनानिधान श्रीराम की शपथ कहकर हनुमानजी अपनी अनन्य भक्ति दर्शा रहे हैं–

राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की।।

जिस राजा के दूत इतने उत्तम गुणों से युक्त हों, उसके सभी कार्य दूतों की बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं। श्रीरामजी के द्वार पर हनुमानजी हमेशा विराजमान रहते हैं और बिना उनकी आज्ञा के कोई रामजी की ड्यौढ़ी में प्रवेश नहीं कर सकता–‘राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।’

हनुमानजी के उपकार के ऋणी प्रभु श्रीराम

भगवान राम का पूरा परिवार हनुमानजी के उपकार का ऋणी है। हनुमानजी ने अलंघ्य समुद्र को पारकर सीताजी की खोज की। लक्ष्मण को शक्ति लगने पर रातोंरात संजीवनी लाकर उन्हें जीवन दान दिया। भरतजी को भगवान राम के अयोध्या-आगमन की सूचना देकर उनके प्राणों की रक्षा की। पाताल में जाकर अहिरावण का अंतकर श्रीराम व लक्ष्मण को मुक्त कराया तथा लंकायुद्ध में उपस्थित रहकर वे श्रीराम को विजयश्री प्राप्त करने में सहायक बने।

हनुमान वे हैं जिनके उपकार के ऋणी स्वयं श्रीराम हैं। सीता की सुधि लाने के पश्चात् श्रीराम अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहते हैं कि मैं हनुमान का ऋण चुका नहीं पाऊंगा–

सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि विचार मन माहीं।।
पुनि-पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता।। (रा च मा ५।३२। ५-८)

‘हे कपे! तुमने जो उपकार किए हैं, उनमें से एक-एक के लिए मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ। तुम्हारे शेष उपकारों के लिए तो मैं ऋणी ही रह जाऊंगा।’  श्रीराम केवल हनुमानजी की ओर निहारते ही रह गए। नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे उपकार के बोझ से बोझिल होकर सोचने लगे कि आशीर्वाद दूं तो क्या दूं? इस पर हनुमानजी ने प्रभु की विवशता को पहिचाना और स्वयं ही आशीर्वाद मांगने लगे–

नाथ भगति अति सुखदायनी।
देहु कृपा करि अनपायनी।।

हनुमानजी ने इतना राम-नाम जप किया कि स्वयं श्रीराम को ही उनके वश में हो जाना पड़ा–

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।। (रा च मा १।२६।६)

हनुमानजी के हृदय में श्रीराम बसते हैं–

मंगल-मूरति मारुत-नन्दन।
सकल-अमंगल-मूल-निकंदन।।
पनयतनय संतन हितकारी।
हृदय विराजत अवध बिहारी।। (विनयपत्रिका ३६।१-२)

हनुमानजी लंका अकेले नहीं गए थे, अपने हृदय के सिंहासन पर श्रीराम को विराजमान कर ले गए थे। तभी तो  सीताजी के समक्ष हनुमानजी के हृदय में विराजमान राम अपनी विरह-व्यथा स्वयं ही कहते हैं–’कहेउ राम वियोग तव सीता।’

श्रीराम द्वारा हनुमानजी को आलिंगनदान

श्रीराम व लक्ष्मण को अहिरावण ने जब देवी की बलि देने के लिए बांधकर रखा था, तब हनुमानजी के बारे में श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था–’भाई लक्ष्मण! आपत्ति के समय समस्त प्राणी मेरा स्मरण करते हैं, किन्तु मेरी आपदाओं का अपहरण करने वाले तो पवनकुमार ही हैं। अत: हम लोग उनका स्मरण करें।’

भगवान श्रीराम ने हनुमानजी के बुद्धिकौशल व पराक्रम को देखकर उन्हें अपना दुर्लभ आलिंगन प्रदान किया। भगवान श्रीराम हनुमानजी से कहते हैं–‘संसार में मुझ परमात्मा का आलिंगन मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। हे वानरश्रेष्ठ! तुम्हे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अत: तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो।’

जै जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई

हनुमानजी से श्रेष्ठ सद्गुरु संसार में दूसरा कौन हो सकता है? गोस्वामी तुलसीदासजी का भी हनुमानजी में गुरु भाव था। हनुमानजी सच्ची शिक्षा प्रदान करने वाले हैं। उनके स्मरण से मनुष्य में बुद्धि, बल, यश, धैर्य, निर्भयता, नीरोगता, विवेक और वाक्यपटुता आदि गुण आ जाते हैं।

हनुमानजी का सिन्दूर प्रेम

हनुमानजी को ‘सिन्दूरारूणविग्रह’ कहा जाता है। हनुमानजी की प्रतिमा पर घी में सिन्दूर मिलाकर चढ़ाने की परम्परा है। आयुर्वेद के अनुसार सिन्दूर और सिन्दूर मिश्रित तैल में अस्थि और सभी प्रकार के व्रण को स्वस्थ करने की अद्भुत शक्ति होती है। हनुमानजी को सिन्दूर का चोला क्यों चढ़ाया जाता है, इस सम्बन्ध में कई कथाएं प्रचलित हैं–

  • hanuman dilराज्याभिषेक के बाद भगवान श्रीराम दरबार में बैठकर सभी लोगों को उपहार दे रहे थे। श्रीराम ने सबसे अमूल्य अयोध्या के कोष की मणियों की माला सीताजी को दी और कहा यह हार तुम्हें जो अत्यन्त प्रिय हो, उसे दे देना। सीताजी ने हनुमानजी के गले में वह हार डाल दिया। हनुमानजी उस हार की मणियों को तोड़कर ध्यान से देखने लगे।। दरबार में बैठे सभी लोग हनुमानजी पर हंसने लगे और कहने लगे–आखिर हनुमान बंदर ही ठहरे, इन्हें मणियों का मूल्य क्या मालूम? एक दरबारी ने हनुमानजी से पूछा कि इनमें तोड़-तोड़कर तुम क्या देखते हो? इस पर हनुमानजी ने कहा–’मैं इसकी बहुमूल्यता की परख कर रहा हूँ, किन्तु इसके भीतर न कहीं राम का रूप दीखता है और न ही नाम।’ तब उस दरबारी ने कहा–’तुम अपने शरीर के भीतर देखो कि इसमें कहीं राम का नाम या रूप चित्रित है?’ इस पर हनुमानजी ने अपने नखों से सारे शरीर को विदीर्ण कर डाला। आश्चर्य की बात यह थी कि उनके रोम-रोम में ‘राम’–यह दिव्य नाम व हृदय में ‘श्रीसीताराम’ का दिव्य रूप अंकित था। सीतामाता ने यह देखकर सिन्दूरादितैल के लेप से हनुमानजी के व्रणों (घावों) को पुन: स्वस्थ कर दिया। तभी से हनुमानजी सिन्दूरारूण विग्रह के रूप में सुशोभित होने लगे। सीतामाता के प्रसाद के रूप में सिन्दूर उन्हें बहुत प्रिय हो गया।
  • शास्त्रों में सिन्दूर को मांगलिक व सौभाग्य-द्रव्य माना गया है जिसे सुहागिन स्त्री पति की आयु वृद्धि के लिए धारण करती है। एक बार हनुमानजी ने सीताजी से पूछा कि वे सिन्दूर क्यों धारण करती हैं? इस पर सीताजी ने कहा–’वत्स! इसके धारण करने से तुम्हारे स्वामी की आयु की वृद्धि होती है।’ फिर क्या था हनुमानजी ने अपने स्वामी श्रीराम के आयुष्यवर्धन के लिए अपने सारे शरीर पर सिन्दूर पोत लिया।

हनुमानजी पूर्ण समर्पित रामभक्त हैं; जो रामकाज के लिए जगत में सदा विराजित हैं। वे मणि-माणिक में भी राम को ही खोजते हैं और नहीं मिलने पर उन्हें तोड़ देते हैं। चूंकि वे रामरस खोजते हैं, इसलिए जहां-जहां रामकथा होती है, वहां-वहां वे गुप्त रूप से आरम्भ में ही पहुंच जाते हैं। दोनों हाथ जोड़कर सिर से लगाए वे सबसे अंत तक वहां खड़े रहते हैं। प्रेम के कारण उनके नेत्रों से बराबर आंसू झरते रहते हैं। जब तक पृथ्वी पर श्रीराम की कथा रहेगी, तब तक पृथ्वी पर रहने का वरदान उन्होंने स्वयं प्रभु श्रीराम से मांग लिया है। वे सात चिरजीवियों में से एक हैं।

LEAVE A REPLY